" /> म. प्र. में जैविक खेती… बहुत कठिन है डगर पनघट की!

म. प्र. में जैविक खेती… बहुत कठिन है डगर पनघट की!

मध्यप्रदेश की भौगोलिक स्थिति पर यदि गौर किया तो मध्य प्रदेश जैविक विविधताओं से भरा हुआ है। जहां एक तरफ सतपुड़ा, विंध्यांचल और मेकल पर्वत श्रृंखला है, जिसमें से नर्मदा, ताप्ती, महानदी और तवा जैसी जीवनदायिनी नदियां निकलती हैं, जिनके पानी से मध्यप्रदेश के खेत लहलहाते हैं, वहीं मालवा के पठारी भाग से चंबल नदी निकलती है, जो मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग को सिंचित करती है। सतपुड़ा, विंध्यांचल मेकल पर्वत श्रेणियों के वन आच्छादित भूभाग से परम पावन मां नर्मदा में वर्ष भर जल प्रवाहित होता है। इन सभी भौगौलिक विविधताओं और वातावरण में मध्यप्रदेश के पास जैविक खेती को चरणबद्ध तरीके से विकसित करने के भरपूर अवसर उपलब्ध है।
साधनों का सुसंगत नियोजन
बीते हुए समय के साथ कृषि, कृषि कार्य में लगनेवाले नियोजनों में कृषि आदानों में तेजी के साथ बदलाव देखने को मिल रहा है। मशीनों ने पशु शक्ति का स्थान ले लिया, जिससे गोवंश पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। २०१८ की पशु गणना के अनुसार दुधारू पशुओं में मादाओं का स्थान ज्यादा है, जो स्वाभाविक भी है। इसके इतर वर्ष २०१८-१९ में कुल दुग्ध उत्पादन में विदेशी नस्ल के मवेशियों का योगदान २८ प्रतिशत रहा है, इससे तस्वीर साफ हो जाती है कि देसी गोवंश के बारे में गंभीरता पूर्वक विचार किए जाने की आवश्यकता है।
जैविक खेती में गायों के महत्व को देखते हुए इस बात का महत्व खासा बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में देशी उन्नत गायों का संरक्षण दिया जाना चाहिए और विवेकहीन संकरण की प्रक्रिया को कड़ाई के साथ प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। जैविक खेती में देशी गाय का महत्व समझनेवाले बताते हैं कि दरअसल देशी गाय का वर्मी कम्पोस्ट तुलनात्मक रूप से सर्वश्रेष्ठ होता है, गौमूत्र से कीट नाशक और गोबर से कई प्रकार के कीटनाशक और खाद सफलतापूर्वक बनाए जा सकते हैं।
जैविक खेती और अधिक उत्पादन
ऐसा भ्रम सुनियोजित ढंग से पैâलाया गया है कि जैविक खेती से किसान अधिक उत्पादन नहीं कर सकते, अपितु देखने मे ये आ रहा है कि कई किसान जैविक खेती कर अधिक संपन्न हुए हैं और उनके उत्पादों को खरीदने में लोगो की रुचि बढ़ रही है। विशेषकर कोरोना काल में लोग जैविक उत्पादों में रुचि ले रहे हैं। यहां हमें उन संभावनाओं को देखना चाहिए, जिससे आनेवाली जैविक कृषि की क्रांति का लाभ मध्यप्रदेश को मिले और मध्यप्रदेश संपूर्ण भारत का जैविक खेती में नेतृत्व कर सके।
जलवायु परिवर्तन एक चुनौती है
वर्तमान में लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन से भी खेती के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं। तापमान में हो रहे बदलाव से गेहूं के बड़े क्षेत्र में पैदावार घटने का खतरा बढ़ सकता है। अल्प वर्षा, अतिवर्षा एक तरफ तो दूसरी तरफ जलवायु से संबंधित खतरा है तो रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के विवेकहीन उपयोग से भूमि की उर्वरकता कम हो रही है। इसके साथ भूमि की कठोरता भी बढ़ रही है, जिसके कारण पशुओं से खेत जोतना असंभव जैसा हो गया है। बल्कि ट्रैक्टरों में भी अधिक हॉर्सपावर की आवश्यकता महसूस होने लगी है। कृषि के बाह्य आदानों के बढ़ने से खेती की लागत बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में जैविक उत्पादों का बेहतर बाजार विकसित करने पर छोटी जोत के किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा, जिससे खेती और भूमि दोनों को बचाया जा सकता है।
