मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री: इतिहास ने जिन्हें भुला दिया- उमाबाई कुंदापुर

मुंबई मिस्ट्री: इतिहास ने जिन्हें भुला दिया- उमाबाई कुंदापुर

मुंबई: विमल मिश्र 

उमाबाई कुंदापुर ने चारदीवारी में भी घूंघट में रहनेवाली महिलाओं को आजादी की लड़ाई से जोड़ा और नारीवादी आंदोलन व महिला उत्थान में अहम भूमिका निभाई। उमाबाई स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी दीपशिखा हैं, जिन्हें इतिहास ने भुला दिया।

उमाबाई का जन्म १८९२ में मैंगलूर के गोलीकेरी कृष्णा राव और जुगनाबाई के घर हुआ था। नौ वर्ष की आयु में संजीव राव कुंदापुर से उनकी शादी हुई और वे ‘भवानी’ से ‘उमाबाई कुंदापुर’ बन गई। मैट्रिक की परीक्षा पास कर वे मुंबई आ गर्इं और ‘गांवदेवी महिला समाज’ नाम से स्वयंसेवकों का समूह बनाकर महिलाओं को शिक्षा देने लगीं। १९२० में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के निधन पर जब उनकी शवयात्रा निकली तो उसमें उमाबाई ने पति के साथ भाग लिया। इस घटना ने उमाबाई के दिल में देश-प्रेम की लौ जला दी। इसी बीच तपेदिक से संजीव राव की मृत्यु हो गई। विधवा बहू के साथ परिवार मुंबई छोड़ अब हुबली आ बसा।

महात्मा गांधी का स्वदेशी आंदोलन जोर पकड़ रहा था। हुबली में कांग्रेस के सदस्य के रूप में उमाबाई घर-घर जाकर लोगों को खादी अपनाने के लिए जागरूक करतीं। स्वदेशी आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए वे घूम-घूमकर नुक्कड़ नाटक करने लगीं। श्वसुर आनंदराव ने बहू को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘कर्नाटक प्रेस’ के साथ ‘तिलक कन्या शाला’ और ‘भगिनी समाज’ भी खोल डाला। ‘कन्या पाठशाला’ ने उमाबाई को जहां महिला शिक्षा में दोबारा सक्रिय किया, वहीं ‘भगिनी समाज’ ने महिला स्वतंत्रता सेनानियों से जोड़ा। उमाबाई अब महिलाओं को समाज में व्याप्त रूढ़ियों को तोड़ने, खादी पहनने व चरखा चलाने और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़ने को प्रेरित करतीं राज्य और भारत भर का दौरा करने लगीं। इसी बीच उनकी भेंट डॉ. एन. एस हार्डिकर से हुई। अमेरिका से लौटे हार्डिकर हुबली में हिंदुस्तानी सेवा दल बनाकर देश के युवाओं को आजादी के लिए संगठित कर रहे थे। उमाबाई ने इस दल की महिला विंग की कमान थाम ली। १९२४ में कांग्रेस का अधिवेशन बेलगांव में हुआ। इस अधिवेशन में उमाबाई की मेहनत से महिलाओं ने बड़ी तादाद में घरों की दहलीज लांघकर भाग लिया। इनमें बच्चियों से लेकर विधवाओं तक-हर वर्ग की महिलाएं थीं। महात्मा गांधी ने उनकी संगठनिक कुशलता देख उन्हें कस्तूरबा ट्रस्ट की कर्नाटक शाखा का प्रमुख बना दिया। कस्तूरबा ट्रस्ट का गठन स्वयंसेवकों और ग्राम सेविकाओं के माध्यम से गांवों के लोगों को शिक्षा देने और उन्हें सेहतमंद और आत्म-निर्भर बनाने के लिए किया गया था।

अब आया १९३० का नमक सत्याग्रह। इसमें उमाबाई ने पूरी ताकत से भाग ‌लिया। नतीजा हुआ १९३२ में उनकी गिरफ्तारी। पुणे की यरवदा जेल में उन्हें चार महीने के लिए बंद कर दिया गया। इस दौरान ब्रिटिश सरकार ने उनके प्रेस और तिलक कन्या शाला को भी बंद करा दिया। श्वसुर का भी देहांत हो गया था। हुबली लौटकर उमाबाई ने अपने घर के दरवाजे जेल से बाहर आए बेघर, बेदखल और बेसहारा लोगों के लिए खोल दिए। १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में उनका यह घर एक बार फिर स्वतंत्रता सेनानियों के लिए आश्रय बना।
बिहार भूकंप में राहत कार्य

१९३४ में बिहार में जब भूकंप आया, तब उमाबाई स्वयंसेवकों को लेकर वहां लोगों की मदद करने के लिए पहुंची। दिन-रात जागकर उन्होंने घायल और बेसहारा लोगों की मदद की। उमाबाई ने वहां की महिलाओं को आजादी की लड़ाई से तो जोड़ा ही, उन्हें स्वयं सुरक्षा, बुनाई और श्रमदान, आदि कामों का और शिविरों में रहने का भी अभ्यस्त बनाया।
देश की आजादी के बाद उमाबाई चाहतीं तो कई बड़े राजनीतिक दल उनकी प्रतीक्षा में थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। यहां तक कि उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाला ताम्र-पत्र और भत्ता तक स्वीकार नहीं किया। वे दीर्घायु हुर्इं। १९९२ में १०० साल की उम्र में हुबली के अपने घर ‘आनंद स्मृति’ में देह छोड़ी। स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ही भागीदारी के लिए गांधीजी को राजी करने वाली कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने अपनी आत्मकथा ‘इनर रिसेस, आउटर स्पेसेस’ में उन्हें अपना प्रेरणा स्रोत माना है।

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