मुख्यपृष्ठस्तंभफिर एक दफा सबसे दोस्ती सबसे दगा! ...पाकिस्तान का नया प्रपंच

फिर एक दफा सबसे दोस्ती सबसे दगा! …पाकिस्तान का नया प्रपंच

आनंद तिवारी
दहशत और दगाबाजी आज पाकिस्तान की पहचान बन चुकी है। अपनी इसी फितरत के कारण पाकिस्तान आज आतंक और बर्बादी का ज्वालामुखी बन चुका है। सेना और सियासी लोगों के बीच मची इसी उथल-पुथल के बीच सरकारी खजाना खाली हो चुका है। नतीजतन, फाकाकशी को मजबूर पाकिस्तान की अवाम कभी भी फट सकती है। ऐसे विषम हालातों में पाकिस्तान की हाल ही में गठित कार्यवाहक सरकार के प्रधानमंत्री को सब ‘अपने’ लगने लगे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान की नवगठित कार्यवाहक सरकार अब हिंदुस्थान से भी दोस्ती का राग अलापने लगी है। हालांकि, दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है की तर्ज पर पाकिस्तानियों की इन बातों पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा है, खासकर हिंदुस्थान को तो बिलकुल भी नहीं।
दुनिया जानती है कि हिंदुओं के विरोध की बुनियाद पर निर्माण हुए पाकिस्तान का अस्तित्व आज हिंदुस्थान के विरोध पर ही टिका हुआ है। यही वजह है कि हिंदुस्थान से बैर निभाने के प्रयास में पाकिस्तान की सरकारें अपनी अवाम की अनदेखी करती रहीं और आतंकवादियों को पालती रहीं। उनका यह कदम गलत है, इसका अहसास उन्हें हुआ लेकिन सब कुछ लुटाने के बाद। लेकिन मजबूरी यह है कि यदि वे हिंदुस्थान से बैर छोड़ते हैं तो जनता उनसे रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार जैसे बुनियादी सवाल पूछने लगेगी। हिंदुस्थान से एक दिन पहले आजाद हुआ मुल्क आज दशकों पीछे वैâसे पहुंच गया? इस सवाल का जवाब पाकिस्तानी हुक्मरानों के पास नहीं होगा। इसलिए दाने-दाने को मोहताज पाकिस्तान की पूर्ववर्ती सरकार के लोग दुनियाभर में भीख का कटोरा लेकर घूमने के दौरान जब-जब थके तब-तब उन्होंने हिंदुस्थान से बैर भुलाने की बात की, लेकिन अगले ही पल जब उन्हें लगा कि जनता उन्हें देश की बर्बादी, महंगाई, बेरोजगारी पर सवाल पूछ सकती तो तुरंत उनकी बोली बदल गई। चाहे सरकार नवाज शरीफ की हो या फिर बेनजीर भुट्टो, परवेज मुशर्रफ, इमरान खान की, हिंदुस्थान से दोस्ती का राग ज्यादा समय तक टिक नहीं सका। लेकिन पाकिस्तानी सियासतदानों पर विश्वास करने की हिंदुस्थान ने बड़ी कीमत चुकाई है। पाकिस्तानियों ने हिंदुस्थान को कश्मीर, कारगिल और २६/११, अक्षरधाम, उरी, पठानकोट, पुलवामा जैसे सैकड़ों जख्म दिए हैं।
ऐसा नहीं है कि पाकिस्तानी सिर्फ हिंदुस्थान से ही दगाबाजी करते हैं, बल्कि उन्होंने सालों साल तक आर्थिक और सामरिक मदद करनेवाले अंकल सैम यानी अमेरिका को भी नहीं बख्शा है। अमेरिका से पैसे लेकर वे कश्मीर में आतंकवाद को पोसते थे। यही काम उन्होंने अफगानिस्तान में भी किया। पूरी दुनिया को दहलानेवाले ९/११ आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान से तालिबान को उखाड़ फेंकने का बीड़ा उठाया था। उसमें मदद के नाम पर पाकिस्तान ने अमेरिका से अथाह पैसा और शस्त्र लिया लेकिन उन शस्त्रों और पैसों से वे तालिबानियों को भी ताकतवर बनाते रहे। नतीजतन अफगानिस्तान में अमेरिका अपने मंसूबों में नाकाम रहा और उसे शर्मनाक ढंग से वहां से पीठ दिखाकर भागना पड़ा। पाकिस्तान फिलहाल चीन का इस्तेमाल कर रहा है लेकिन वह चीन का कहां तक साथ देगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है।
फिलहाल, कंगाल पाकिस्तान में नवगठित कार्यवाहक सरकार के कार्यवाहक विदेश मंत्री जलील अब्बास ने कहा है कि पाकिस्तान सभी से दोस्ती का इच्छुक है, किसी से दुश्मनी नहीं चाहता। मंत्री जलील अब्बास जिलानी ने कहा है कि वह अमेरिका और चीन सहित सभी प्रमुख शक्तियों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाएंगे, भारत के साथ संबंध बेहतर करेंगे और खाड़ी क्षेत्र के साथ सहयोग बढ़ाएंगे। वैसे तो जिलानी कार्यवाहक सरकार में मंत्री हैं, इसलिए सबसे दोस्ती की उनकी बात बहुत ज्यादा वजन नहीं रखती है लेकिन फिर भी दुनिया को यही प्रार्थना करनी चाहिए कि इस बार पाकिस्तान अपनी बात पर कायम रहे, अपनी पुरानी फितरत को न दोहराए, ताकि दुनिया में अमन और सुकून निर्माण हो सके तथा पाकिस्तान भी आर्थिक रूप से समृद्ध हो सके। सुरक्षित मुल्क के लिए पड़ोसी का सुखी और शांत रहना जरूरी होता है।

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