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मुंबई मिस्ट्री : वह तिरंगा देशाभिमान का

विमल मिश्र
मुंबई

यह जानकीदास मेहरा की विजय का क्षण था और समूचे राष्ट्र के अभिमान का। हिंदी फिल्मों में चरित्र अभिनेता के रूप में एक बड़ी पारी खेलने से पहले जानकीदास एक प्रसिद्ध खिलाड़ी थे। अंग्रेजी राज में अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते समय जब ब्रिटिश ध्वज के अधीन ही खेलने की बाध्यता थी उन्होंने तिरंगा फहराकर ‌बर्तानिया हुकूमत को सीधे-सीधे चुनौती दे दी थी।

सा‌इकिल चलाना जानकीदास का शौक था। इसे अपना कैरियर बनाकर खेल प्रतियोगिताओं में उन्होंने सफलताओं और कीर्तिमानों का तांता लगा दिया था। १९४६ में यह उन दिनों की बात है, जब उनका नाम ज्यूरिख में होनेवाले अंतर्राष्ट्रीय खेलों में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में चुना गया।
यह खबर महात्मा गांधी ने सुनी तो भारत के युवकों के भविष्य की सफलता का सूचक बताते हुए इसे अपने ‘हरिजन’ पत्र में सुर्खियों में जगह दी। जानकीदास खुशी से फूले न समाए और समय लेकर उनसे भेंट करने उनके पास पहुंच गए। गांधीजी ने उन्हें आशीर्वाद और शुभकामना तो दी, पर इन खेलों में भारत के झंडे के साथ भाग लेने को कहा। ‘यह वैâसे संभव है?’ जानकीदास ने मन ही मन सोचा। अंग्रेजी राज में अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते समय ब्रिटिश ध्वज के अधीन ही खेलने की बाध्यता थी और इसके उल्लंघन का सीधा मतलब था वैâरियर तबाह करने के साथ अपनी जान सांसत में डाल लेना। उस समय कांग्रेस के तिरंगे की राष्ट्रीय ध्वज जैसी मान्यता थी। जानकीदास ने तय कर लिया कि चाहे जो हो, वे बापू की यह इच्छा जरूर पूरी करेंगे।
ज्यूरिख में साइकिल रेस की नियत इवेंट के दिन जब जानकीदास मैदान में उतरे तो तिरंगा उनके वस्त्रों के भीतर ही छिपा था। स्टेडियम में मौजूद लाखों की भीड़ ने दम साधकर यह नजारा देखा-भारत देश से आया एक युवक गांधीजी द्वारा भेंट किया तिरंगा शान से लहरा रहा है। जानकीदास को इस दुस्साहस का दंड तुरंत मिला। प्रतिस्पर्धाओं में भागीदारी पर प्रतिबंध और तुरंत भारत वापसी। उनकी ही बनाई फिल्म ‘एक झंडे की कहानी’ इतने वर्षों बाद आज भी उस घटना की याद दिलाती है।
आठ विश्व साइकिलिंग
रिकॉर्ड और १००० ‌फिल्में
जनवरी, १९१० में लाहौर में जन्में जानकीदास मेहरा विश्व स्तर के सा‌इकिल चालक थे। उन्होंने १९३४ और १९४२ के बीच आठ विश्व साइकिलिंग रिकॉर्ड तोड़े। वे १९३८ में सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटिश साम्राज्य खेलों और १९४० में टोक्यो के पूर्वी खेलों में भारत के एकमात्र प्रतिनिधि रहे। उन्होंने १९३६ के बर्लिन ओलंपिक खेलों में अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति के एकमात्र भारतीय सदस्य के रूप में भाग लिया। वे नेशनल साइक्लिस्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के संस्थापक थे।
जानकीदास हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेताओं में से हैं। १९३३ से १९९७ तक छह दशकों में पैâले अपने फिल्मी वैâरियर में उन्होंने १००० से अधिक फिल्मों में विभिन्न भूमिकाएं निभार्इं। वे बॉलीवुड के पहले प्रोडक्शन डिजाइनर भी कहलाते हैं। १९५५ में फिल्म ‘यादों की काम’ की पटकथा के अलावा उन्होंने ‘माई एडवेंचर्स इन फिल्मलैंड’ और ‘एक्टिंग फॉर बिगिनर्स’ जैसी कई किताबें भी लिखीं। १९९६ में उन्हें इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन द्वारा ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया। हृदय गति रुक जाने से १८ जून, २००३ को जुहू स्थित आवास पर उनका देहांत हो गया। जुहू स्थित मुंबई का प्रसिद्ध पृथ्वी थिएटर उन्हीं के आवास से संचालित होता है।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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