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बेबाक : रामायण के प्रति नायक लक्ष्मण को… हे, सत्ताधीशों क्यों भूल गए!

-रामानुज पराक्रम स्थली की सरकारें कब लेंगी सुध?

अनिल तिवारी मुंबई

भाग – २

प्रभु श्री राम की जीवन लीला का सबसे अहम और सबसे कठिन खंड उनके वन गमन से प्रारंभ होता है और उनके वनवास की समाप्ति के साथ ही उसका समापन भी हो जाता है। इस पूरे कालखंड में प्रभु श्री राम की यदि कोई स्वेच्छा से परछाई बना रहा, तो वे थे उनके अनुज लक्ष्मण। माता सीता के हरण के उपरांत तो प्रभु राम बिल्कुल टूट ही गए थे। तब भ्राता लक्ष्मण ने ही उन्हें ढाढ़स बंधाया, उन्हें संयम दिलाया और माता सीता के खोज अभियान को आगे बढ़ाया। बहुत संभव है कि यदि उस कालखंड में भ्राता लक्ष्मण प्रभु राम के साथ न होते तो शायद उनका संघर्ष और भी कठिन हो चुका होता और संभव है कि राम कथा का स्वरूप भी बदल चुका होता। दुर्भाग्य से आज राम के अनुज, रामानुज को भुलाया सा जा चुका है। विशेष रूप से उनकी पराक्रम स्थली, वर्तमान महाराष्ट्र में उनकी निशानियां उपेक्षित हो रही हैं। जो निश्चित ही गहन चिंतन का विषय है।
यह सर्व विदित है कि श्री राम के जीवन में लक्ष्मण का बेहद महत्व है और लक्ष्मण की लीला में वर्तमान महाराष्ट्र का। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि भ्राता लक्ष्मण के अधिकांश पराक्रमों ने इसी स्थली पर मूर्त रूप पाया। यही स्थली उनके समर्पण और संयम की साक्षी भी बनी। फिर भी महाराष्ट्र की इस पावन स्थली का समुचित विकास नहीं हो सका है। आदि कवि वाल्मीकि रचित रामायण हो या तुलसीकृत रामचरितमानस दोनों में लक्ष्मण जी के उत्तम चरित्र, राम के प्रति अथाह समर्पण और अनंत सेवा भाव का विस्तृत चित्रण किया गया है। परंतु कलियुग के इस कालखंड में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने उनके समर्पण में ‘पंचवटी’ नाम से ही १३ खंडों का एक बृहद खंडकाव्य समर्पित कर दिया है। जो उनके महाराष्ट्र की पवित्र भूमि से जुड़ाव को दर्शाता है। इस खंडकाव्य की सटीक आध्यात्मिक व्याख्या में प्रभु श्री राम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के वनवास का विस्तार से वर्णन तो है ही, इसमें लक्ष्मण जी का स्वयं से संवाद भी समाया हुआ है, जो पंचवटी की शांत प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण धरा पर आधारित है। यह अपने आप में लक्ष्मण जी की कथा और व्यथा को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त है। मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं:-
पूज्य पिता के सहज सत्य पर, वार सुधाम, धरा, धन को,
चले राम, सीता भी उनके, पीछे चलीं गहन वन को।
उनके पीछे भी लक्ष्मण थे, कहा राम ने कि ‘तुम कहाँ?’
विनत वदन से उत्तर पाया- ‘तुम मेरे सर्वस्व जहाँ’
सीता बोलीं कि ‘ये पिता की, आज्ञा से सब छोड़ चले,
पर देवर, तुम त्यागी बनकर, क्यों घर से मुँह मोड़ चले?’
