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विधवाओं के लिए खोलो मंदिर के पट! प्रवेश पर रोक है महिलाओं का अपमान, मद्रास हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
विधवाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता। इस पर मद्रास हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी प्रकट करते हुए कहा है कि मंदिर के पट विधवाओं के लिए खोले जाने चाहिए। हाई कोर्ट ने साफ कहा कि मंदिर में विधवाओं के प्रवेश करने पर रोक महिलाओं का अपमान है। ऐसे में यह प्रथा बंद की जानी चाहिए।
मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले में कड़े शब्दों में नाराजगी जताते हुए कहा कि इस सभ्य समाज में ऐसा कभी नहीं हो सकता। यह बात मद्रास हाई कोर्ट ने थंगमणि नाम की महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए कही। कोर्ट ने कहा कि विधवाओं का मंदिर में जाना आज भी अशुद्ध माना जाता है। राज्य में आज भी पुरानी मान्यता कायम है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तरह के रीति-रिवाज पुरुषों द्वारा अपनी सुविधा के लिए बनाए जाते हैं। ये प्रथाएं केवल महिलाओं को अपमानित करती हैं, क्योंकि उन्होंने अपने पति को खो दिया है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आनंद वेंकटेश ने कहा कि महिलाओं की अपनी एक पहचान है। किसी महिला को उसकी विवाहित स्थिति के आधार पर किसी भी तरह से अपमानित या तिरस्कृत नहीं किया जा सकता है। सभ्य समाज में ऐसा नहीं हो सकता, जहां कानून का राज हो। विधवा को मंदिर में प्रवेश करने से रोकने वाले व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
पुजारी की विधवा है याचिकाकर्त्ता
हाई कोर्ट में याचिका दायर करनेवाली थंगमणि एक पुजारी की विधवा है। आगामी ९ और १० अगस्त को तमिलनाडु के इरोड जिले में महोत्सव का आयोजन किया गया है। विधवा होने के नाते, उन्होंने पेरियाकरुपरायण मंदिर में पूजा के लिए पुलिस सुरक्षा मांगी है। थंगमणि ने अदालत को बताया कि पति मंदिर में पुजारी था। २८ अगस्त २०१७ को पति का निधन हो गया। अब मैं अपने बेटे के साथ मंदिर जाकर पूजा करना चाहती हूं, लेकिन कुछ लोगों ने धमकी दी है कि विधवा होने के कारण वे मंदिर नहीं जा सकतीं। कोर्ट ने कहा कि कोई भी किसी महिला और बच्चे को त्योहारों में भाग लेने और पूजा करने से नहीं रोक सकता।

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