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अब अस्पताल में भी रजामंदी जरूरी …बगैर अनुमति आईसीयू में नहीं कर सकते भर्ती

नई गाइडलाइन पर चिकित्सकों की मिश्रित राय
सामना संवाददाता / मुंबई
अस्पतालों की मनमानी और लूट पर रोक लगाने के उद्देश्य से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने आईसीयू में मरीजों की भर्ती को लेकर सख्ती दिखाई है। इसके तहत अब अस्पतालों में इंटेंसिव केयर यूनिट के तहत इलाज के लिए मरीज की जरूरतों के हिसाब से निर्णय लेने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने साफ किया है कि अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार मरीजों को या उनके परिवार के इनकार करने की स्थिति में आईसीयू में भर्ती नहीं किया जा सकेगा। हालांकि, नई गाइडलाइन को लेकर चिकित्सकों की मिश्रित राय सामने आ रही है।
उल्लेखनीय है कि आईसीयू प्रवेश के संबंध में यह नए दिशानिर्देश क्रिटिकल केयर मेडिसिन में विशेषतज्ञता वाले २४ वरिष्ठ डॉक्टरों के एक पैनल द्वारा तैयार किए गए हैं। पैनल ने उन मेडिकल कंडीशन की एक सूची बनाई है, जिसके तहत मरीज को आईसीयू में रखने की जरूरत होती है। क्योंकि गंभीर बीमारी के तहत ही विशेष देखभाल की आवश्यकता के लिए ही आईसीयू की सिफारिश की जाती है। जारी गाइडलाइंस में साफ किया गया है कि बेहद गंभीर और असाध्य रूप से बीमार रोगियों का अस्पताल में यदि उपचार असंभव व उपलब्ध नहीं है और इलाज जारी रखने से भी रोगी के जीवित रहने पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता है तो ऐसी स्थिति में रोगी को आईसीयू में नहीं रखा जाना चाहिए। लेकिन अगर कुछ स्थितियां ऐसी हैं, जिसमें रोगी को आईसीयू में रखा जाना बेहद ज्यादा जरूरी हो जाता है या जिन रोगियों को बड़ी सर्जरी के बाद आईसीयू में देखभाल की बेहद जरूरत है तो उन्हें आईसीयू में भर्ती रखा जाना आवश्यक है। इसके साथ ही मरीज को अत्यधिक आईसीयू केयर की जरूरत है।
देश में स्वास्थ्य संसाधनों की है कमी
पैनल में शामिल सभी डॉक्टरों का मानना है कि हमारे देश में काफी कम संख्या में आईसीयू मौजूद हैं, ऐसे में जरूरतमंद लोगों को आवश्यकता पड़ने पर आईसीयू में बेड नहीं मिल पाते। इसलिए सीमित संसाधन होने के चलते आईसीयू में भर्ती को लेकर ये पैâसला लिया गया है। सभी पैनलिस्ट का कहना है कि जिन लोगों को आईसीयू की सर्वाधिक आवश्यकता है, उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
चिकित्सकों की यह है राय
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. अजय कुमार कहते हैं कि केंद्र सरकार का यह नया नियम सही समय पर आया है। इस नियम के आने के बाद जरूरतमंद मरीजों को बेड मिल सकेगा और बिना वजह किसी मरीज को आईसीयू में नहीं रखा जाएगा। इससे कुछ अस्पतालों की मनमानी पर भी रोक लगेगी, लेकिन यह भी जरूरी है कि आम लोगों को इस नियम के बारे में पूरी जानकारी हो, जिससे वह इस नियम का लाभ उठा सकें। पुणे ऑर्थोपेडिक सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. नितिन भागली का कहना है कि अगर मरीज या उनके परिजन सलाह दिए जाने पर आईसीयू देखभाल से इनकार करते हैं तो डॉक्टरों और अस्पतालों को कानूनी पचीदों में छूट दी जानी चाहिए।
कई मामलों में आईसीयू ही होता है एकमात्र विकल्प
कुछ चिकित्सकों ने कहा कि इस कदम से जनता की परेशानियां कम हो जाएंगी, वहीं कई अन्य ने कहा कि अगर रिश्तेदार आईसीयू देखभाल से इनकार करते हैं तो चिकित्सा संस्थानों को आगे के परिणामों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जाना चाहिए। सामान्य धारणा यह है कि दिशानिर्देशों की बेहतर समझ और कार्यान्वयन के लिए अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है। कभी-कभी मरीजों को गंभीर स्थिति में लाया जाता है और उन्हें स्थिर करने के लिए आईसीयू ही एकमात्र विकल्प है।

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