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जनमत: ‘उन कठिन दिनों’ के मुद्दे पर इतना सरल कैसे बोल गई स्मृति ईरानी?

उमा सिंह

इन दिनों देश में `उन कठिन दिनों’ यानी पीरियड लीव का मुद्दा गरमाया हुआ है। दरअसल, हाल ही में लोकसभा में चल रहे शीतकालीन अधिवेशन के दौरान केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने ‘कठिन दिनों’ के अवकाश के विरोध में अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह कोई ‘बाधा’ नहीं है और इसलिए इसके लिए ‘सवेतनिक अवकाश नीति’ की आवश्यकता नहीं है। जिसके बाद से उन पर आए दिन ‘तूफानी’ हमले हो रहे हैं और इस पर तीखी बहस छिड़ गई है।

भड़कीं बीआरएस नेता के.कविता

इस मामले में बीआरएस नेता और तेलंगाना के पूर्व सीएम केसीआर की बेटी के.कविता ने स्मृति ईरानी के बयान की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा कठिन दिनों के संघर्ष को राज्यसभा में खारिज करने से निराश हूं। एक महिला के रूप में, इस तरह की अज्ञानता को देखना भयावह है, हमारे संघर्षों के लिए, हमारी यात्राएं कोई सांत्वना नहीं है, यह एक समान अवसर की हकदार है और यह एक नॉन निगोसियेबल बात है।

महिलाओं की ही बनें समिति

हालांकि, छुट्टी के इस व्यवस्था को लेकर सार्थक पहल की जरूरत है लेकिन जिस तरह से केंद्र में बैठे मोदी सरकार के मंत्री इस मुद्दे पर अपनी राय दे रहे हैं उससे कई महिलाओं ने आपत्ति जताई है। हालांकि, छुट्टी की व्यवस्था को लेकर सार्थक पहल की जरूरत है। देशव्यापी नियम की दिशा में भारत सरकार को विचार करना चाहिए। इसके लिए महिलाओं की ही एक ऐसी समिति बनाई जानी चाहिए, जिसमें हर फील्ड की महिलाएं शामिल हों। इस समिति में डॉक्टर महिला भी हों। संगठित के साथ ही असंगठित क्षेत्र के लिए काम करने वाली महिलाओं को भी समिति में जगह मिलनी चाहिए। संवेदनशीलता और देश की आधी आबादी की जरूरत को समझते हुए व्यापक विचार विमर्श होना चाहिए। उसके बाद इस दिशा में राष्ट्रीय नीति बननी ही चाहिए।

कई देशों में लागू है यह लीव

वैसे बता दें कि कई देश ऐसे हैं जहां पीरियड लीव को मंजूर किया गया है, जिसमें जापान, ताइवान, इंडोनेशिया और साउथ कोरिया देश शामिल हैं, जहां पर ३ से ५ दिनों की पीरियड लीव दी जाती है। दक्षिण अफ्रीकी देश जांबिया में भी यह लागू है।

सरकार है कि मानती ही नहीं! सालों से उठ रही है मांग 

पीरियड लीव को लेकर क्या कानून बनाया जाना चाहिए, इस पर महिलाओं सहित कई संगठन सालों से इसके पक्ष में मांग उठा रहे हैं। लेकिन सरकार है कि मानती ही नहीं। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के रुख को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में केंद्र सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर आगे बढ़ने के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रही है। उन्होंने मेंस्ट्रुअल यानी पीरियड लीव को हर महिला के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बताया। यही नहीं सरकार के अलावा इसी साल २४ फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था, जिसमें सभी राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए उनके संबंधित कार्य स्थलों पर मासिक धर्म के दौरान छुट्टी के लिए नियम बनाएं।

‘पीरियड लीव’ पर तीसरा रास्ता

मामा अर्थ की कोफाउंडर गजल आघा ने इस पर अपनी राय दी है। गजल ने चिंता जाहिर की है कि पीरियड लीव की लड़ाई संभावित रूप से लैंगिक समानता को लेकर हुए सुधार को कमजोर कर सकती है। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए इसका एक तीसरा ही रास्ता सुझाया है। उन्होंने कहा ‘हमने इक्वल ऑपरच्युनिटीज और महिलाओं के अधिकारों के लिए सदियों से लड़ाई लड़ी है और अब पीरियड लीव के लिए लड़ना इस कड़ी मेहनत को पीछे धकेल सकता है। तो इसका एक बेहतर समाधान क्या होगा? दर्द से जूझ रही महिलाओं को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी जा सकती है।’

