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मनपा की कोशिशें हो रही फेल :  मुंबई में कुत्तों का आतंक! …हर घंटे १० को बना रहे शिकार

• घाती सरकार नहीं कर रही कार्रवाई

धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
मुंबई में आवारा कुत्तों का आंतक बढ़ता जा रहा है। घर से निकलने के बाद किस सड़क और गली में आवारा कुत्ते लोगों पर भौंकते हुए उन्हें काट लें, इसका कोई भी अनुमान नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, हर दिन शहर में आवारा कुत्ते लगभग १० लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इससे मुंबईकर बहुत अधिक परेशान हो चुके हैं। इसके बावजूद घाती सरकार और मनपा इस संबंध में कोई ठोस कदम उठाते हुए नहीं दिखाई दे रही है। फिलहाल, सरकार कुत्तों को रेबीज से मुक्ति दिलाने के लिए वैक्सीनेशन अभियान चलाने जा रही है, जिसका असर पड़ने की उम्मीद कम ही है। इसके अलावा कुत्तों की नसबंदी के साथ ही अन्य कई योजनाएं भी फेल हो रही हैं।
उल्लेखनीय है कि मुंबई महानगर में इंसानों के साथ जानवरों की भी आबादी बढ़ रही है, जिसके दुष्परिणाम नजर आने लगे हैं। खासतौर पर आवारा कुत्तों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसके साथ ही कुत्तों के काटने के मामले भी बढ़ने लगे हैं। हालत ये है कि मुंबई में हर घंटे करीब १० लोगों को कुत्ते काट रहे हैं। मिली जानकारी के अनुसार, मुंबई में इस समय करीब १.६४ लाख आवारा कुत्ते सड़कों पर घूम रहे हैं। मनपा स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, मुंबई में वर्ष २०२१ में डॉग बाइट के ६१,३३२ मामले, वर्ष २०२२ में ७८,७५६ और साल २०२३ में अब तक करीब ४३ हजार से अधिक डॉग बाइट के मामले दर्ज किए गए। मनपा के मुताबिक, लॉकडाउन के बाद कुत्तों के काटने के मामले तेजी से बढ़े हैं। हालांकि, कुत्तों की आबादी को कंट्रोल करने के लिए मनपा की तरफ से नसंबदी समेत कई योजनाएं बनाई गर्इं, लेकिन सभी योजनाएं धरी की धरी रह गई हैं। एक भी योजना का सही तरीके से क्रियान्यवयन नहीं किए जाने से वे असफल होती दिखाई दे रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, पांच सालों में मुंबई में करीब ८३,००० आवारा कुत्तों की नसबंदी की गई है। इसमें महाविकास आघाड़ी के कार्यकाल में कुत्तों की सबसे अधिक नसबंदी हुई है। हालांकि, घाती सरकार के राज में बीते साल केवल १०,४८४ आवारा कुत्तों की नसंबदी हुई है, जो इस सरकार की लापरवाही का प्रमाण है।
हिंसक हो रहे हैं कुत्ते
गली-मोहल्लों के कुत्ते हिंसक क्यों हो रहे हैं, इसका एक मुख्य कारण उनका भूखा रहना है। एक जमाना था, जब घरों में बननेवाले खाने का पहला निवाला या पहली रोटी कुत्तों की होती थी। आज कोई भी बेजुबान जानवरों को भोजन परोसना नहीं चाहता है। कुत्ते जब खाली पेट होते हैं, तभी लोगों पर अटैक करते हैं। पार्क या गली में खेलने वाले बच्चों के हाथों अगर कुत्ते थोड़ी सी भी खाने की वस्तु देख लें, तो झप्पटा मारने से बाज नहीं आते हैं। लोगों ने उन्हें भोजन देना लगभग बंद कर दिया है, जिस कारण ये हिंसक हो गए हैं। इसका मुख्य कारण मनपा और घाती सरकार के राज में तरह-तरह के नियमों को थोपना है।
जानलेवा वायरस है रेबीज
जानकारों का मानना है कि रेबीज एक जानलेवा वायरस है, जो कुत्ता, बिल्ली, बंदर व अन्य जानवरों के काटने और चाटने से इंसानों में फैलता है। यह वायरस इनकी लार में रहता है। पालतू हों या फिर आवारा कुत्ते, अगर उनका एंटी रेबीज वैक्सीनेशन नहीं हुआ हो तो फिर वे खतरनाक हो जाते हैं। ऐसे में सलाह दी जाती है कि अगर कोई कुत्ता काटता है तो सबसे पहले उस जख्म को साफ पानी से १० से १२ बार धो लें। अगर स्कैच ज्यादा हैं तो एंटी रेबीज के पांच इंजेक्शन लगाए जाते हैं। एंटी रेबीज का एक प्रीकॉशनरी डोज भी मौजूद है, जो पहले भी लगाया जाता है।

पिछले साल गर्माया था लावारिस जानवरों का मुद्दा
पिछले साल हिंसक और लावारिस जानवरों का मुद्दा खूब गर्माया था। यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री ने एक चुनावी सभा में वादा किया था कि सरकार बनने के बाद मवेशियों से फैली समस्याओं का निराकरण कर दिया जाएगा। समस्या को सुलझाने के लिए सरकारी स्तर पर अब कोई न कोई कारगर नीति अपनानी ही होगी। पुरानी व्यवस्था को बदलना होगा। चाहे इसके लिए नए कानून बनाने हों अथवा पहले के कानूनों को असरदार बनाना हो। आवारा मवेशियों के लिए शहरों से कहीं दूरदराज क्षेत्रों में सुरक्षित ढंग से रखने की व्यवस्था बने। उन्हें वहां एंटी रेबीज इंजेक्शन दिए जाएं, जिससे उनके भीतर के विष या रेबीज को नष्ट किया जाए।

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