मुख्यपृष्ठसंपादकीयजातीय समीकरण साधने का नया गणित

जातीय समीकरण साधने का नया गणित

राजनीतिक ‘वादे’ और फिल्मी ‘डॉयलॉग’ में अब कोई ज्यादा अंतर नहीं रहा? जो कहा जाता है वो बिल्कुल भी नहीं किया जाता। दोनों जगह सिर्पâ जनता को गोल-गोल घुमाया जाता है। राजनीति में अब जाति को नया रूप देकर एक नई परिभाषा गढ़ी गई है। नया नाम किसी और ने नहीं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री ने दिया है। उन्होंने कहा है कि उनके लिए सिर्पâ चार जातियां ही मायने रखती हैं, वो जातियां दलित, हिंदु या मुस्लिम नहीं बल्कि गरीब, किसान, महिलाएं और युवा हैं? हालांकि, ये किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा कि ये जातियां भला वैâसे हो सकते हैं, ये तो वर्ग हैं। जबकि वर्ग और समुदाय में खासा अंतर होता है। दरअसल, शब्दों से खेलने का खेल प्रधानमंत्री का हमेशा से सबसे अलहदा रहा है। इसलिए उन्होंने नया प्रयोग किया है। चलिए इस जातीय समीकरण के गणित को थोड़ा समझते हैं आखिर उन्होंने ऐसा सियासी पत्ता क्यों पेंâका?
दरअसल, जब से कांग्रेस व अन्य दलों ने विभिन्न प्रदेशों या देशभर में जाति सर्वेक्षण की चर्चा शुरू की है और बिहार में सर्वेक्षण भी हुआ, तभी से भाजपा में खलबली मची हुई है। बिहार में जैसे ही जाति जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, उसके बाद कांग्रेस पार्टी ने आनन-फानन में एलान भी कर दिया है कि उनकी जहां भी सरकार भविष्य में बनेगी, वहां कास्ट सर्वे करवाएंगे। खास तौर पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ये बात जोर देकर कही। जाति सर्वेक्षण का अभियान उनके द्वारा ही सबसे पहले छेड़ा गया। तभी से सियासत आग की तरह गरमा गई। भाजपा को लगा यदि जाति समीकरण के खेल में कांग्रेस छलांग मार गई तो उनके हाथ कुछ नहीं बचेगा। तभी, प्रधानमंत्री ने जातियों की नई परिभाषा देश के लोगों को बता डाली।
हालांकि, राहुल गांधी ने खुले शब्दों में कह दिया है कि ‘जिसकी जितनी आबादी’, ‘उसको उतना हक’ मिलेगा। उनके इस नारे को सुनकर कुछ दिनों तक तो भाजपा शांत रही। ये दर्शाया कि उन्हें जाति सर्वेक्षण को लेकर कोई चिंता नहीं? पर जब सियासी गुणा-भाग लगाया तो समझ में आया कि इससे तो उन्हें नुकसान ही होगा। उसके बाद उनके नेताओं ने मोर्चा संभाला। घुमा-फिराकर उसी मुद्दे पर आते गए। जब उनसे बात नहीं बनी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मैदान में वूâदे, उन्होंने अपने अंदाज से इस मसले को मैनेज किया। उन्होंने कहा है कि ‘मेरे लिए देश की सबसे बड़ी चार जातियां हैं। इन चार जातियों के रूप में उन्होंने गरीब, युवा, महिला और किसान का नाम लिया। लेकिन उनका ये नारा उस वक्त पुâस्स हो गया, जब उन्होंने छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी विधायक को मुख्यमंत्री बनाया। मध्यप्रदेश में यादव समुदाय के नेता को सीएम की कुर्सी दी और वहीं राजस्थान में ब्राह्मण नेता को मुख्यमंत्री बनाकर सीधे-सीधे जातियों के समीकरण से खुलेआम नूराकुश्ती की तस्वीर पेश कर दी।
बहरहाल, छत्तीगढ़ में आदिवासी नेता को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे सीधे-सीधे आदिवासी वोटरों को २०२४ में अपने पाले में साधना दर्शाता है क्योंकि प्रधानमंत्री के निशाने पर ओडिशा बहुत पहले से है, जहां उनका अभी तक कोई राजनीतिक दांव नहीं चला। मध्यप्रदेश का खेल भी पानी की तरह साफ है। किसी यादव को प्रदेश की कमान देने का मतलब है कि यूपी-बिहार के बहुसंख्यक यादवों को खुश करना। जनता के लिए प्रधानमंत्री का संदेश साफ है कि दोनों प्रदेशों की आवाम उन्हें जिताती रहे, भविष्य में उत्तर प्रदेश और बिहार में भी कोई यादव मुख्यमंत्री बनाएंगे। जातियों को साधने का ये समीकरण निश्चित रूप से आगामी २०२४ के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर बनाया गया है। प्रधानमंत्री अच्छे से समझते हैं कि भारत की राजनीति बिना जाति-धर्म के नहीं की जा सकती इसलिए उन्होंने जबरदस्त सियासी गणित कुछ अलग अंदाज में बिठाया है। वरना, अक्सर राजस्थान में किसी दलित को ही मुख्यमंत्री बनाने का रिवाज रहा है, लेकिन वहां इस बार भाजपा ने पहली बार किसी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाकर नई सियासी जुगत बिठाई है। कितने सफल होते हैं ये तो भविष्य ही बताएगा। पर, जनता अब भाजपा की कारस्तानियां बहुत अच्छे से समझती जा रही है। राजस्थान की जनता इंतजार कर रही है कि वादे के मुताबिक, भाजपा कब से उन्हें ४५० रुपए में गैस सिलेंडर देना शुरू करेगी।
बेशक, भाजपा हिंदी पट्टी के तीन राज्य जीतकर पूâली न समा रही हो, लेकिन वह उन राज्यों से डरी हुई है, जहां जातियों की पकड़ में विपक्षी दल उनसे काफी मजबूत हैं। लोकसभा में अग्रणी भूमिका निभानेवाला देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश हो या फिर जाति सर्वेक्षण करवाकर विपक्ष को नया चुनावी मंत्र देने वाला बिहार, उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में जाति की जकड़ आज भी बहुत मजबूत है। ऐसे में विपक्ष इस उम्मीद में जाति सर्वेक्षण पर जोर देता है कि मोदी सरकार की योजनाओं का लाभार्थी बनकर अपनी जातीय पहचान को पीछे छोड़नेवाले मतदाताओं को फिर से मंडल राजनीति की तरफ खींचा जाए। इसलिए भाजपा को डर सताता है कि कहीं ऐसा हुआ तो ओबीसी वोटरों में सेंध लग जाएगी और २०२४ के लोकसभा चुनाव में उनकी आसान जीत की उम्मीद धरी की धरी रह जाएगी।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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