मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : महाराष्ट्र की धरा जिनकी कृतज्ञ है-भाग ४

मुंबई मिस्ट्री : महाराष्ट्र की धरा जिनकी कृतज्ञ है-भाग ४

विमल मिश्र
मुंबई

नरोत्तम मोरारजी, सर मथुरादास विस्सानजी, दयाराम मनुजा, नारायण देवराव पांढरीपांडे और आर. डी. गडकरी महाराष्ट्र के उन विरल स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं, जिन्हें समाजसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भी उतना ही जाना जाता है जितना देश की आजादी के लिए।

नरोत्तम मोरारजी
कोलाबा की डूगल रोड ‘नरोत्तम मोरारजी मार्ग’ के नाम से जानी जाती है। नौवहन और कपड़ा उद्योग के उस पुरोधा के नाम पर, जिसने देश के स्वतंत्रता संग्राम से भी गहरा नाता रखा। एलफिंस्टन कॉलेज में पढ़ाई करते समय ही उन्होंने मुंबई में मोरारजी गोकुलदास ‌मिल और सोलापुर में सोलापुर मिल की स्थापना कर दी थी। सिंधिया स्टीम एंड नेविगेशन कंपनी के रूप में २७ मार्च, १९१९ को नागरिक नौवहन के क्षेत्र में उन्होंने भारत का पहला कदम रखा। इसके कुछ ही दिनों बाद ५ अप्रैल को कंपनी का पहला जहाज एस. एस. रॉयल्टी मुंबई से लंदन की यात्रा पर रवाना हुआ। नरोत्तम मोरारजी के महात्मा गांधी, दादाभाई नौरोजी, मोतीलाल नेहरू, डॉ. एनी बेसेंट, रवींद्रनाथ टैगोर और सरोजिनी नायडू से घनिष्ठ संबंध थे। १९७७ में भारत सरकार के डाक टिकट छापकर उन्हें सम्मानित किया।
सर मथुरादास‌ विस्सानजी
मुंबई में अंधेरी मेट्रो और साकीनाका मेट्रो स्टेशनों के बीच पूर्वी और पश्चिमी उपनगरों को जोड़नेवाली सड़क जो आम जुबान में ‘अंधेरी-कुर्ला रोड’ है, दरअसल, स्वतंत्रता काल के कांग्रेस नेता सर मथुरादास‌ विस्सानजी की याद दिलाती है। घाटकोपर-वर्सोवा मेट्रो के आधे स्टेशन अकेले इसी सड़क पर हैं। कपड़ा और बीमा उद्योगों के प्रवर्तकों में नाम धराने वाले विस्सानजी को, जो इंडियन मर्चेंट्स चैंबर के अध्यक्ष भी रहे, चैंबर ने १९३५ में तत्कालीन बम्बई विधानसभा में अपना प्रतिनिधि चुना था। ‘सर’ की उपाधि उन्हें ब्रिटिश सरकार ने और डी.लिट. की उपाधि काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने दी थी। इंडियन एजुकेशन सोसायटी के अलावा वे अंधेरी एजुकेशन सोसायटी के अध्यक्ष भी रहे, जिस रूप में स्त्री शिक्षा सहित परोपकार के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य किए। ‘विस्सानजी एकेडमी’ उन्हीं के नाम पर है। महात्मा गांधी से अपनी निकटता के कारण १९२५-३८ काल में कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं में उनकी गिनती होने लगी थी।
दयाराम मनुजा
दयाराम मनुजा ने गांधीजी का सत्याग्रह देखा है पर उनके भीतर कोई गांधी छिपा है इसे उन्होंने जाना ही जन्म के ४१ साल बाद, जब मुंह पर ‘भाई-भाई’ के बोल लिए चीन ने सहसा भारत पर घात करके मित्रद्रोह का नया मुहावरा गढ़ा था। मनुजा उठे और राष्ट्रीय सुरक्षा कोष को अपनी महंगी मोटरसाइकिल भेंट कर आए। फिर एक दिन अपनी कृषि भूमि भी।
इसी १९६२ का एक वाकया था। सुबह की सैर को निकले मनुजा का मन उल्हासनगर की सड़कों की दुर्दशा देखकर रो उठा। उन्होंने संकल्प किया कि वे पंडित जवाहरलाल नेहरू या विजयलक्ष्मी पंडित को यहां लाकर इन सड़कों को सुधारकर रहेंगे और जब तक ऐसा नहीं कर पाएंगे पैरों में जूता नहीं डालेंगे। और उनके पांव नंगे ही रह गए। जब गांधी की याद किताबों और रूटीन आयोजनों में बंधकर रह गई है। आजादी के बाद सिंध से उल्हासनगर आकर बसा यह नंगे पांव गांधीवादी बुजुर्ग पचास साल से भी अधिक चरखे के रूप में गांधी की थाती को सीने से चिपटाए बैठा रहा और अपने ही हाथों के बुने कपड़े पहनता रहा। गांधी शताब्दी पर उन्होंने महाराष्ट्र के १०१ गांवों में घूमकर सफाई व शिक्षा का अलख जगाया और चौथेपन में भी अंबरनाथ के पास बोनवली गांव में रामराज्य आश्रम के माध्यम से रामराज्य लाने के बापू के सपनों को साकार करने में अपने निर्बल हाथों का जोर लगाता रहा।
नारायण देवराव पांढरीपांडे
‘गोमये वसति लक्ष्मीहि, पवित्रे सर्व मंगला’-गोमाता की महिमा का बखान इससे पहले बहुतों के मुंह से सुना, पर नारायण देवराव पांढरीपांडे सरीखा इस महिमा का खुशहाल परिणाम लोगों के खेत-खलिहान, घर-परिवार तक पहुंचाने का काम कम ही लोगों ने किया होगा। पुसद के डॉ. कुमारप्पा गोवर्धन केंद्र और ‘कुमार अंगराग’, चूना, रुतराज थर्मोस्टेटिक प्लास्टर, दवाएं, साबुन व धूपबत्तियां बनाने के अलावा इस गांधीवादी बुजुर्ग ने गाय के गोबर से एक ऐसे कंपोस्ट नादेप खाद को ईजाद किया, जो आज चार दशक बाद भी देश के खेतों में सोना उगल रही है। स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों की लाठियां खाने व भूमिगत होनेवाले नारायणभाई सेवाग्राम में गांधी जी की पुकार पर ग्रामीण पुनर्निर्माण का व्रत लिया और उसे अपने संस्थानों में लागू करते फिरे।
आर. डी. गडकरी
कर्जत व आसपास के आदिवासी गांवों में गांधीवादी नेता आर. डी. गडकरी ने जब कुष्ठ मुक्ति का अभियान छेड़ा तो ऐसे तमाम रोगी परिवार व समाज से त्याज्य, अलहदा झोपड़ों में बंद पड़े थे। गडकरी की कोशिशों से वे वापस अपने घर-परिवारों में लौटे और उनके प्यार व देखभाल से आश्चर्यजनक रूप से चंगे होने लगे। इन गांवों में शिक्षा का अलख जगाने के लिए उन्होंने अभिनव ज्ञान मंदिर के तत्वावधान में जो विद्यालय खोले थे उनके विद्यार्थी ऐसे में उनके बहुत काम आए। कुष्ठ के विरुद्ध अपने संघर्ष में आकंठ जूझते हुए उन्होंने हजारों जिंदगियों को तिल‑तिलकर मिटने से बचाया है।
(जारी)

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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