अरमां मेरे

घरोंदे दिल के टूट जाते हैं
अपना होके भी रूठ जाते हैं
कौन जिए इश्क में ऐसे ही
अपना कहो वो गुजर जाते हैं
जीने के लिए क्या करें दिल
जो हर सफर में दर्द मुश्किल
कौन निकाले इसे जख्मों से
जो आके रौंदता है मंजिल
– मनोज कुमार, गोंडा- उत्तर प्रदेश

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