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मंत्रिमंडल विस्तार में उलझी नई सरकार! लालफीताशाही के हाथों राज्य की बागडोर, भड़का विपक्ष

सामना संवाददाता / मुंबई
कानूनी और संवैधानिक पेंच में उलझी ‘ईडी’ यानी शिंदे- फडणवीस सरकार ३७ दिन बीत जाने के बाद भी मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर सकी है। ऐसे में जिन विभागों के मंत्री नहीं हैं, उन विभागों की बागडोर लालफीताशाही के हाथों सौंपने का निर्णय मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने लिया है। मंत्रियों के अधिकार सचिवों के हाथ सौंपने के निर्णय का जोरदार विरोध शुरू हो गया है।
कांग्रेस पार्टी और राकांपा ने मुख्यमंत्री शिंदे के इस निर्णय पर जोरदार आपत्ति जताई है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता अतुल लोंढे ने शिंदे-फडणवीस सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि जब शंकरराव चव्हाण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने लोकाभिमुख कामकाज के लिए सचिवालय का नाम बदलकर मंत्रालय कर दिया था। लोकतंत्र में सरकार को जनप्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाना चाहिए न कि अधिकारियों द्वारा। जनप्रतिनिधियों का अधिकार छीनकर नौकरशाहों के हाथों महाराष्ट्र को देना ठीक नहीं है। शासन और प्रशासन के पहिए को उलटने की ‘ईडी’ सरकार कोशिश कर रही है।‌ यह महाराष्ट्र का दुर्भाग्य है कि एकनाथ शिंदे ने बगावत कर भाजपा की मदद से सरकार बनाई लेकिन ३७ दिन बाद भी कैबिनेट का विस्तार नहीं हो सका है। महाराष्ट्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। क्या शिवसेना को खत्म करने की कोशिश में कई अच्छे जनप्रतिनिधियों का राजनीतिक करियर खत्म करने का कार्यक्रम है?
फडणवीस के इशारे पर चल रही सरकार
लोंढे के अनुसार सरकार मुख्यमंत्री शिंदे नहीं, बल्कि उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के इशारे पर चल रही है। फडणवीस जो कहते हैं, शिंदे वही कर रहे हैं। भाजपा का असली चेहरा लोगों के सामने आ गया है कि उनका जनहित से कोई लेना-देना नहीं है। उनके लिए सिर्फ सत्ता ही महत्वपूर्ण है। राकांपा नेता क्लाईड क्रास्टो ने भी विभागों की जिम्मेदारी ब्यूरोक्रेट के हाथों सौंपने को लेकर शिंदे-फडणवीस सरकार की कड़ी आलोचना की है।
केवल अर्ध-न्यायिक मामलों से संबंधित अधिकार
सचिवों को मंत्रियों के अधिकार देने का मामला तूल पकड़ने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया है। मुख्यमंत्री के अनुसार सचिवों को मंत्री स्तर के अधिकार नहीं दिए गए हैं, उन्हें केवल अर्ध-न्यायिक मामले दर्ज करने और उस पर सुनवाई करने की जिम्मेदारी दी गई है। निर्णय लेने की सारी प्रक्रिया सचिवों के हाथों में नहीं दी गई है। उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका लंबित होने के कारण ये अधिकार अस्थायी रूप से दिए गए हैं। सभी अधिकार पहले की तरह मंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के पास हैं। यह कहना भ्रामक और पूरी तरह गलत है कि निर्णय लेने की सारी प्रक्रिया सचिव के हाथों में सौंप दी गई है। जब पूर्ण मंत्रिमंडल होता है, तब भी कुछ अर्ध-न्यायिक सुनवाई की जिम्मेदारियां सचिव या अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को आवश्यकतानुसार सौंपी जाती हैं।

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