वनवासी क्षेत्रों में सर्वाधिक संभावना
मध्यप्रदेश के कुल सात संभागों के अंतर्गत २० जिलों में ८९ आदिवासी विकास खंड स्थापित हैं। इन सातों संभागों में सर्वाधिक ४० इंदौर में है। उसके बाद २८ जबलपुर और नर्मदापुरम संभाग में ८ आदिवासी विकास खंड है, जिनमें वनोपजों को ऑर्गेनिक से भी ऊपर प्राकृतिक उत्पादों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। इन्हें वनोपज कहा जाता है जबकि ये प्राकृतिक रूप से बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के पैदा होती है, जिसका वैश्विक बाजार में बहुत अच्छा मूल्य मिल सकता है। इसके बाद वनवासी बंधुओं द्वारा की जा रही खेती को ध्यान से समझने से पता चलता है कि सुदूर वनवासी क्षेत्रों में होनेवाली खेती में बहुत कम रासायनिक दवाओं का प्रयोग होता है या कहीं-कहीं होता ही नहीं। इन क्षेत्रों को चिन्हित कर उन्हें जैविकीय भूमि का प्रमाणीकरण किया जाए और इन भूमियों को ‘दुर्लभ प्राकृतिक भूमि’ नाम से सहेजा जाए और वनवासी बंधुओं को जैविक खेती के लिए उत्तम देशी गाएं, उनके संरक्षण, पालन-पोषण के साथ जैविक खाद और दवाएं बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके अलावा स्वसहायता समूहों का गठन करना एक आवश्यक गतिविधि के रूप में सम्मिलित किए जाने की आवश्यकता है।
मिट्टी का क्षरण बड़ी समस्या
मध्यप्रदेश की मिट्टी में वैविध्य इसे लाभकारी स्थिति में खड़ा करता है। दोमट, काली, पठारी के साथ पीली मिट्टी जैविक विविधताओं के साथ कई प्रकार के बायो मास उपलब्ध कराती है। इसके पारिस्थितिक तंत्र में आश्चर्यजनक विविधिता जैविक खेती के लिए वरदान साबित हो सकती है। मिट्टी की स्थिति को देखा जाए तो हालात चिंताजनक है। नर्मदा नदी के किनारों पर लगातार वनों की कटाई से तटों के दोनों ओर मिट्टी का क्षरण लगातार बढ़ रहा है, हालांकि दोनों ही किनारों पर वनों को बढ़ाने की योजना है लेकिन वृक्षारोपण में जनभागीदारी की कमी के चलते, ये नाकाफी मालूम पड़ रहा है। दरकते नदियों के तट और चंबल नदी के बीहड़ों में रेत के धोरे बनने की प्रक्रिया तेज होती जा रही है। वनों की लगातार घटती संख्या से ‘डारेक्ट रेन’ बारिश में मिट्टी को तेजी से घोलकर बहा ले जाती है, जिसे सिल्ट लोड बढ़ना कहा जाता है। ये एक खतरनाक स्थिति होती है और मिट्टी के क्षरण में मुख्य कारण माना जाता है। नदियों के दरकते तट इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं क्योंकि नदियों के तटों पर मिट्टी को पकड़ कर रखने और सीधी बारिश को झेलने वाले वन तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। इस प्रक्रिया में बहुमूल्य जैव विविधता से भरे मिट्टी के मैदान और खेत नष्ट हो जाते है। मिट्टी के साथ पूरा का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र भी बह जाता है। इन सभी के अलावा मध्यप्रदेश को पशु विभाग, वनविभाग और कृषि विभाग के साथ एक टास्क फोर्स बनाने की जरूरत है, जो एक समेकित योजना के तहत जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त प्रयास करे, वहीं जैविक उत्पादों के लिए राइट चेनल बनाने की जवाबदारी शासन की है, जो जैविक खेती करने वाले किसानों को इस दिशा में उनके जैविक उत्पादों को सही मूल्य दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हो।
(लेखक मध्यप्रदेश की राजनीतिक पत्रकारिता में गहरी पकड़ रखते हैं, मध्यप्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विषयों पर लगातार काम करने के साथ कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन भी करते हैं। )