मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : हमेशा से ऊंची है नाक

मुंबई मिस्ट्री : हमेशा से ऊंची है नाक

  • विमल मिश्र

हमेशा से ऊंची है नाक
आपने दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ के आर. के. लक्ष्मण द्वारा बनाए कार्टून देखे होंगे। टेढ़ी-लंबी नाक कार्टूनिस्टों को शुरू से पसंद रही है। सैम मानेक शॉ अपनी साफगोई के लिए मशहूर थे। मतभेदों के बावजूद दोनों में एक-दूसरे के लिए बहुत इज्जत और विश्वास था। दोनों के बीच एक तकरार तो बहुत ही प्रसिद्ध हुई, जिसमें सैम ने इंदिराजी को कह डाला था कि ‘माना, आपकी नाक लंबी है। मेरी भी है-पर इसे मैं आपकी तरह दूसरों के मामलों में नहीं घुसेड़ता!’ पारसी भारत या दुनिया में कहीं भी बसे हों अपने काम से अपनी नाक हमेशा से ऊंची रखी है। देश की आर्थिक प्रगति का सूत्रधार और सबसे प्रगतिशील समुदाय है पारसी। गिनते जाइए: टाटा घराना, शापोरजी पालोनजी घराना, जमशेदजी जीजीभॉय, ससून, गोदरेज, वाडिया, रेडीमनी और पेटिट घराने। शहर के तमाम कॉजवे, सड़कें और इमारतें उनके दान से बनी हैं और मुंबई के पहले शिपयार्ड ही नहीं, नरीमन पाइंट, मरीन ड्रॉइव, टाटा कैंसर  हॉस्पिटल, सीएसएमटी और चर्चगेट सहित मुंबई की ज्यादातर हेरिटेज बिल्डिंग पर पारसी आर्किटेक्ट्स के नाम हैं। साक्षरता दर (करीब ९८ प्रतिशत) के मामले में वे सबसे आगे हैं तो सोशल कर्क और सरोकारों के लिए थैलियां उलीचने में भी। जीवन का कौन सा क्षेत्र है, जिसमें उन्होंने अपनी छाप नहीं छोड़ी। गिनते जाइए: स्वतंत्रता सेनानी: दादाभाई नौरोजी, सर फीरोजशाह मेहता, मैडम भीकाजी कामा, दिनशा वाच्छा, फीरोज गांधी, खुर्शीद फरामजी नरीमन। विज्ञान और स्थापत्य: होमी जे. भाभा, होमी एन. सेठना, आदि बलसारा, कावसजी जहांगीर, हफीज कांट्रेक्टर, नौजर वाडिया, मंचेरजी जोशी। शिक्षाशास्त्री और अर्थशास्त्री: आर्देशिर दाराबशॉ श्राफ, होमी के. भाभा, रूसी तल्यारखान। सेना: सैम मानेकशॉ, आस्पी इंजीनियर, फली होमी मेजर, जाल करसेटजी, ले. कर्नल अर्देशिर तारापोर। राजनीतिज्ञ, एक्टिविस्ट, प्रशासक: कावसजी जहांगीर, बी. पी. वाडिया, कोबड घांडी, दोराब पटेल, मीनू मसानी, पीलू मोदी, रूसी मोदी। विधि क्षेत्र: ननी पालखीवाला, फली सैम नरीमन, एस. एच. कपाडिया, सैम पिरोज भरूचा, सोली सोराबजी (पूर्व अटॉर्नी जनरल), अस्पी चिनॉय, शाहीन मिस्त्री, शिरीन भरूचा, जेरू बिलमोरिया। आर्टिस्ट, लेखक, पत्रकार-फोटोग्राफर, प्रकाशक, ज्योतिष: बास्पी सिधवा, बहराम कांट्रैक्टर, बेजान दारूवाला, फारूख ढोंढी, होमी व्यारावाला, केकी दारूवाला, रोहिंगटन मिस्त्री, आर. के. करंजिया, सोनी तारापोरवाला, बच्छी करकरिया। फिल्म, मॉडलिंग, संगीत, ललित कला और मनोरंजन जगत: जुबिन मेहता, फ्रेडी मर्करी , बोमन ईरानी, आर्देशिर ईरानी, साइरस भरूचा, डेजी ईरानी, एरिक अवारी, होमी अदजानिया,कैसद गुस्ताद, मेहर जेसिया, मेहर कैस्टेलिनो, पेरिजाद जोरेबियन, पर्सिस खंभाटा, शियामक डॉवर, सोहराब मोदी, जॉन अब्राहम, गैरी लॉयर, रॉनी स्क्रूवाला, अस्ताद देबू, पीनाज मसानी। खेल: डायना एडुलजी, फारूक इंजीनियर, नारी कांट्रैक्टर, पॉली उम्रीगर, पेसी श्राफ, साइरस पूनावाला। चिकित्सा: सोनावाला, उडवाडिया, बानाजी, जस्सावाला, डॉ. फिरूजा पारीख।
