" /> कोरोना की जद में अब यूपी के गांव!… यूपी में पंचायत चुनावों ने बढ़ा दी हैं मुश्किलें

कोरोना की जद में अब यूपी के गांव!… यूपी में पंचायत चुनावों ने बढ़ा दी हैं मुश्किलें

उत्तर प्रदेश में कोरोना के कहर से हालात कारुणिक हो चुके हैं। लगातार लोग अस्पताल और ऑक्सीजन की कमी से जान गवां रहे हैं। पिछले साल भी क्रूर कोरोना ने हिंदी हृदय प्रदेश को खूब रुलाया था लेकिन गनीमत यह थी कि लाखों प्रवासी मजदूरों की दुख-दारुण भरी घर वापसी के बाद भी यहां के गांव इस विपदा की मार से बच गए थे। इस बार भी आमतौर पर प्राकृतिक स्वास्थ्य के धनी गंवई लोगों को कोई खास दिक्कत नहीं थी, शहर ही महामारी के शिकार हो रहे थे लेकिन बड़े सियासी लक्ष्य के चलते योगी सरकार की जिद ने स्थितियां बेहद खराब और निहायत चिंताजनक कर दी हैं।
दरअसल अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव के पहले ग्रामीण इलाकों में अपना राजनयिक प्रभुत्व बनाने के इरादे से भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर काफी तैयारी कर रखी थी। पार्टी अध्यक्ष सहित पूरा अमला इस काम में महीनों से लगा हुआ था। इसी बीच कोरोना की लहर आई तो चारों ओर से इन चुनावों को रोकने का माहौल बना परंतु सरकार अपने इरादे पर कायम रही। नतीजतन अब गांवों की चिंता बढ़ गई है।
उत्तर प्रदेश में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोरोना की लहर का असर शहरों में थोड़ा मद्धम होने लगा है पर गांवों में इसने तेजी से पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। बड़े शहरों में जहां कोरोना के मरीजों की तादाद पहले के मुकाबले आंशिक ही सही पर कम होने लगी, वहीं प्रदेशभर के गांवों से मरीज निकलने लगे हैं। हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनावों और मतगणना के बाद इसके और तेज होने के आसार हैं। बड़ी तादाद में पंचायत चुनाव संपन्न करानेवाले सरकारी कर्मी भी कोरोना के शिकार बने हैं।
उत्तर प्रदेश में जबरदस्त कोरोना प्रसार के बीच चार चरणों में संपन्न हुए पंचायत चुनाव प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों के लिए जानलेवा साबित हुए हैं। प्रदेशभर में पंचायत चुनाव कराने की अहम जिम्मेदारी इन्हीं प्राथमिक शिक्षकों को सौंपी गई थी। प्राथमिक शिक्षकों के संघ के मुताबिक इस पूरी कवायद में ७०० से ज्यादा शिक्षकों की जान कोरोना से चली गई है। शिक्षक संघ ने बाकायदा उन ७०० से ज्यादा मृत शिक्षकों की सूची जारी कर सरकार से जवाब मांगा है कि कोरोना की जबरदस्त लहर के बीच आखिर क्यों चुनाव कराए गए? इस बीच प्रदेश में पंचायत चुनावों के लिए दो मई को मतों की गिनती के काम में भी बड़े पैमाने पर शिक्षकों की ही ड्यूटी लगाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट में भी यूपी पंचायत चुनावों की मतगणना रोकने के लिए एक याचिका दाखिल की गई थी। हालांकि याचिका का निस्तारण करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य निर्वाचन आयोग से कोरोना प्रोटोकाल का पालन करते हुए मतगणना जारी रखने को कहा था।
यूपी में पंचायत चुनाव उस समय कराए गए हैं जब कोरोना का प्रसार अपने चरम पर है। चुनाव ड्यूटी के प्रशिक्षण से लेकर मतदान तक संक्रमण को रोकने के कोई उपाय नहीं किए गए। इतना ही नहीं इन चुनावों में संक्रमितों को भी वोट डालने की सुविधा दी गई। मतगणना से पहले शिक्षकों के लिए आरटीपीसीआर टेस्ट कराना अनिवार्य किया गया और इसकी जांच जिन जगहों पर की गई वहां भारी भीड़ जमा रही, जहां सोशल डिस्टेंसिंग का कोई मतलब तक नहीं रह गया।
