मुख्यपृष्ठस्तंभनाना जगन्नाथ शंकरशेठ आधुनिक मुंबई के पितामह

नाना जगन्नाथ शंकरशेठ आधुनिक मुंबई के पितामह

विमल मिश्र

देश की पहली रेलवे, विक्टोरिया टर्मिनस, एशियाटिक सोसायटी, मुंबई यूनिवर्सिटी, विक्टोरिया गार्डेन, वीरमाता जीजाबाई भोसले उद्यान, एलफिंस्टन कॉलेज, डॉ. भाऊजी लाड म्यूजियम-जैसे निर्माणों के साथ उनका नाम जुड़ा है। आधुनिक मुंबई के पितामह कहलाने वाले जगन्नाथ शंकरशेठ दूरदर्शी योजनाकार ही नहीं, महान दान-धर्मी और उत्कृष्ट समाज सुधारक थे। मुंबई के मौजूदा चेहरे की उनके बिना कल्पना करना मुश्किल है।

१९वीं सदी के मध्य में, जब आधुनिक मुंबई ने आकार लेना शुरू ही किया था, नामदार जगन्नाथ शंकरशेठ ने शहर के निर्माण और विकास के लिए बड़ी-बड़ी जमीनें दान दीं। मंदिर, अंत्येष्टि स्थल व लाइब्रेरियां बनवाई, स्ट्रीट लैंप लगवाए और परिवहन, आधारभूत ढांचे, शिक्षा और लोकहित के कामों के लिए तिजोरियों के मुंह खोल दिए।

नाना शंकरशेठ के नाम मुंबई के कुछ ऐसे विकास और निर्माण कार्य हैं, जो आज मुंबई के विकास की बुनियाद हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था जमशेदजी जीजीभॉय के साथ रेलवे के निर्माण में हाथ बंटाना, जो केवल मुंबई ही नहीं, देश और एशिया की सबसे पहली रेलवे प्रणाली थी। उस वक्त, जब कोई लैंड रिकॉर्ड नहीं होता था, बोरीबंदर पर देश के पहले रेलवे टर्मिनस के निर्माण के लिए उन्होंने जगह दी, और गिरगांव में रेलवे का बुकिंग ऑफिस खोलने के लिए अपना बंगला भी। दि ग्रेट पेंनिनसुला रेलवे यानी आज की मध्य रेलवे जमशेदजी के साथ कायम १८४५ में उन्हीं की बनाई इंडियन रेलवे असोसिएशन का सुधरा रूप है। ये दोनों महानुभाव बाद में जीआईपी के एकमात्र हिंदुस्थानी डॉयरेक्टर बने।

१० फरवरी, १८०३ को पैदा हुए नामदार जगन्नाथ शंकरशेठ मुरबाड में दैवज्ञ समाज के ब्राह्मण घराने से ताल्लुक रखते थे। मुख्य रूप से आयात -‌ निर्यात, साहूकारी और स्वर्णकारी में लगे शेठ परिवार के बाबुलशेठ गनबशेठ ने मुरबाड से घोड़बंदर और फिर मुंबई के फोर्ट इलाके में आकर घी, मसालों, मोतियों और ईरानी गालीचों सहित नाना प्रकार के व्यवसायों में हाथ आजमाया। फोर्ट की गनबो स्ट्रीट (नया नाम रुस्तम सिधवा मार्ग) उन्हीं के नाम पर है।

समाज पुरुष

फोर्ट और उसके पास दक्षिण मुंबई की खुली-खुली चौड़ी सड़कों, हवादार गलियों और शानदार इमारतों का मौजूदा रूप डॉ. भाऊजी दाजी और सर जॉर्ज बर्डवुड के साथ उनके प्रयासों की ही देन है, जिसकी शुरूआत १८५७ में हुई थी। स्टीम नेविगेशन वंâपनी १८३६ में उन्हीं की पहल पर बनी। सीवर और नालियों का वंâसेप्ट देने वाले वे पहले हिंदुस्थानी थे। उन्होंने शहर भर में स्ट्रीट लैंप भी लगवाए। नाना ने मंदिरों को तो दान दिया ही, अंत्येष्टि के लिए दाह स्थल भी बनवाए। हिंदू श्मशानगृह बंद करने के विरुद्ध ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मोर्चा निकालने वाले वे पहले हिंदुस्थानी थे। कल्याणकारी कार्यों के लिए उन्होंने मुक्त हस्त से धन लुटाया। मूल निवासियों की शिकायतों के समाधान के लिए मुंबई सोसायटी और व्यापारियों को संगठित करने के लिए मुंबई एसोसिएशन बनाया।