रंजीता ने चलाया अभियान

भारत में पेड पीरियड लीव को लेकर छिड़ी बहस ने ओडिशा की रंजीता को फिर सुर्खियों में ला दिया। रंजीता प्रियदर्शिनी मासिक धर्म के दौरान महिला कर्मचारियों को एक दिन का सवेतन अवकाश दिलाने को लेकर ‘पेड पीरियड लीव’ अभियान चला रही हैं। इन्‍हें हाल ही एचआर भारत के फाउंडर समर महापात्रा ने चैंपियन ऑफ वीमेन एंप्‍लॉई का अवार्ड प्रदान किया। रंजीता कहती हैं कि मासिक धर्म की पीड़ा की वजह से वे अपनी कंपनी से एक दिन का अवकाश लेना चाह रही थीं, मगर मैनेजर ने इनकार कर दिया। ऐसे में रंजीता को लगा कि ना जाने देशभर में उसकी जैसे कितनी ही कामकाजी महिलाओं को इस तरह की दिक्‍कत का सामना करना पड़ता है। तब रंजीता ने नौकरी छोड़ पेड पीरियड लीव अभियान शुरू कर दिया। रंजीता पेड पीरियड लीव अभियान को कानून के दायरे में लाने के लिए १७ स्‍टेट में जा चुकी हैं।

बिहार कर सकता है तो अन्य राज्य क्यों नहीं?

अन्य देशों की क्या है स्थिति?

आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में बिहार पीरियड्स के लिए छुट्टी की नीति बनाने वाला पहला राज्य था। सवाल उठ रहा है कि जब इस मुद्दे को लेकर ‘पिछड़ा’ कहे जानेवाले राज्य बिहार कर सकता है तो अन्य राज्य क्यों नहीं? वैसे भी इस नीति को लेकर अन्य देशों की स्थिति क्या है, इस पर भी एक नजर डालते हैं।

भारत में अभी भी बहस का मुद्दा

कुछ भारतीय कंपनियां जैसे इविपन, जोमैटो, बायजूज, स्विगी, मातृभूमि, मैग्जटर, इंडस्ट्री, एआरसी, फ्लाईमायबिज और गुजूप पहले से ही पेड पीरियड लीव ऑफर करती हैं। वहीं यूके, चीन, जापान, ताइवान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, स्पेन और जांबिया पहले से ही किसी न किसी रूप में मासिक धर्म दर्द अवकाश दे रहे हैं, लेकिन भारत में ये अभी भी बहस का मुद्दा बना हुआ है।

विदेशों में भी स्थिति बखान करने लायक नहीं

कुछ कंपनियों और संस्थानों ने महिलाओं को मासिक धर्म अवकाश देने के लिए कानून द्वारा बाध्य होने का इंतजार नहीं किया है। इनमें ऑस्ट्रेलियाई पेंशन फंड फ्यूचर सुपर, भारतीय खाद्य वितरण स्टार्टअप जोमैटो और फ्रांसिस फर्नीचर फर्म लुइस शामिल हैं जो क्रमश: ६, १० और १२ दिन की छुट्टी देना शुरू किए हैं। भारत में स्विगी, बायजू जैसी कुछ कंपनियां भी मासिक धर्म अवकाश की अनुमति देनी शुरू की हैं।

मार्च २०२१ में महिला कर्मचारियों को मासिक धर्म अवकाश लेने की अनुमति देने वाला स्पेन यूरोप का पहला देश बन चुका है। इंडोनेशिया ने २००३ में एक कानून पारित किया, जिसमें महिलाओं को बिना किसी पूर्व सूचना के प्रति माह दो दिन के मासिक धर्म अवकाश का अधिकार दिया गया लेकिन व्यवहार में यह प्रावधान विवेकाधीन है। जापान में भी साल १९४७ का एक कानून कहता है कि कंपनियों को महिलाओं को मासिक धर्म की छुट्टी देने के लिए सहमत होना होगा यदि वे इसके लिए अनुरोध करती हैं, जब तक उन्हें इसकी आवश्यकता हो। दक्षिण कोरिया में महिलाएं प्रति माह एक दिन के अवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की हकदार हैं। इनकार करने वाले नियोक्ताओं को ५ मिलियन वॉन (त्र्३,८४४) तक का जुर्माना भरना पड़ता है।

पीरियड लीव पर ‘दोपहर का सामना’ ने कुछ महिलाओं से राय ली है। आइए जानते हैं, इस गंभीर मुद्दे पर उनका क्या कहना है?