उत्तर मिला कि, ‘आर्य्ये, बरबस, बना न दो मुझको त्यागी,
आर्य-चरण-सेवा में समझो, मुझको भी अपना भागी’
अर्थात, महाराजा दशरथ अपने वचन से विवश हैं और उनकी आज्ञा पाकर राम सब कुछ छोड़कर वन की ओर चल दिए। उनके पीछे सीता भी चल पड़ीं। दोनों के पीछे जब लक्ष्मण भी चलने लगे तो राम ने उनसे कारण पूछा। भाभी सीता ने भी कहा कि श्री राम तो पिता की आज्ञा के कारण सब कुछ छोड़कर जा रहे हैं। तुम क्यों राज्य से मुंह मोड़ रहे हो और त्याग कर रहे हो। इस पर लक्ष्मण जी का कहना था कि आप मुझे त्यागी न बनाएं, अपतिु, भैया की सेवा में अपना हिस्सेदार बनाएं। उसके उपरांत वर्णित है:-
‘क्या कर्तव्य यही है भाई?’ लक्ष्मण ने सिर झुका लिया,
‘आर्य, आपके प्रति इन जन ने, कब कब क्या कर्तव्य किया?’
‘प्यार किया है तुमने केवल!’ सीता यह कह मुस्काईं,
किन्तु राम की उज्जवल आँखें, सफल सीप-सी भर आईं
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से।
भावार्थ यह कि लक्ष्मण ने अपने वनगमन के लिए जब तर्क दिए तो सीता उनका यह प्रेम देखकर मुस्काने लगीं तो राम की आंखें भी नम हो गईं। अंतत: वन गमन के दौरान तीनों पंचवटी पहुंचे। जहां उन्होंने अपनी कुटिया बनाई थी, वहां चारों ओर निर्मल चांदनी बिखरी थी, चंद्रमा का प्रकाश जल में प्रतिबिम्बित हो रहा था। हरी-भरी घास आनंद विभोर कर रही थी। हरे-भरे पेड़ हवा से झूम रहे थे। कवि आगे लिखते हैं,
पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है।
किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
तात्पर्य यह कि, पंचवटी की छाया में सुंदर कुटिया स्थित है। रात्रि की बेला में एक स्वच्छ शिला पर वहां एक वीर खड़ा है। आखिर यह कौन धनुर्धर है, जो जाग रहा है। किसी स्वर्ण फूल के समान योगी सा दिखाई पड़ता है। इसने क्यों निद्रा का त्याग किया हुआ है। इसे राज्य के सुंदर उपवन में कोई रुचि नहीं है। आखिर उस कुटी में ऐसा कौन सा धन है, जो यह जाग्ाकर उसका प्रहरी बना हुआ है?
मैथिलीशरण गुप्त के इस महाकाव्य में लक्ष्मण जी के समर्पण की कथा-व्यथा अंतहीन है और उसी तरह अंतहीन है रामायण की आध्यात्मिक यात्रा में लक्ष्मण का अस्तित्व। यही अस्तित्व प्रमाणित करता है कि प्रभु राम के निर्वासन काल में वर्तमान नासिक उनके दंडकारण्य पथ का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। पर्ण कुटी उनका अस्थाई आवास तो ऋषि-मुनियों की तपोस्थली तपोवन, पांच वटों की पंचवटी, पवित्र गोदावरी व कपिला नदी का संगम तीर्थ उनके विचरण के स्थायी स्थल थे। यहां का सुमधुर और सुंदर वातावरण उन्हें मोहित करता था। आज भी यहां एक गहरी आध्यात्मिक ऊर्जा को अनुभव किया जा सकता है। आत्मज्ञान को महसूस किया जा सकता है। शायद इसीलिए कि पंचवटी की यह पावन कुटिया प्रभु श्री राम को अयोध्या के राजभवन से भी अति प्रिय थी। अर्थात, यहां उनके प्राण बसते थे। यही कारण था कि माता सीता के साथ प्रभु श्री राम ने इसी कुटिया में लंबी अवधि व्यतीत की। इस पूरी अवधि में भ्राता लक्ष्मण ने प्रभु राम और माता सीता की सेवा एक अनन्य भक्त, एक प्रखर प्रहरी और एक समर्पित सेवक के रूप में की थी। तभी तो सीता-राम के साथ भ्राता लक्ष्मण भी हमेशा, हर जगह स्थान पाते हैं। उन्हें शेषनाग का अवतार माना गया है, जो कभी अपने आराध्य विष्णू का साथ नहीं छोड़ते।