भायखला के रानी बाग और डॉ. भाऊजी लाड म्युजियम (विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्युजियम) के निर्माण में सर जमशेदजीजी जीजीभॉय और डेविड ससून के साथ उनका भी पैसा लगा है। नाना चौक के निकट राम मंदिर व भवानी शंकर मंदिर उन्हीं का बनवाया हुआ है। सोनापुर (मरीन लाइन) में चंदनवाड़ी और बड़ा कब्रिस्तान दोनों उनकी दान की गई भूमि पर ही बने हैं। कॉलेज, जे. जे. अस्पताल, ग्रांट मेडिकल कॉलेज, जे. जे. स्वूâल ऑफ आट्र्स, मुंबई महानगरपालिका, एग्री हार्टिकल्चर सोसायटी, मछुआरों के लिए स्वूâल, पहली नेटिव डिस्पेंसरी, पहला लॉ कॉलेज, पुणे डेक्कन कॉलेज, आदि उनकी कीर्ति के शिलालेख हैं।

शिक्षा मित्र

शिक्षा के प्रचार के लिए नाना जैसा योगदान देनेवाला दूसरा नहीं। कई भाषाओं के जानकार नाना द्वारा स्थापित स्कूल सोसायटी और नेटिव स्कूल ऑफ मुंबई पूरे पश्चिम हिंदुस्थान में अपनी तरह की पहली संस्थाएं थीं। मुंबई के गवर्नर माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन ने शिक्षा के प्रसार के लिए हिंदुस्थानी भाषाओं में पाठ्य पुस्तकें छापनी शुरू कीं तो स्कूल बुक सोसायटी और हिंदशाला पुस्तक मंडल के जरिए नाना उनकी सहायता करने वाले पहले व्यक्ति बने। नाना ने स्कूल, कॉलेज, पुस्तकालयों के साथ थियेटर, उद्यान और अस्पतालों के निर्माण के लिए तिजोरियों के मुंह खोल दिए।

स्टुडेंट्स लाइब्रेरी एंड साइं‌टि‌‌फिक सोसायटी और स्कूल बुक सोसायटी जैसी संस्थाएं स्थापित कीं और पाठ्य पुस्तकें मराठी, हिंदी, गुजराती, कन्नड़, उर्दू और अंग्रेजी में छपवायी और उन्हें खरीदने के लिए अनुदान दिए। नाना मुंबई में स्त्री शिक्षा के पुरोधाओं में माने जाते हैं। परंपरावादी हिंद समाज के विरोध के बावजूद बालिका शिक्षा के लिए उनके कदम कभी डगमगाए नहीं। दादाभाई नौरोजी जैसे लोगों के सहयोग से उन्होंने गिरगांव के अपने बंगले सहित कुल आठ जगह बालिका शालाएं स्थापित कीं, जो उस जमाने में बहुत क्रांतिकारी कदम माना जाता था। इनमें एक कन्याशाला (जो ठाकुरद्वार के उनके बंगले के एक हिस्से में थी) में उनके घर की महिलाएं खुद भी पढ़ती थीं। इसे पश्चिम हिंदुस्थान की पहली कन्या शाला माना जाता है।

सती प्रथा के ‌विरुद्ध अभियान

नाना राजा राममोहन राय के बाद सती प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाने वाले शिखर पुरुषों में थे। ब्रिटिश शासकों ने नाना की लोकप्रियता का उपयोग सती प्रथा के दमन में किया। उनकी साख इस हद थी कि विदेशी व्यापारी तक अपनी धरोहर बैंकों के बजाय उनके पास रखना अधिक सुरक्षित समझते थे। अंग्रेजों ने नाना को मुंबई बोर्ड ऑफ एजुकेशन का मेंबर तो बनाया ही, १८३४ में ‘जस्टिस ऑफ पीस’ की उपाधि दी और एशियाटिक सोसायटी का पहला हिंदुस्थानी मेंबर भी नियुक्त किया। १८६१ में मुंबई की विधान परिषद में मनोनीत होने वाले भी नाना पहले हिंदुस्थानी बने। वे मुंबई म्यूनिसिपल कानून के प्रवर्तकों में से हैं। अदालतों की ज्यूरी में हिंदुस्थानियों को भी स्थान दिलवाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। नाना का देहांत ३१ जुलाई, १८६५ को ६२ वर्ष की आयु हुआ।

वे उन थोड़े से समाज पुरुषों में से हैं, जिनके जीवनकाल में ही नगर के लोगों ने खुद के योगदान से उनकी प्रतिमाएं स्थापित कर डाली थीं। उनकी यादें मेट्रो सिनेमा से नाना चौक तक जाने वाली उनके नाम की सड़क (पूर्व नाम गिरगांव रोड या पालव रोड) ने अक्षुण्ण कर दी हैं। सोनापुर, विक्टोरिया टर्मिनस (छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) और एशियाटिक सोसायटी (जिसके विकास में भी नाना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई) में भी आप उनकी प्रतिमाएं देख सकते हैं। ‘अफसोस कि मुंबई के जिस सपूत ने उसके लिए अपना सर्वस्व दे दिया, उनकी यादगारी के लिए उसी शहर में अभी तक कोई मामूली स्मारक नहीं है।’ मुंबई के इस महान सपूत की पांचवीं पीढ़ी के वंशज रिटायर्ड फार्मासिस्ट सुरेंद्र शंकरशेठ ने रंज के साथ बताया।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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