स्मृति का बयान गलत है

स्मृति ईरानी का बयान बिलकुल गलत है। माना कि औरतें बहुत ताकतवर हैं, किसी से कम नहीं हैं लेकिन एक पॉइंट पर आकर आपको मानना पड़ेगा कि हम औरतें हैं। इस दौरान हमें बेहिसाब दर्द सहना पड़ता है। स्मृति ईरानी ने कहा कि यह प्रोसेस बायोलोजिकल है तो आप उसे समझिए। ये प्राकृतिक है हर कोई इसे नहीं झेल सकता। मेरे हिसाब से महिलाओं को इस दौरान लीव मिलनी चाहिए। महिलाओं को आराम की सख्त जरूरत होती है। मूड स्विंग्स होते हैं। कुछ समझ में नहीं आता। -शिप्रा यादव, मुंबई

छुट्टी मिलनी चाहिए

महिलाओं को ‘उन कठिन दिनों’ की छुट्टियां मिलनी चाहिए। इस समय हमें कई परेशानियां होती हैं। शरीर में दर्द रहता है। हमें आराम की जरूरत होती है। ऐसे में ऑफिस का काम करना फिर घर आकर घर का काम करना बड़ी दिक्कतें होने लगती हैं। अगर हमें इस दौरान छुट्टी दी जाती है तो यह हमारे लिए काफी मददगार होगा। -ज्योति सिंह, मुंबई

वर्क फ्रॉम होम की हो सुविधा

स्मृति ईरानी ने कह तो दिया कि पीरियड कोई बीमारी नहीं है और छुट्टी नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन वे एक महिला हैं, ऐसे में उन्हें ये समझना चाहिए कि उन कठिन दिनों में महिलाओं को कितनी परेशानी होती है। अगर आप छुट्टी नहीं देना चाहते तो ठीक है आप मत दीजिए, लेकिन एक या दो दिन का वर्क फ्रॉम होम तो दे ही सकते हैं और अगर आप वो भी नहीं दे सकते तो परिस्तिथि को समझते हुए आप एक दिन की छुट्टी दे सकते हैं जो कि ऑप्शनल भी हो सकती है। -आयुषी तिवारी, मुंबई

पेड लीव की जरूरत नहीं है

हमें पीरियड लीव की खास जरूरत नहीं है। अगर हम देश में समानता की बात कर रहें हैं तो हमें भी उतना काम करना चाहिए जितना पुरुष करते हैं, जहां तक मैटरनिटी लीव की बात है वो हमें मिल रही है तो वो सही है। दूसरी ओर अगर किसी महिला को ज्यादा तकलीफ है तो वह अपना सिक लीव इस्तेमाल कर सकती है। पीरियड को मुद्दा बना कर अलग से छुट्टी देना ठीक नहीं है। -प्रिया पांडेय, मुंबई

 

ये कोई मुद्दा नहीं

इन दिनों हर महिला की अलग-अलग कंडीशन होती है। किसी को ज्यादा दर्द होता है तो किसी को कम। इस स्थिति में हर महिला को छुट्टी देना और इसे अनिवार्य कर देना ठीक नहीं है। जब व्यक्ति बीमार होता है तो ऑफिस आ जाता है या सिक लीव का इस्तेमाल करता है। तो महिलाओं को उन कठिन दिनों में भी ऐसा ही करना चाहिए अपनी सिक लीव का इस्तेमाल करना चाहिए। पीरियड लीव कोई मुद्दा नहीं है। -आंचल पांडेय, मुंबई

ऐसा भेदभाव क्यों?

पीरियड लीव महिलाओं को नहीं मिलनी चाहिए। क्योंकि देश में हम समानता की बात करते हैं और फिर इस प्रकार हमें कमजोर बता कर घर बैठा देने वाली बात अच्छी नहीं लगती। जिस महिला को दर्द है वह सिक लीव लेकर आराम कर सकती है। यह सब के लिए अनिवार्य करने की जरूरत नहीं है। पेड लीव को अनिवार्य नहीं करना चाहिए। -वैशाली पांडेय, मुंबई

स्मृति ईरानी का लॉजिक समझ में नहीं आया

स्मृति ईरानी का जो लॉजिक है माहवारी के दिन छुट्टी न देना ये गलत है। माना कि वो समय कोई हैंडीकैप नहीं होता है लेकिन जो दर्द होता है उसे नजरअंदाज नही किया जा सकता। इन मुश्किल दिनों के लिए छुट्टी हो, लेकिन वैकल्पिक हो। ताकि जिस महिला को इसकी जरूरत हो वह इसे ले सके। -आरती गार्गी, मुंबई

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