मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : १८५७ के गदर के योजनाकार, रंगोजी बापू

मुंबई मिस्ट्री : १८५७ के गदर के योजनाकार, रंगोजी बापू

विमल मिश्र मुंबई

घनी मूंछें, माथे पर तिरछा तिलक, सिर पर फेटा, कंधे पर उत्तरीय, पंडिताऊ धोती और घुटनों से नीचे आया बंद गले का कोट। १९वीं सदी के बीच के दशक का कोई दिन। लंदन की सड़कों पर कुछ लोग ‘अजीबो-गरीब’ शख्स को देखकर भारत से आया कोई ब्राह्मण समझकर दिल्लगी करने लगे। उन्हें क्या अंदाज होता कि यह शख्स तो उनके देश से भारत गई ईस्ट इंडिया कंपनी के खात्मे की शुरुआत का सबब बन जाएगा। यह शख्स थे महाराष्ट्र से आए रंगोजी बापू जी गुप्ते। रंगोजी बापू सातारा में १,८०० के लगभग एक चंद्रसेनी कायस्थ प्रभु कुल में रामाजी के घर पैदा हुए थे। रामाजी वहां के शासक छत्रपति प्रताप सिंह के वफादार थे, जिन्हें प्रताप सिंह दरबारी कम, मित्र ज्यादा समझते थे। पूर्व शासक अप्पा साहब ने प्रताप सिंह को अपने उत्तराधिकारी के रूप में गोद लिया था, लेकिन अंग्रेजों ने यह दलील देकर पेंशन का उनका दावा मानने से इनकार कर दिया था कि प्रताप सिंह उनके भाई थे, न कि बेटा और सातारा को अधिग्रहित कर लिया।
रंगोजी बापू १२ सितंबर, १८३९ को मुंबई से इसीलिए रवाना हुए थे कि ब्रिटिश संसद के सामने अपील कर अंग्रेजों से स्वामी का वाजिब हक दिलवाएंगे। लंबी यात्रा के बाद रंगोजी बापू दिसंबर के अंत में लंदन पहुंचे और पहला काम किया अंग्रेजी सीखना। प्रताप सिंह के लिए इंसाफ हासिल करने के लिए दर-दर भटकते रहे। लीड्स हॉल स्ट्रीट में अंग्रेज बैरिस्टरों की फीस के के लिए उनकी पाई-पाई खर्च हो गई। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को पेंशन के अनुरोध के लि‌ए १८४७ की २६ मई और ११ नवंबर को दो पत्र लिखे, पर कंपनी के अफसरों से हर बार इनकार ही मिला। जब प्रताप सिंह का निधन हो गया, तब उन्होंने प्रताप सिंह के दत्तक पुत्र शाहू प्रताप सिंह के नाम से मुकदमा जारी रखा। निराश होकर जब उन्होंने स्वदेश लौटना चाहा तो वापसी के पैसे ही नहीं थे। उनके भाई रावजी बापू कर्ज के बोझ तले दबे हुए थे। रावजी ने वापसी के लिए धन एकत्र करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
रंगोजी बापू के जुझारूपन की खबर इस बीच लंदन में पैâल चुकी थी। १८५३ में उनका लंदन में सांसदों और अन्य प्रतिष्ठित लोगों द्वारा नागरिक सम्मान किया गया और चांदी की पालकी उन्हें भेंट की गई। ब्रिटेन में १४ वर्ष बिताने के बाद इसी वर्ष वे सातारा लौट आए। अंग्रेजों के प्रति गहरी घृणा और विद्वेष ने उन्हें अंग्रेजों का कट्टर शत्रु बना दिया था। लंदन में उनकी एकमात्र उपलब्धि थी असाधारण प्रतिभा के धनी अन्य क्रांतिकारी अजीमुल्ला खान से मित्रता, जो स्वयं भी नाना साहब पेशवा की पेंशन के कार्य के लिए वहां गए हुए थे और जिनके अनुभव भी उन्हीं के जैसे थे। प्रतिशोध की आग में जलते हुए दोनों ने योजनाबद्ध तरीके से ब्रिटिश साम्राज्य को धराशायी करने का संकल्प लिया।
विप्लवियों के संगठनकर्ता
रंगोजी बापू ने १८५४ से ही युद्ध के लिए तैयारी शुरू कर दी थी। उन्होंने विप्लवियों के संगठन बनाकर शहरों से लेकर ग्राम स्तर तक भर्तियां शुरू कर दीं। रंगरूटों को वे खुद ही घुड़सवारी और शस्त्र चलाना सिखाते। इसी वर्ष जुलाई से दिसंबर, १८५५ तक वे उत्तरी भारत के विभिन्न स्थानों पर जाकर रहे और लोगों को संगठित करते रहे। इनमें सबसे प्रमुख नाम थे बिठूर में नाना साहेब पेशवा और तात्या टोपे के। निश्चित योजना के तहत इन संगठनों के लोगों नो जिनमें हिंदू, मुस्लिम और सिख-सभी थे। सातारा, कोल्हापुर, सांगली, धारवाड़, कराड, बेलगांव, मुंबई और हैदराबाद जैसे स्थानों पर ब्रिटिश सेना में घुसपैठ कर ली। १८५७ के जून में सातारा के निकट पारली भड़क उठा। पारली वही स्थान था, जहां १६७४ में काशी से आए गागा भट्ट ने शिवाजी का राज्याभिषेक किया था। ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि क्रांति की पहली चिंगारी पारली के किला से ही उठी थी और यह भड़काई थी रंगोजी बापू ने। गोरे यवतेश्वर और महाबलेश्वर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह के लिए भी उन्हें ही जिम्मेदार मानते थे। रंगोजी बापू ने अपने दो भतीजों यशवंतराव और वामनराव की अगुवाई में ५०० मावलों की एक फौज को दिल्ली के युद्ध में भी भाग लेने के लिए भेजा।
कोल्हापुर के विद्रोह में उनके पुत्र सीताराम को पकड़कर फांसी दे दी गई। रंगोजी बापू को पहले रत्नागिरी और फिर ग्वालियर जेल में रखा गया, जहां से ५ जुलाई, १८५७ को वे भाग निकले। इसी वर्ष ठाणे के जांभली नाका में वे अपने संबंधी प्रभाकर विट्ठल गुप्ते के घर एक धार्मिक अनुष्ठान में आए थे, पर पुलिस को उनका सुराग मिल गया और वे एक महिला का वेष धारण करके गायब हो गए। अगले वर्ष एक विश्वासघाती मित्र ने उन्हें फिर पकड़वाना चाहा, तब वे फरार हो गए। ब्रिटिश सरकार ने रंगोजी बापू को पकड़वाने के लिए ५,००० रुपए का इनाम घोषित किया, पर उनका आखिर तक पता तक नहीं चला। कुछ लोगों ने यवतमाल के दरभा कस्बे में उन्हें वैरागी दरगाह के बाबा के रूप में देखने का दावा किया है। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि संभवत: वे मद्रास में अपने मित्र मि. ब्राउन के पास मद्रास चले गए हों। सातारा ने ‘चारभिंती स्मारक’ के रूप में उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखा है। ठाणे का जांभली नाका उनके सम्मान में ‘रंगोजी बापू चौक’ कहलाता है।

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