मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामुंबई मिस्ट्री: लाइफलाइन का रिमोट कंट्रोल!

मुंबई मिस्ट्री: लाइफलाइन का रिमोट कंट्रोल!

विमल मिश्र / मुंबई।  पहले बेस्ट के बस स्टॉप और अब मेट्रो ट्रेनों के पिलर जब मेल-जोल का ठिकाना नहीं बने थे, रेल स्टेशनों के इंडिकेटर तब से यह काम कर रहे हैं। ये इंडिकेटर महज लोकल ट्रेनों के आने-जाने की इत्तिला नहीं हैं, ये शहर की भागती-दौड़ती जिंदगी का सूचक हैं-एक तरह से मुंबई की लाइफलाइन का रिमोट कंट्रोल।

बारिशों में बीच पटरी पर रुक जाना लोकल ट्रेनों की पुरानी समस्या है और इंडिकेटरों का ‘ब्लैंक’ हो जाना भी। पुराने दिनों में जब आज जैसी घोषणा प्रणाली नहीं थी, न ही थे इलेक्ट्रॉनिक और लेड इंडिकेटर, इंडिकेटर का काम करती थीं घड़ियां। ऐसे मौकों पर अगर ट्रेनें रुक जाएं तो ये घड़ियां १२ पर अटक जाती थीं और लोग कहा करते थे ‘आज तो १२ बजे।’
चाक बोर्ड से शुरू हुआ सफर
मीटिंग पॉइंट्स। कामकाजी मुलाकातें। बिजनेस की बातें। गप-गोष्ठियां। लड़ाई, झगड़े और अपराध। … मुंबई के इंडिकेटरों पर क्या नहीं होता! मुंबई की लाइफलाइन का रिमोट कंट्रोल है स्टेशनों का इंडिकेटर। उसकी अहमियत लोकल ट्रेनों के आने-जाने के समय जैसी सूचनाएं देने से कहीं ज्यादा हैं। कितने ही प्रेम यहां परवान चढ़े और खाक हो गए। आज तक शहर में यह प्रेमी-प्रेमिकाओं की मुलाकातों का सबसे फेवरेट ठिकाना बना हुआ है। रेलवे के शुरूआती जमाने में जब न तो मुंबई में इतनी भीड़ थी और न इंटरनेट जैसी ही कोई चीज इंडिकेटर की अहमियत तब भी कम नहीं थी और यह आज भी कायम है। इंटरनेट और मोबाइल के इस जमाने में भी उसने अपनी उपयोगिता नहीं खोई है।
बदलावों का दौर
गुजरते जमाने के साथ लोकल ट्रेनों और स्टेशनों की तरह इंडिकेटरों ने भी कई बदलाव देखे हैं।१९२४ में जब ट्रेनें कम होती थीं तो प्लेटफॉर्मों के चाक बोर्ड पर ट्रेन के आने और रवानगी का समय देकर काम चला लिया जाता था। कुछ साल बाद पेंटेड बोर्ड्स ने चाक बोर्ड का स्थान लिया, जिन्हें ट्रेन के समय के हिसाब से हाथ से बदला जाता था। १९८६ में मैनुअल स्विच-ऑपरेशन वाले बल्ब इंडिकेटरों के संग लोकल ट्रेनों ने आधुनिक युग में कदम रखा, अधिक सूचनाओं के साथ फिर आया लेड इंडिकेटरों का वक्त। २००३ के बाद पहले कंप्यूटरीकृत हाई रिजोल्यूशन वाले साफ व चमकदार एलसीडी व माइक्रोप्रोसेसर आधारित लैंप इंडिकेटरों का जमाना शुरू हुआ, जो आपको ट्रेन के विलंबित समय से भी बाखबर करते रहते थे। बीते वर्षों में इनमें और भी सुधार हुआ है। गाड़ी के आने का वास्तविक समय इंगित करनेवाले ये सूचक आज पहले से अधिक दर्शनीय, विश्वसनीय और पैसेंजर प्रâेंडली हैं। आज मुंबई के सारे स्टेशन नई पीढ़ी के सर्पेâस माउंट लेड डिस्प्ले पैनेल से लैस हैं। ये आसानी से दूर से ही दिखाई दें, इसके लिए उनकी लाइट को एडजस्ट किया जा सकता है। यहीं नहीं, अगर इन्हें नियंत्रित करनेवाली कंप्यूटर प्रणाली फेल हो जाए, तब भी ‘स्टैंड बाई मोड’ में इन्हें क्रियाशील रखा जा सकता है। दिव्यांग लोगों के लिए ऑडियो-विजुअल इंटिकेटर भी हैं, जिनसे वे अपने कोच के ठहरने के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।
मध्य और पश्चिम रेलवे ने इस योजना पर करोड़ों रुपए खर्च किए हैं, फिर भी यात्रियों की शिकायतें बनी हुई हैं। कई जगह वे बदरंग या टूटी-फूटी हालत में हैं या बारिश के समय रिसाव के शिकार। कई स्टेशनों पर वे काम नहीं करते या गलत जानकारी दर्शाते हैं। कई जगह, खासकर रातों में खामोश पड़े रहते हैं। कुछ वर्ष पहले पश्चिम रेल ने फीडबैक मांगकर इंडिकेटर डिस्प्ले के बाबत यात्रियों से उनकी राय मांगी थी कि क्या फास्ट ट्रेनों के मामले में मौजूदा प्रणाली को बदला जाना चाहिए? क्योंकि पश्चिम रेल पर जहां इंडिकेटरों में उन जगहों के नाम दर्शाए जाते थे, जिन पर लोकल ट्रेन नहीं रुकनेवाली वहीं मध्य रेल के इंडिकेटर में ट्रेन के स्टॉपवाले स्टेशनों के नाम।

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