मुख्यपृष्ठधर्म विशेषसौंदर्य के साथ महकने के लिए तैयार प्रकृति

सौंदर्य के साथ महकने के लिए तैयार प्रकृति

मां शैलपुत्री का आगमन आज

नवरात्रि के साथ हिंदू नववर्ष का पर्व आ चुका है और इस दौरान प्रकृति अपने संपूर्ण सौंदर्य के साथ महकने के लिए तैयार है। हो भी क्यों न भारतीय नववर्ष का स्वागत प्रकृति एवं भक्त दोनों ही आतुरता से करते हैं। आज से चैत्र नवरात्रि शुरू हो रही हैं, जो ११ अप्रैल, २०२२ तक रहेगी। इन ९ दिनों में विधि-विधान से मां दुर्गा के रूपों की पूजा करनी चाहिए, इससे घर में सुख-समृद्धि आती है। इस बार मां दुर्गा घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं और भैंसे पर प्रस्‍थान करेंगी। माता की इन सवारियों को शुभ नहीं माना जाता लेकिन इस बार ग्रहों के उलटफेर ने कुछ राशिवालों के लिए इस नवरात्रि को बेहद खास बना दिया है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के साथ ही मां दुर्गा की पूजा शुरू हो चुकी है। पहले दिन मां दुर्गा के नवरूपों के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। शैल का अर्थ शिखर होता हैं। शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण मां दुर्गा का यह स्वरूप ‘शैलपुत्री’ कहलाया। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्वजन्म में दक्ष-प्रजापति की पुत्री सती थीं, जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। शास्‍त्रों के अनुसार माता शैलपुत्री का स्वरूप अति दिव्य है। मां शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं। बैल अर्थात वृषभ पर सवार होने के कारण देवी शैलपुत्री को वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। इन्‍हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है। मां शैलपुत्री की अराधना करने से आकस्मिक आपदाओं से मुक्ति मिलती है तथा मां की प्रतिमा स्थापित होने के बाद उस स्थान पर आपदा, रोग, व्‍याधि, संक्रमण का खतरा नहीं होता तथा जीव निश्चिंत होकर उस स्‍थान पर अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं। शैलपुत्री के रूप की उपासना करते समय निम्‍न मंत्र का उच्‍चारण करने से मां जल्‍दी प्रसन्‍न होती हैं तथा वांछित फल प्रदान करने में सहायता करती हैं-
वंदेवांछितलाभायचंद्रार्द्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनाम्।।
सफेद चीजों का लगाएं भोग
शैलपुत्री का पूजन करने से `मूलाधार चक्र’ जागृत होता है, जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरंभ होता है। मां शैलपुत्री को सफेद चीजों का भोग लगाया जाता है और अगर यह भोग गाय के घी में बना हो तो व्यक्ति को हर तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है। मां शैलपुत्री का प्रिय रंग लाल है।
कलश स्थापना मुहूर्त
गुली काल मुहूर्त- प्रात: ०५.४१ से ०७.१४ बजे तक
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर ११.२८ से १२.१८ बजे तक
चर योग- दोपहर ११.५३ से ०१.२६ बजे तक
लाभ योग- दोपहर ०१.१५ से ०२.५९ बजे तक
अमृत योग- दोपहर ०२.५९ से शाम ०४.३२ बजे तक
सूर्य का राशि परिवर्तन
ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व रखनेवाली चैत्र नवरत्रि में सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। सूर्य इस दौरान मेष में प्रवेश करता है। चैत्र नवरात्रि से नववर्ष के पंचांग की गणना शुरू होती है। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने का असर सभी राशियों पर पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि नवरत्रि के नौ दिन काफी शुभ होते हैं। इसका कारण यह है कि पूरी सृष्टि को अपनी माया से ढंकनेवाली आदिशक्ति इस समय पृथ्वी पर होती हैं। चैत्र नवरात्रि को भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में पहला अवतार लेकर पृथ्वी की स्थापना की थी।

ज्योतिषाचार्य पं.अतुल शास्त्री
ज्योतिष सेवा केंद्र

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