सवाल नाक का…
फैशन फोटोग्राफर पोरस वीमादलाल और स्टाइलिस्ट प्रयाग मेनन का ‘नोज प्रॉजेक्ट’ पारसी नाकों के अध्ययन और शोध के लिए इन दिनों दुनिया भर में चर्चा का विषय है। उपलब्धियों के लिहाज से पारसियों की नाक हमेशा से ऊंची रही है इसे कौन नहीं जानता! यह कहानी बहुत प्रसिद्ध है कि टाटा समूह के संस्थापक और अग्रज जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा ने महज भारतीय होने की वजह से अंग्रेजों द्वारा फोर्ट के वाट्सन होटल में प्रवेश से रोक दिए जाने की खुन्नस के चलते १९०३ में गेटवे ऑफ इंडिया के पास जग विख्यात ताजमहल होटल बनवाकर निकाली थी-भारत का सर्वश्रेष्ठ होटल। आखिर सवाल था नाक का! पारसी समुदाय की नाक शुरू से ऊंची रही है। आप किसी भी बावा-बावी (लोकप्रिय संबोधन) से मिलें-उनकी और किसी बात से प्रभावित हों या न हों उनके चरित्र से जरूर होंगे। इसका मूल है उनका स्वाभिमान। ज्यादातर पारसियों में इसे इंगित करती है उनकी नाक। पारसियों को अपनी नाक पर खुद हंसना आता है। ‘पारसी नाक’ या ‘पार्शियन नाक’ अक्सर लंबी, ऊंची, सूंड या कूबड़नुमा थोड़ी उठी हुई होती है। अपने पुâजी एफएक्स कैमो से पोरस मुंबई में जगह-जगह घूमकर इन दिनों फोटो सेशंस से इन्हीं दिलचस्प नाकों की ‌विरासत संजो रहे फैशन  फोटोग्राफर दंपति पोरस वीमादलाल और स्टाइलिस्ट प्रयाग मेनन का ‘नोज प्रॉजेक्ट’ अपने अध्ययन और शोध के लिए दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्हें दूर-दूर से दरियाफ्त के फोन आ रहे हैं। पाकिस्तान ‌सहित विदेशों से भी जहां-जहां भी पारसी बसे हुए हैं। एक ‌डिजिटल एजेंसी में प्रोड्यूसर २८ वर्षीय गुलनाज सिगनपोरिया बताती हैं, ‘पहले मुझे अपने दोस्तों की सीधी-सुडौल नाक देखकर रश्क होता था। अब नहीं होता। क्योंकि मुझे लगने लगा है कि यह नाक मेरे वजूद का हिस्सा है। यही फबेगी।’ पोरस और मेनन की योजना अब अपने फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी लगाने की है। इन्हें लेकर वे एक कॉफी टेबल भी बनाने जा रहे हैं।
सूखने लगी है वंशबेल
यह पारसी नाक हमेशा ऊंची रहने वाली है। पर सिलसिला जारी रहे इसके लिए पारसियों को अपनी आबादी बढ़ाने की फिक्र करनी चाहिए, ताकि तेजी से लुप्तमान उनके समुदाय की अस्तित्व रक्षा की जा सके। पूरी दुनिया में आज सवा लाख से दो लाख के बीच पारसी ही बचे हैं, जिनमें से ७० फीसदी (२०११ की जनगणना के महज ५७२६४) भारत में रहते हैं। देश की हर जनगणना में उनकी आबादी १० प्रतिशत गिरती ही जा रही है। देश भर में प्रति हजार २३ की जन्मदर के मुकाबले पारसियों में यह दर गिरकर सात से भी कम पहुंच गई है। मुंबई में जहां विश्व में सबसे ज्यादा पारसी रहते हैं-अब इस समुदाय के ४०००० से भी कम लोग बच रहे हैं। मंजर यही रहा तो २०५० आते-आते उनकी आबादी सिकुड़कर ३६००० रह जाएगी। पर उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। सात वर्ष पहले ‘जियो पारसी’ अभियान जब से आरंभ हुआ है, तब से मुरझा रही पारसियों की वंशबेल में फिर से फूल खिलने शुरू हो गए हैं।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

अन्य समाचार