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श्रावणी पूर्णिमा पर काशी के विप्र समाज ने वैदिक कालीन परंपरा के तहत गंगा घाटों पर किया गया उपाकर्म

उमेश गुप्ता / वाराणसी

श्रावण पूर्णिमा के मान विधान के तहत सनातन धर्मावलंबियों ने बुधवार को ‘एकोहं बहुयस्याम्’ की ब्रह्म आकांक्षा के साथ गंगा घाटों पर श्रावणी पर्व मनाया। हेमाद्रि संकल्प के साथ गंगा तट पर दश विध गण स्नान किया। इसमें भस्म, गोबर, मिट्टी, गो मूत्र, गो दुग्ध, गो दूध से तैयार दधि, गो घृत, हल्दी, कुश और मधु आदि का लेपन कर सस्वर वेद मंत्रों के बीच गंगा की जल धारा में स्नान कराया गया।

स्नानांग तर्पण विधान के बाद आसन ग्रहण कर गणपति पूजन, ऋषि पूजन, यज्ञोपवीत दान, यज्ञोपवीत संस्कार, यज्ञोपवीत धारण, हवन और रक्षा विधान किए। इसके लिए दशाश्वमेध,तुलसी घाट, अहिल्याबाई, केदारघाट, पंचगंगा, मणिकर्णिका समेत गंगा के विभिन्न घाटों पर सुबह से ही विप्रजनों की जुटान हुई। मठ-मंदिरों, संस्कृत व वेद विद्या से संबंधित संस्थानों में दोपहर बाद तक अनुष्ठान किए गए।

श्रावणी उपक्रम को लेकर विद्वानों ने बताया कि वास्तव में श्रावणी उपाकर्म के तीन अंग हैं। इसमें प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय शामिल हैं। इसमें गुरु के सानिध्य या पुरोहित के निर्देशन में दशविध स्नान कर वर्ष पर्यंत जाने-अनजाने पाप कर्मों से मुक्ति के लिए प्रायश्चित का विधान है। यह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। रचनात्मक कार्यों के लिए स्फूर्ति भरता है। ऋषि पूजा व यज्ञोपवीत संस्कारादि आत्म संयम संस्कार की श्रेणी में आते हैं। साथ ही सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, सदसस्पति, अनुमति, छंद व ऋषि को समर्पित हवन-यज्ञ में घृत आहुति के साथ वेद-वेदांग के स्वाध्याय का श्रीगणेश होता है।

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