मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ- यूक्रेन युद्ध में उभरता नया विश्व वित्तीय तंत्र

अर्थार्थ- यूक्रेन युद्ध में उभरता नया विश्व वित्तीय तंत्र

पंकज जायसवाल
 कुछ माह पहले पुतिन ने कुछ घंटों के लिए हिंदुस्थान का दौरा किया और इन्हीं कुछ घंटों में वे हिंदुस्थान के साथ वित्तीय तंत्र की सुगम साझीदारी का अनुबंध कर गए थे, जिसमें हिंदुस्थान के वित्तीय इंप्रâा के इस्तेमाल का भी अनुबंध था। उस समय इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पाया था कि इसके क्या मायने हैं और एक औपचारिक अनुबंध समझकर इसे भुला दिया गया था लेकिन आज यूक्रेन-रूस युद्ध के समय जब रूस को पश्चिम की ताकतें वित्तीय तौर पर तनहा कर उसकी आर्थिक रीढ़ पर चोट करना चाहती हैं तो हमें उस अनुबंध की कीमत पता चल रही है। आज पश्चिम के दबाव में विश्व बिरादरी स्विफ्ट सिस्टम, जिसे सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंसियल टेलीकम्युनिकेशन कहते हैं और दुनिया के बैंक आपस में इसी प्लेटफॉर्म से लिंक होकर एक दूसरे को पेमेंट सेटलमेंट करते हैं, सामान्य अर्थों में इसे समझ लीजिए कि यह एक इंटरनेशनल क्लीयरिंग हाउस है और इसी से रूस को बाहर कर दिया है। जब पेपाल, वीजा और मास्टरकार्ड ने भी रूस के बैंक को सपोर्ट देना बंद कर दिया है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस तनहा होता जा रहा है। वहां लोगों के लिए बैंक से पैसा निकालना और भेजना दुष्कर होता जा रहा था, ऐसे में वैकल्पिक तौर पर हिंदुस्थान का रुपे प्लेटफॉर्म वहां काम आ सकता है, हालांकि यह स्विफ्ट का विकल्प या चीन के पेमेंट सिस्टम का विकल्प तो नहीं बन सकता लेकिन कुछ फौरी राहत तो दे ही सकता है और बाद में वैश्विक विस्तार पा सकता है।
हम जानते हैं कि महाशक्तियों का जन्म सदैव वैश्विक द्वंद्व के दरम्यान होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हमने देखा कि अमेरिका और सोवियत संघ महाशक्ति के रूप में उभरे और उन दोनों की शीत युद्ध के आपसी खींचतान का फायदा चीन ने उठाया और चुपचाप चीनी आर्थिक क्रांति को जन्म दिया। आज भी रूस और यूक्रेन के युद्ध के कारण उथल-पुथल का दौर चल रहा है जो पुन: नई शक्तियों को उभरने का एक मौका भी हो सकता है और हो सकता है इस अवसर में हिंदुस्थान के पेमेंट तंत्र रुपे को उभरने का अवसर मिल जाए। आज अमेरिका की अगुवाई में पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिसमें प्रमुख है उसे वित्तीय रूप से आइसोलेट करना। इन प्रतिबंधों में वित्त कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई हैं, जो कंपनियां कल तक प्रतिस्पर्धा के नाम पर रूस में व्यापार कर रही थीं, वे अब प्रतिबंध के रूप में इस युद्ध की हिस्सेदार बन गई हैं। आज रूस के नागरिक अपने क्रेडिट और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और यही यह हिंदुस्थान के लिए अवसर है कि वह रूस को अपने रुपे कार्ड का प्रस्ताव दे। अमेरिका की दो दिग्गज वित्त कंपनियों, वीजा और मास्टरकार्ड ने रूस में अपने ऑपरेशन को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है। इन दोनों कंपनियों ने घोषणा की है कि रूस में जारी किए गए इनके कार्ड विदेशों में और विदेशों में जारी किए गए कार्ड रूस में काम नहीं करेंगे।
