नैना

कल भी बरसी थी नैना
आज भी बरसी है नैना
दो बूंद बरसों के बाद
ये तरसी है रैना
बरसी है नैना!
बिखरे हुए हैं सभी
बारिश के छींटे में
मोहब्बतें अपनी
काली-काली घाटी में
कोई कहानी लिखता नहीं है
कोई ये दर्द सिलता नहीं है
उससे मिलने के बाद
वो पुरानी याद
हरपल आती रहती है
सोते को जगाकर
कोई आया था जगाने मुझे
ये मुझे खबर हो जाती है
यूं ही रातभर
लगता है ऐसे ही सुलगकर
उसकी बाहों में उतर जाऊं
भीगी-भीगी रातों में
अकेले देख के लगता है
वो मुझे परेशां करते हैं
कितना छिपाऊं क्या है
इस दिल में मेरे, वो खुद ही आके देख ले
झांक ले!
मेरी हालत को देख ले!

– मनोज कुमार
गोण्डा, उत्तर प्रदेश

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