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मुंबई मिस्ट्री : जल्द बदलेगी वालधुनी की सूरत! एमआरडीए की योजना में नदी बनी नाला

विमल मिश्र

एमएमआरडीए ने खुद अपनी क्षेत्रीय योजना में वालधुनी का ‘नदी’ नहीं, ‘नाला’ कहकर जिक्र किया है। अगर वालधुनी की योजनाओं पर सही ढंग से अमल हुआ तो यह अपना पूर्व स्वरूप हासिल कर सकती है। पर, सवाल है ‘कब’?
वालधुनी नदी अंबरनाथ के पहाड़ों से कोकाले गांव के पास निकलती है और वडोल गांव, उल्हासनगर रेलवे स्टेशन, हीराघाट, शांतिनगर, सेंचुरी रेयन सोसायटी के पीछे होकर सीधे कल्याण की खाड़ी में गिरती है। कुछ वर्ष पहले यह उस समय की बात है। जब वालधुनी के प्रदूषण को लेकर एक ओर जहां अदालती लड़ाइयां जारी थीं, वहीं दूसरी ओर जन आंदोलन जोरों पर था। ऐसे में अचानक अदालत भी यह जानकर दंग रह गई कि जिसे सरकारी रिकॉर्ड्स में नदी कहकर संबोधित किया गया है, उसका खुद एमएमआरडीए की क्षेत्रीय योजना में नदी नहीं, नाला के नाम से जिक्र है।
दुर्भाग्य से सच यही है। कभी कल-कल बहनेवाली सदाबहार वालधुनी वास्तव में इसी स्थिति को प्राप्त हो चुकी है। उल्हासनगर स्टेशन के ठीक सामने से गुजरनेवाली इस नदी की दुर्दशा झलकती है। दूर से ही गंध छोड़नेवाला इसका बदबूदार पानी आपको कई बार झाग से भरा और पूरी तरह लाल व नारंगी दिखाई देगा। यह जिन-जिन क्षेत्रों से होकर बहती है। इससे स्थानीय लोगों को बहुत-सी बीमारियों से जूझना पड़ता है। जैसे आंखों, सीने में जलन, शरीर में दर्द और उल्टी आदि की शिकायत लोगों का वहां के डॉक्टरों की क्लीनिकों में तांता लगा रहता हो।
वालधुनी के आस-पास स्थित कारखानों, खासकर इस विषैले पानी का कारण डाइंग और जींस वाशिंग यूनिटों द्वारा छोड़े जानेवाले प्रदूषित रासायनिक पानी को जिम्मेदार बताया जाता है। नदी की अवैध पटाई भी बदूस्तर जारी है और भूमि माफियाओं ने नदी के दोनों किनारों, यहां तक‌ कि तलहटी पर भी अवैध अतिक्रमण कर रखा है। इससे नदी की ८० फुट चौड़ाई घटकर अब ४० फुट रह गई है। इस वजह से जरा-सी बारिश होने पर बाढ़ आना यहां आम बात है। गौरतलब हो कि ‘वनशक्ति’ के डॉयरेक्टर स्टालिन दयानंद सहित पर्यावरणविद और हीराली फाउंडेशन सहित कई संगठन इन कारखानों के खिलाफ मुख्यमंत्री और पर्यावरणमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक से शिकायत कर चुके हैं। नतीजतन, आस-पास के जींस निर्माण यू‌निट्स के साथ कई कारखानों को बंद भी कराया जा चुका है। उल्हानगर और अंबरनाथ की ५० से ज्यादा कंपनियों को रेड जोन क्लोजर नोटिस भी जारी किया जा चुका है। लोगों को उम्मीद है कि इस कार्रवाई से जल्द ही इसके सार्थक परिणाम दिखेंगे।
जारी है योजनाओं पर काम
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार वालधुनी के जल को प्रदूषण से बचाने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने और ट्रीटमेंट कर उसे कल्याण खाड़ी में छोड़ने सहित कई योजनाएं विभिन्न चरणों में हैं। इस पर समयानुसार अमल न करने पर सरकार पर कई बार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का अदालती कोप बरस चुका है। २०१७ में सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय के बाद, जिसमें उसने उल्हास और वालधुनी नदियों की साफ-सफाई और पुराने रूप में उनकी उद्धार के लिए १०० करोड़ रुपए जारी करने का आदेश दिया था। महाराष्ट्र सरकार ने दोनों नदियों की स्वच्छता के लिए १०१.३४ करोड़ आवंटित किए थे। जैसा कि वालधुनी अंबरनाथ मंदिर परिसर से होकर भी गुजरती है। स्थानीय सांसद की १५ करोड़ रुपए की निधि से भी बीते वर्षों में मंदिर परिसर से होकर गुजरनेवाली इस नदी को भूमिगत करने, उस पर पुल के निर्माण, प्रवेश द्वार पर कमान के निर्माण सहित समूचे मार्ग के निर्माण, स्वच्छता गृह, पार्विंâग, उद्यान, प्रदर्शनी, थिएटर, कुंड के सौंदर्यीकरण, वॉक-वे जैसी सुविधाओं पर कुछ काम हुआ भी है। यह नदी जिस दुर्दशा से गुजर रही है, उसके ५० वर्ष वाले पहले स्वच्छ स्वरूप को जल्द देख पाना अभी सपना सा ही लगता है।
(जारी)
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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