पेमेंट प्लेटफॉर्म की इस घोषणा के बाद रूस की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों इकोनॉमी पर इसका सीधा असर देखने को मिलेगा। दैनंदिनी, खुदरा लेनदेन से लेकर रूसी कंपनियों के व्यवसायिक कामकाज पर भी प्रभाव पड़ेगा। इस समय रूस में ३० करोड़ से अधिक क्रेडिट और डेबिट कार्ड प्रयोग में हैं, जिनमें लगभग २१ करोड़ ६० लाख कार्ड इन्हीं दोनों वीजा और मास्टरकार्ड के हैं और ये दोनों प्लेटफॉर्म रूस में होनेवाले खुदरा लेनदेन का करीब ३० से ६० फीसदी हिस्सा नियंत्रित करती हैं। पेमेंट प्लेटफॉर्म के रूप में इन दोनों कंपनियों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में दखल और किसी देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल २०२० में वीजा द्वारा विश्व भर में १८८ अरब लेनदेन किया गया, जबकि मास्टरकार्ड द्वारा ११३ अरब बार।
हिंदुस्थान ने दुनिया में इन दोनों कंपनियों द्वारा अपनाई गई नीति को बहुत पहले ही भांपकर वित्त को नियंत्रित करने की इसी शक्ति और उसके प्रभाव को देखते हुए स्वदेशी पेमेंट सिस्टम रुपे को बढ़ावा देने का निर्णय लिया था। उसे आगे बढ़ाने का आज हिंदुस्थान के पास मौका है। पिछले साल दिसंबर में भारत सरकार ने रुपे डेबिट कार्ड और कम मूल्य वाले डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए करीब १३ अरब रुपए की योजना को मंजूरी दिया था। इस योजना के अनुसार छोटे-छोटे लेनदेन को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल लेनदेन का विस्तार शामिल था। इसके तहत जनधन योजना वालों को भी डिजिटल पेमेंट फायदा देने के लिए ३१.७४ करोड़ डेबिट कार्ड जारी किए गए।
भारत सरकार द्वारा स्वदेशी पेमेंट प्लेटफॉर्म के प्रमोशन से वीजा और मास्टरकार्ड के लिए चुनौती खड़ी हो गई थी। नवंबर २०२० तक भारत के ९५.२ करोड़ डेबिट और क्रेडिट कार्ड में रुपे की हिस्सेदारी बढ़कर ६३ज्ञ् पहुंचकर लगभग ६० करोड़ हो गई। आज Rल्झ्aब् को २०० से अधिक देशों में स्वीकार किया जाता है। हिंदुस्थान ने महसूस किया कि वैश्विक पेमेंट कंपनियां न सिर्फ हिंदुस्थान से मुनाफा कमा रही हैं, बल्कि हिंदुस्थानी उपभोक्ताओं का संवेदनशील डेटा भी चुरा रही हैं। वे इन डेटा का इस्तेमाल किसी भी रूप में कर सकती हैं। इसलिए साल २०१२ में नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने भारत का स्वनिर्मित पेमेंट गेटवे रुपे कार्ड को लॉन्च किया था। इसके समर्थन में हिंदुस्थान के प्रधानमंत्री का आह्वान भी था कि ‘हर व्यक्ति देश की रखवाली करने के लिए सीमा पर नहीं जा सकता, लेकिन हम देश की सेवा के लिए रुपे का प्रयोग कर सकते हैं।’ तब शायद इस वाक्य का असल अर्थ सामने न आया हो लेकिन आज रूस में जो हालात बने हुए हैं, उसमें यह बताता है कि हिंदुस्थान ने वित्तीय इंफ्रा में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है चाहे वह रुपे हो या यूपीआई हो। दरअसल, रुपे को प्रमोट करना भारत सरकार की फाइनेंशियल इन्क्लूशन, आत्मनिर्भर हिंदुस्थान और राष्ट्रवाद नीति का हिस्सा था।
रूस का फाइनेंसियल आइसोलेशन ऐसा नहीं है कि यह हिंदुस्थान के स्वदेशी पेमेंट गेटवे के लिए मौका बन रहा है, ऐसे में जब राष्ट्रवाद के दायरे में संचालित करेंसी और पेमेंट इंप्रâा दूसरे देश के पेमेंट और सौदे की शक्ति को समाप्त कर रहें हैं, ऐसे में क्रिप्टो करेंसी को भी आधार मिल रहा है, जो अपने आप में राष्ट्रवाद के दायरे को तोड़ विश्व जनतांत्रिक करेंसी के रूप में किसी भी देश में हो रहे लेनदेन को सुगम बना सकती है। हो सकता है कि इस युद्ध के बाद क्रिप्टो करेंसी की लोकप्रियता और जरूरत दोनों और बढ़ जाए।
(लेखक अर्थशास्त्र के वरिष्ठ लेखक एवं आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विषयों के विश्लेषक हैं।)

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