मुख्यपृष्ठग्लैमर‘कोई मेरी बात सुनेगा नहीं!’-इमरान हाशमी

‘कोई मेरी बात सुनेगा नहीं!’-इमरान हाशमी

फिल्म इंडस्ट्री में २० वर्ष बिता चुके इमरान हाशमी ने बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर फिल्म ‘राज’ के जरिए अपने करियर की शुरुआत की थी। बतौर हीरो फिल्म ‘फुटपाथ’ से इंडस्ट्री में कदम रखनेवाले इमरान हाशमी का करियर फिल्म ‘मर्डर’ से आगे बढ़ा और फिल्म ‘टाइगर-३’ से उनकी जबरदस्त वापसी हुई। पेश है, इमरान हाशमी से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

फिल्म ‘टाइगर-३’ में आपके रोल की काफी चर्चा हुई। कैसा महसूस करते हैं आप?
जाहिर-सी बात है, मैं बेहद खुश हूं। मुझे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि मैं आतिश रहमान जैसे खूंखार विलेन के किरदार में विश्वसनीय नजर आऊंगा भी या नहीं। निर्देशक के कहने पर ही मैंने इस किरदार को शिद्दत से निभाया। जब ‘टाइगर-३’ रिलीज हुई तो निगेटिव किरदार होने के बावजूद दर्शकों ने मुझे भरपूर प्यार दिया।

सलमान खान और कैटरीना कैफ के साथ काम करने का अनुभव वैâसा रहा?
सलमान खान स्पॉन्टेनियस कलाकार हैं। किरदार को किस तरह प्रस्तुत करना है ये खाका उनके दिमाग में फ्रेम बनकर तैयार रहता है। उनकी अदाकारी का मैं काफी समय से फैन रहा हूं। कैटरीना केवल खूबसूरत ही नहीं, बल्कि मेहनत और अपने किरदार के लिए जद्दोजहद करने में भी उतनी ही अव्वल हैं।

सहायक निर्देशक से एक्टर बनने तक का आपका सफर कैसा रहा?
मेरे अंकल महेश भट्ट का मेरी ग्रोथ में काफी हद तक इनफ्लुएंस रहा है। एक सहायक निर्देशक के रूप में कोई मेरी बात सुनेगा नहीं ये सच्चाई है। लेकिन एक्टर बनने के बाद मैं अपनी बात कहने के साथ ही जरूरी लगने पर मनवा भी सकता हूं। इस फर्क को तय करने में कई लोगों को बरसों लग जाते हैं लेकिन यह मुकद्दर की बात है कि मुझे मात्र एक वर्ष लगा।

आपकी फिल्म ‘राज’ के सफल होने के बावजूद इस फिल्म की फ्रेंचाइजी क्यों नहीं बनाई गई, जबकि यह दौर सीक्वेल फिल्मों का है?
यह मेरी व्यक्तिगत राय है कि किसी भी फिल्म पर ‘सक्सेसफुल’ का टैग लगने के बाद जरूरी नहीं कि उसकी प्रâेंचाइजी बनाई जाए। मेरा आज भी यही ओपिनियन है कि फिल्म का अगला हिस्सा बनाना है तो कहानी सशक्त होनी चाहिए, दर्शकों को दूसरी किश्त में मजा आना चाहिए।

क्या आप खुद भी प्रोडूसर बनना चाहते हैं?
प्रोड्यूसर बनना कोई बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम है, ऐसी बात नहीं है। प्रोड्यूसर बनने से पहले यह मानसिकता निहायत मायने रखती है कि अगर फिल्म फ्लॉप होती है तो निर्माता पर क्या बीतेगी? नुकसान हजम करने की आर्थिक क्षमता निर्माता में है या नहीं? आर्थिक क्षमता से ज्यादा मानसिक क्षमता है भी या नहीं? वक्त के साथ दर्शकों के बदले हुए टेस्ट को भी एक सफल निर्माता को समझ लेना चाहिए। अगर यह सभी गुण उसमें हैं और फिल्म मेकिंग के दौरान आनेवाले स्ट्रेस को निर्माता झेल सकता है तो निर्माता के रूप में वो जिंदगीभर नई फिल्मों का निर्माण कर सकता है।

सुना है आप तेलुगू सुपरस्टार पवन कल्याण के साथ तेलुगू फिल्म में डेब्यू करनेवाले हैं?
इस प्रोजेक्ट के लिए मैं खुद इंट्रेस्टेड हूं। अभी इसके बारे में मैं खुलकर नहीं बोल सकता। इसकी शूटिंग शुरू हो चुकी है और २०२४ में यह फिल्म रिलीज होगी।

साउथ और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आप क्या फर्क महसूस करते हैं?
कोई बड़ा फर्क अब नहीं है। दोनों ही इंडस्ट्री का इकोनॉमिक्स तगड़ा है, काफी स्टार्स पैन इंडियन यानी सभी इंस्डट्री में काम करते हैं। यह कह सकते हैं कि उनके किरदारों में लार्जर दैन लाइफ वाली बात ज्यादा होती है। तेलुगू फिल्मों में मसाले की मात्रा ज्यादा होती है।

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