मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : स्वतंत्रता संग्राम का ‘सेनापति’

मुंबई मिस्ट्री : स्वतंत्रता संग्राम का ‘सेनापति’

  • विमल मिश्र

पांडुरंग महादेव बापट – यह नाम आपने सुना है? शायद नहीं। मुंबईकर उन्हें ‘सेनापति बापट’ के नाम से ही जानते हैं, जिनके नाम पर दादर-लोअर परेल के बीच एक प्रसिद्ध सड़क है।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उन्हें ‘महात्मा गांधी और विनायक दामोदर सावरकर का अपूर्व मिश्रण’ मानते थे और साने गुरुजी ‘छत्रपति शिवाजी महाराज, समर्थ गुरु रामदास और संत तुकाराम की त्रिमूर्ति’। देश के स्वतंत्रता संग्राम ने उन्हें ‘सेनापति’ के नाम से इतना मशहूर किया कि आज उनके असली नाम ‘पांडुरंग महादेव बापट’ से बहुत कम ही लोग जानते हैं। सेनापति बापट को मुंबईवासियों ने मुख्य शहर के एक मशहूर कारोबारी इलाका- जो ६९ वर्ष के उनके जीवनकाल में उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र रहा- दादर से लोअर परेल जानेवाली ६.३ किलोमीटर लंबी उस विख्यात सड़क के रूप में याद रखा है, जो माहिम से ई. मोजेज रोड के रास्ते पश्चिम रेलवे के लाइन के समानांतर गुजरती है। पुराने जमाने के लोगों की जुबान पर इसका एक और नाम चढ़ा है- ‘तुलसी पाइप रोड’ जो सदी से भी ज्यादा समय तक तुलसी झील से मलबार हिल सहित दक्षिण मुंबई की जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत हुआ करती थी। एक सेनापति बापट मार्ग पुणे में भी है।
आंदोलनों की धरती
मिलों और मिल कामगारों की बसाहट के कारण कभी गिरणगांव कहलानेवाले इस इलाके में अब मिलें गायब हो चुकी हैं। नन्हें क्वॉर्टर्स वाली बौनी इमारतें ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं, लकदक
मॉल्स और शानदार रेस्टोरेंट्स में बदल गई हैं। आज जिस इलाके में फिनिक्स मॉल है कभी सेनापति बापट के आंदोलनों से लबरेज हुआ करता था। इनमें दो सभाओं का नेतृत्व नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने खुद किया था। देश की स्वतंत्रता के दिन १५ अगस्त को यहां पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराने का सौभाग्य सेनापति बापट को ही हासिल है।
सेनापति बापट महाराष्ट्र के पहली पंक्ति के स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं। १९०२ में जब वे छात्र थे, तभी उन्होंने मातृभूमि की सेवा करने की शपथ ले ली थी। महाराष्ट्र के पारनेर में १२ नवंबर, १८८० को महादेव व गंगाबाई के घर जन्मे बापट ने नगर से मैट्रिक और पुणे के डेक्कन कॉलेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। मुंबई में कुछ समय स्कूल में अध्यायन करने के बाद एक वजीफे  पर स्कॉटलैंड जाकर उन्होंने इजीनियिंरग की पढ़ाई की। क्रांति का पहला पाठ उन्होंने लंदन के इंडिया हाउस में रहते हुए महान क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर की संगत में पढ़ा। स्काटलैंड में निशानेबाजी और पेरिस में बम बनाना सीखने के साथ।
जेल बन गया था दूसरा घर
बापट जिन दिनों लंदन में रह रहे थे ‘ब्रिटिश साम्राज्य में भारत’ संबंधी विषय पर भाषण देने एक बार उनका एक संगोष्ठी में जाना हुआ, जिसमें उन्होंने अंग्रेज शासन पर जमकर प्रहार किए। इसकी कीमत उन्हें छात्रवृत्ति गंवाने के रूप में चुकानी पड़ी। क्रांति की ज्वाला को तीव्र करने के उद्देश्य से वे भारत लौट आए। कोलकाता में क्रांतिकारियों के साथ उनके संपर्क के दो महीने बाद की बात है। नरेंद्र गोस्वामी नामक क्रांतिकारी एक बम प्रकरण में गिरफ्तार होकर मुखबिर बन गया था, जिसकी परिणति साढ़े चार वर्ष बाद इंदौर में बापट की गिरफ्तारी के साथ हुई। १ नवंबर, १९१४ को उन्हें बेटा हुआ, तब उसके नामकरण पर प्रथम भोजन हरिजनों को कराने का साहसिक कार्य किया था बापट ने।
मुलशी आंदोलन ने बनाया ‘सेनापति’
१९२० में बापट की पत्नी का निधन हो गया। झाडू-कामगार मित्रमंडल बनाया और २ अगस्त, १९२० से चल रही श्रमिक मेहतरों की मुंबई में चल रही हड़ताल का नेतृत्व किया। फिर राजबंदी मुक्ति मंडल की स्थापना कर अंडमान में कालेपानी की सजा भोग रहे क्रांतिकारियों की मुक्ति के लिए अभियान चलाया। सह्याद्रि पर्वत का मुलशी बांध आंदोलन बापट के जीवन का अन्य स्वर्णिम पृष्ठ है। मुला व निला नदियों के संगम पर टाटा कंपनी  के इस प्रस्तावित बांध की चपेट में ५४ गांव और उनकी खेती थी। विनायक राव भुस्कुटे के इस आंदोलन में भाग लेने पर १ मई, १९२२ को बापट गिरफ्तार कर छह माह के लिए येरवडा जेल भेज दिए गए। २३ अक्टूबर, १९२३ को इस प्रकरण में वे तीसरी बार गिरफ्तार हुए और छूटते ही हाथ में तलवार, कमर में हथियार और दूसरे हाथ में पिस्तौल लेकर ट्रेन रोकने के लिए रेल पटरी पर फिर खड़े हो गए। इस बार उन्हें सिंध प्रांत के हैदराबाद में सात वर्ष उन्हें एकाकी जेल काटनी पड़ी। उन्हें ‘सेनापति’ का खिताब दिलाने में मुलशी आंदोलन का ही हाथ है। रिहाई के बाद २८ जून, १९३१ को उन्हें महाराष्ट्र कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। विदेशी बहिष्कार आंदोलन ने उन्हें फिर जेल पहुंचा दिया। इस बार उन्हें सात वर्ष के ‘कालापानी’ तथा तीन वर्ष के दूसरे कारावास की सजा मिली। इस दौरान बापट के माता-पिता की मृत्यु हो गई। येरवड़ा जेल में बंद गांधीजी के अनशन के समर्थन में बापट ने जेल में ही अनशन किया, जिसमें सेहत खराब होने पर उन्हें बेलगांव भेज दिया गया, जहां से २३ जुलाई, १९३७ को उन्हें रिहा कर दिया गया।
बापट एक अच्छे पत्रकार भी थे, उन्होंने लोकमान्य तिलक के ‘मराठा’ के अलावा लोक-संग्रह व ‘चित्रमय जगत’ व ‘ज्ञानकोश’ नामक पत्र-पत्रिकाओं में लेखों और स्तंभों के माध्यम से पत्रकारिता किया। २८ नवंबर, १९६७ को उनका देहावसान हो गया। १९७७ में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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