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पुलिस व्यवस्था में सुधार जरूरी!

राजेश माहेश्वरी।  किसी भी देश एवं वहां की कानून-व्यवस्था की नींव, उस देश की पुलिस होती है। देश की आम जनता आखिर पुलिस से क्या अपेक्षाएं रखती है? देश के नागरिक मित्रवत् पुलिस चाहते हैं, जो अमीरों-गरीबों के साथ समान व्यवहार करे। देश में अधिकांशत: राज्यों में पुलिस की छवि तानाशाहीपूर्ण, जनता के साथ मित्रवत न होना और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने की रही है। रोज ऐसे अनेक किस्से सुनने-पढ़ने और देखने को मिलते हैं, जिनमें पुलिस द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया जाता है। पूरा देश औपनिवेशिक शासन से उबरकर लोकतांत्रिक व्यवस्था अपना चुका, लेकिन पुलिस अभी भी उसी मानसिकता में चल रही है। तमाम प्रयासों के बावजूद पुलिस की छवि सुधर नहीं पाई है। हम आज भी आमजन में यह भरोसा नहीं जगा पाए कि यह पुलिस आपकी सुविधा एवं सेवा के लिए ही स्थापित की गई है।
वर्तमान में हमने भले ही कई क्षेत्रों में तरक्की कर ली हो, लेकिन पुलिसिया तंत्र में आज भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। देश के पुलिस थानों की हालत देखेंगे तो पाएंगे कि वहां बुनियादी सुविधा ही बेहतर नहीं है। पुलिस सेवाओं के लिहाज से देखें तो पूरी दो पीढ़ियां चली गई होंगी लेकिन पुलिस के तौर-तरीके में कोई खास बदलाव नहीं आया। वह पहले भी अपना काम आम जनता का दमन जानती थी और दुर्भाग्य यह है कि आज भी वही जानती है।
वर्ष १९७७ में पुलिस सुधारों को केंद्र में रखकर जनता पार्टी की सरकार द्वारा श्री धर्मवीर की अध्यक्षता में गठित इस आयोग को राष्ट्रीय पुलिस आयोग कहा जाता है। चार वर्षों में इस आयोग ने केंद्र सरकार को आठ रिपोर्टें सौंपी थीं लेकिन इसकी सिफारिशों पर अमल नहीं किया गया। वर्ष २००० में पुलिस सुधारों पर पद्मनाभैया समिति का गठन किया गया था। पुलिस सुधारों की बात चाहे जितनी कर ली जाए लेकिन सच्चाई यही है कि अभी सारे सुधार केवल कागजी स्तर तक ही सीमित होकर रह गए हैं।
जानकारों की मानें तो न्यायपालिका में भी सुधार नहीं होने के कारण पुलिस को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि किस कदर पुलिस तंत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप जरूरत से ज्यादा रहता है और यही कारण है कि ईमानदार पुलिसकर्मियों की कार्यप्रणाली को बार-बार प्रभावित किया जाता है। इसके चलते पुलिसकर्मियों को मानसिक तनाव तो होता ही है, इनका मनोबल भी टूट जाता है। यों अतीत में इसके लिए समय-समय पर समितियों और आयोगों का गठन होता रहा है लेकिन इससे आगे के काम अधूरे पड़े हैं। दूसरा उपाय है इस व्यवस्था में आधुनिकीकरण को अपनाना। फिर बात तकनीकी स्तर की हो या फिर प्रशिक्षण स्तर की। इसके अलावा, रिक्त पड़े पदों पर भर्ती नहीं करना इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमी है। इसका परिणाम यह होता है कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों पर मानसिक तनाव बढ़ता है, अवसाद जैसी प्रवृतियां भी जन्म लेती हैं और साथ ही घरेलू हिंसा भी बढ़ती है और फिर वे भ्रष्टाचार के लिए प्रेरित होते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि पुलिसवाले भी सामाजिक प्राणी होते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज जो पुलिस की दुर्दशा है, इसके पीछे कहीं न कहीं बढ़ता राजनीतिक और नौकरशाही का हस्तक्षेप ही है। पुलिस व्यवस्था को आज नई दिशा, नई सोच और नए आयाम की आवश्यकता है। समय की मांग है कि पुलिस नागरिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों के प्रति जागरूक हो और समाज के सताए हुए तथा वंचित वर्ग के लोगों के प्रति संवेदनशील बने। देखने में यह आता है कि पुलिस प्रभावशाली व पैसेवाले लोगों के प्रति नरम तथा आम जनता के प्रति सख्त रवैया अपनाती है। आज देश का सामाजिक परिवेश पूरी तरह बदल चुका है। हमें यह समझना होगा कि पुलिस सामाजिक रूप से नागरिकों की मित्र है और बिना उनके सहयोग से कानून-व्यवस्था का पालन नहीं किया जा सकता। किसी भी लोकतांत्रिक देश में पुलिस बल की शक्ति का आधार जनता का उसमें विश्वास है और यदि यह नहीं है तो समाज के लिए घातक है।
सरकारें पुलिस व्यवस्था में कोई सुधार चाहती ही नहीं हैं, वे केवल इसकी औपचारिकता निभाती हैं। हमें औपचारिकता निभाने की इस मानसिकता से ऊपर उठना होगा और पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए अब तक जो सुझाव आए हैं, उन पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा। यह काम जितनी जल्दी किया जा सके, देश के लिए उतना ही फायदेमंद साबित होगा। केवल क्षुद्र स्वार्थों के लिए सुधारों की प्रक्रिया को लंबित करना घातक साबित हो सकता है।

(लेखक उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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