मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : श्यामजी कृष्ण वर्मा, पहले आधुनिक क्रांतिकारी

मुंबई मिस्ट्री : श्यामजी कृष्ण वर्मा, पहले आधुनिक क्रांतिकारी

विमल मिश्र मुंबई

पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा उद्भट संस्कृत विद्वान, समाज सुधारक, वकील, पत्रकार और ऑक्सफोर्ड के पहले भारतीय ‘बार एट लॉ’ थे। सदी के उत्तरार्ध व २० सदी के पूवार्ध के सारे क्रांतिकारियों के अनुप्रेरक और सही अर्थों में भारत के पहले आधुनिक क्रांतिकारी।

गदर के वर्ष १८५७ की ४ अक्टूबर को कच्छ (गुजरात) के मांडवी में जन्मे पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा। भुज में प्राथमिक शिक्षा के बाद जब वे ११ वर्ष के थे माता गोमतीबाई का साया उनके सिर से उठ गया और रोजी-रोटी की तलाश उनके पिता करसन भानुशाली को मुंबई ले आई। यहां एक भाटिया व्यापारी की मदद से विल्सन स्कूल में अंग्रेजी और संस्कृत पाठशाला में देवभाषा पढ़ते श्यामजी ने ऐसी पारंगतता हासिल कर ली कि दोनों भाषाओं में धाराप्रवाह भाषण देने लगे। वे पहले ऐसे गैर ब्राह्मण थे, जिन्हें काशी के विद्वतसमाज ने १८७७ में ‘पंडित’ की उपाधि से विभूषित किया। कच्छ राज्य की छात्रवृत्ति पर मार्च, १८७९ में वे इंगलैंड में थे। चार वर्ष बाद आक्सफोर्ड (बलियोल कॉलेज) से एम. ए. और ‘बार एट लॉ’ करने वाले वे पहले भारतीय बने।
१८८३ में भारत आकर ३१ महीने गुजारने के बाद लौटे पत्नी भानुमति को साथ लेकर। बैरिस्टरी की डिग्री से लैस होकर एक बार फिर स्वदेश आए और १९ जनवरी, १८८५ को हाई कोर्ट में रजिस्ट्री कराकर मुंबई में वकालत करने लगे। इंगलैंड लौटने से पहले कुछ वर्ष उन्होंने अजमेर में बैरिस्टरी और रतलाम, उदयपुर व जूनागढ़ रियासतों में दीवानी करते हुए निकाले। जनवरी, १९०५ में श्यामजी ने ‘इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ नामक मासिक पत्र निकाला। इसी साल लंदन के एक पॉश इलाके में स्वराज्य के लिए इंडियन होम रूल सोसायटी और नस्लवाद के शिकार भारतीय विद्यार्थियों के लिए इंडिया हाउस की स्थापना हुई।
गांधी और लेनिन का साथ
इंडिया हाउस में १८५७ के गदर की स्वर्ण जयंती और लाला लाजपत रॉय की गिरफ्तारी व सरदार अजीत सिंह (सरदार भगत सिंह के चाचा) के देश-निकाले का विरोध जैसे आयोजन होते रहते थे और उनमें भाग लेने और उनसे राय-मशविरा करने महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, गोपाल कृष्ण गोखले, दादाभाई नौरोजी, लाला परमानंद, विट्ठलभाई पटेल व वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ लेनिन जैसे लोग भी आया करते थे। श्यामजी ने यहां इंडियन होमरूल आर्गना‌इजेशन की भी स्थापना की थी। इन सब कामों में उनका साथ देते रहे लाला हरदयाल, मैडम भीकाजी कामा, वीरेंद्र चट्टोपाध्याय, सरदार सिंह राणा, वीरचंद गांधी, जे. एम. पारीख, अब्दुल्ला, सुहरावर्दी, गाडरेज और जे. सी. मुखर्जी।
भारत सचिव के एडीसी कर्जन वाइली का गोली चलाकर वध करनेवाले मदन लाल धींगरा के समर्थन और प्रâांसीसी सिपाहियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के विरुद्ध वीर सावरकर को ब्रिटिश पुलिस को सौंपे जाने के विरुद्ध आंदोलन श्यामजी ने डंके की चोट पर चलाए। ये दोनों ही क्रांतिकारी इंडिया हाउस से संबद्ध रहे थे। ब्रिटिश सरकार के निशाने पर आकर १९१० में ‌इंडिया हाउस बंद हो गया।
अपने इन दुस्साहसों के लिए श्यामजी को आजीवन खामियाजा भुगतना पड़ा। सदस्यता समाप्त कर बैरिस्टरी से भी वंचित कर दिया गया। आखिर १९०७ के एक दिन जब उन्हें गिरफ्तार किया जाना तय था, वे लंदन छोड़ चुपचाप पेरिस रवाना हो गए। यहां क्रांतिकारियों को संगठित करते और भारतीय स्वतंत्रता के लिए यूरोपीय देशों का समर्थन जुटाने के साथ उन्होंने लाला हरदयाल को रखकर ‘वंदे मातरम’ जैसा अखबार निकाला। ब्रिटेन और प्रâांस के बीच एक गोपनीय समझौते के कारण पेरिस भी निरापद न लगने पर २३ अप्रैल, १९१४ को जिनेवा की शरण लेनी पड़ी।
विश्वासघात का‌ निशाना
भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम १८५७ में हुआ था, पर ज्यादातर लोगों को मालूम नहीं कि गदर पार्टी के झंडा तले (शुरूआत २१ अप्रैल, १९१३) एक दूसरा स्वतंत्रता संग्राम भी था जो विदेश की जमीन से लड़ा गया था और जिसकी कमान संभाली थी वहां आकर बसे स्वतंत्रता सेनानियों ने। इस पार्टी से बिना सीधे जुड़े इसमें योगदान देने वालों में श्यामजी का नाम अग्रपंक्ति में आता है। प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो चुका था। विश्वयुद्ध को माकूल अवसर समझकर बाघा जतिन और रासबिहारी बोस सरीखे क्रांतिकारी भारत में गदर के फिराक में थे। श्यामजी ने भरपूर कोशिश की, पर स्विट्जरलैंड सरकार ने राजनीतिक प्रतिबंध लगाते हुए क्रांतिकारी साथियों की किसी तरह प्रत्यक्ष मदद करने से उनके हाथ बांध दिए। जिंदगी के आखिरी दिनों में यह जानकारी उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं थी कि प्रो इंडिया कमिटी के अध्यक्ष जिस ब्रीस को उन्होंने परम मित्र समझा वह तो ब्रिटिश सरकार का पेड एजेंट था। जहां पत्नी के साथ, लगभग निस्संग जीवन बिताते हुए एक अस्पताल में ३० मार्च, १९३० को रात्रि ११.३० बजे उनका देहांत हो गया।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

अन्य समाचार