उत्तर प्रदेश के आईएएस अफसरों के एक व्हॉट्सऐप ग्रुप में कई जिलाधिकारियों ने पंचायत चुनावों को गैरजरूरी बताते हुए कहा कि इसे इन हालात में नहीं कराना चाहिए। अयोध्या जैसे महत्वपूर्ण जिले के जिलाधिकारी अनुज कुमार झा का तो व्हॉट्सऐप मैसेज सुर्खियों में रहा, जहां उन्होंने कहा है कि इन हालात में पंचायत चुनावों की क्या जरूरत थी? उनके मैसेज में साफ लिखा गया कि जब १५ अप्रैल से हालात खराब हैं तो पंचायत चुनाव क्यों होने दिए गए? एक अन्य अधिकारी ने बताया कि कई जिलाधिकारियों ने इसी तरह के मत व्यक्त किए हैं। प्रदेश की लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने मौजूदा हालात में पंचायत चुनावों का विरोध किया था।
उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ ने बीते हफ्ते ७०६ उन शिक्षकों की एक सूची जारी की, जिनकी मौत बीते एक महीने में पंचायत चुनाव कराते हुए कोरोना से हो गई है। संघ ने दो मई को होनेवाली मतगणना को स्थगित करने की मांग करते हुए सरकार से शिक्षकों का जीवन बचाने की गुहार लगाई थी। अन्य कर्मचारी संगठनों ने तो बहिष्कार तक की धमकी दी थी। हालांकि सुनी एक न गई और कोरोना प्रोटोकाल की धज्जियां उड़ाते हुए पंचायत चुनावों की मतगणना शुरू हो गई, सोमवार सुबह तक जारी थी। संघ ने मृत शिक्षकों के लिए ५० लाख रुपए का मुआवजा और उनके आश्रितों को नौकरी की मांग करते हुए कहा है कि सभी संक्रमितों का सरकारी खर्च पर बेहतर इलाज करवाया जाए।
प्रदेश में बदहाल हो चुकी चिकित्सा व्यवस्था और कोरोना से हो रही मौतों के बीच प्रदेश सरकार ने कई जगहों पर आयुष के डॉक्टरों की भी ड्यूटी पंचायत चुनावों में लगा दी थी। यह भी तब हुआ जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एलान किया है कि कोरोना से जंग में आयुष, होम्योपैथी व यूनानी डॉक्टरों की मदद ली जाएगी। उन्होंने ५,००० से ज्यादा इस संवर्ग के डॉक्टरों से संवाद किया। इसके उल्टा राजधानी लखनऊ जहां के हालात सबसे ज्यादा खराब हैं, वहां के जिला प्रशासन ने आयुष डॉक्टरों को चुनाव ड्यूटी में झोंक दिया था। मुख्यमंत्री के एलान के ठीक अगले दिन ही आयुष डॉक्टरों को राजधानी में मतगणना के प्रशिक्षण के लिए बुला लिया गया था।
कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी ने बड़ी तादाद में पंचायत चुनावों में हुए शिक्षकों की मौत का मुद्दा उठाते हुए फेसबुक पोस्ट लिखी और ट्वीट किया है। प्रियंका गांधी ने कहा कि यूपी पंचायत चुनावों की ड्यूटी में लगे लगभग ५०० शिक्षकों की मृत्यु की खबर दुखद और डरावनी है। चुनाव ड्यूटी करनेवालों की सुरक्षा का प्रबंध लचर था तो उनको क्यों भेजा? उन्होंने कहा कि सभी शिक्षकों के परिवारों को ५० लाख रुपए मुआवजा व आश्रितों को नौकरी की मांग पूरी की जाए। प्रदेश के कई विपक्षी नेताओं ने शुरुआत से ही पंचायत चुनावों पर उंगली उठाई थी। इन सबके बाद भी चुनाव कराने पर आमादा सरकार ने बाकायदा इसके लिए अदालत तक का दरवाजा खटाखटा डाला।
कोरोना के गांवों में पसरने के अंदेशे को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एलान किया था कि संक्रमण से गांवों को सुरक्षित रखने के लिए इसी सप्ताह से विशेष कोविड टेस्टिंग अभियान शुरू हो रहा है। इस अभियान के तहत निगरानी समितियां घर-घर जाकर लोगों का इंप्रâारेड थर्मामीटर से जांच करेंगी, पल्स ऑक्सीमीटर से लोगों का ऑक्सीजन लेवल चेक किया जाएगा।
इन उपायों के एलान के बाद भी सबसे बड़ा सवाल है कि गांवों में कोरोना के फैलने की स्थिति में प्रदेश के पास क्या इतने चिकित्सा के साधन हैं कि सबका इलाज हो सके? जो व्यवस्था शहरों में इलाज करने में हांफ गई, उसके बूते गांवों को कैसे सुरक्षित रखा जा सकेगा? पंचायत चुनावों का दंश अभी आनेवाले कई दिनों तक लोगों को झेलना पड़ेगा।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि प्रदेश में कोरोना संक्रमण के हालात सुधर नहीं रहे हैं। सांसों का आपातकाल जारी है। मुख्यमंत्री के झूठे दावों की रोजाना अस्पतालों से आ रही डरावनी तस्वीरें पोल खोल रही हैं। वस्तुत: सत्तादल ने चार साल में कोई काम तो किया नहीं। उसने खुद आइसोलेशन में रहते-रहते पूरे प्रदेश को ही आइसोलेशन में पहुंचा दिया है।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)