जिस प्रकार शरीर आत्मा के बिना अचेतन है उसी प्रकार राम लक्ष्मण के बिना अधूरे। प्रभु श्री राम के नाम के साथ हमेशा लक्ष्मण का नाम जुड़ता रहा है। उन्हीं लक्ष्मण का, जिन्होंने राम के वनवास को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। राम को तो वनवास दिया गया था। उसका पालन करना उनके लिए पितृ धर्म का पालन था, परंतु भ्राता लक्ष्मण और भार्या सीता ने तो स्वेच्छा से वनवास स्वीकार किया था। वे चाहते तो राजमहल में सुख का जीवन भी व्यतीत कर सकते थे, परंतु उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना। श्री राम के पद चिन्हों पर चलने का मार्ग चुना और उन्होंने न केवल वह मार्ग ही चुना, बल्कि उन्होंने प्रभु राम से अधिक संघर्ष और त्याग भी किया। श्री राम के साथ उनकी भार्या सीता थीं, परंतु लक्ष्मण के हिस्से में १४ वर्षों का कोरा वियोग था। इसी वियोग में लक्ष्मण जी की भार्या उर्मिला सतत निद्रा में रहीं तो वन में लक्ष्मण ने १४ वर्षों तक सतत निद्रा की देवी पर नियंत्रण कर दिन-रात माता सीता और प्रभु श्री राम की रक्षा की। ‘पंचवटी’ महाकाव्य से स्पष्ट भी होता है कि जब पर्ण कुटी में माता सीता और प्रभु राम शयन करते थे या एकांत में होते थे तब लक्ष्मण जी उस कुटी की रात भर सुरक्षा करते थे। वे जानते थे कि जनक नंदिनी सीता, जिन्होंने कभी फूलों की चुभन तक महसूस नहीं की है, उन्हें वन के कीट पतंगों, प्राणियों से हानि हो सकती है, उनकी निद्रा में विघ्न पड़ सकता है, निशाचारों से उन्हें हानि पहुंच सकती है। इसलिए वे सतत जागते रहते थे। नासिक-तपोवन की इस पर्ण कुटी की रक्षा में। शूर्पणखा के नाक-कान काटने, खर और दूषण से लेकर मायावी मारीचि तक का वध करने से लेकर न जाने किन-किन प्रसंगों का पौराणिक इतिहास पंचवटी-तपोवन में समाया हुआ है। कहते हैं इसी दंडकारण्य में श्री राम की भेंट अगस्त्य मुनि से हुई थी, जिन्होंने श्री राम को धनुष, अक्षय तरकश व दिव्यास्त्र दिए थे। उन्हीं दिव्यास्त्रों से श्री राम ने महाबली रावण का वध किया था। इसीलिए यह कहना सार्थक होगा कि प्रभु श्री राम रामायण के नायक हैं तो भ्राता लक्ष्मण प्रति नायक।
श्री राम ने अपने जीवन में मर्यादित आचरण किया। वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहे गए, महाबली हुए, उत्तम राजा, न्याय प्रिय शासक व कुशल प्रशासक कहलाने के साथ-साथ राम राज के संस्थापक भी कहे गए। तो वहीं भ्राता लक्ष्मण भी हर एक कला में निपुण, मल्ल योद्धा व उत्तम धनुर्धारी कहलाए। परंतु इन सबके अलावा उनका जो सबसे महान गुण कहलाया तो उनका आदर्श भ्राता प्रेम। अपने भाई के प्रति असीम समर्पण। यही अटूट समर्पण भ्राता लक्ष्मण को रामायण का प्रति नायक बनाता है। राम और लक्ष्मण के एक होने का सबूत देता है। रामायण में वर्णित है कि जब लक्ष्मण मूर्छित थे और उनके प्राण बचने की संभावना अति क्षीण नजर आ रही थी तब व्याकुल राम अपने प्राण तक त्यागने को आतुर हो चुके थे। जिस राम के लिए हर एक सनातनी अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर हो, उस राम के प्राण लक्ष्मण में बसते थे। लक्ष्मण भ्राता धर्म का पर्याय हैं। श्री राम ज्ञान है तो लक्ष्मण वैराग्य। लक्ष्मण के वैराग्य के बिना रामायण की सीख अधूरी है। श्री राम को हर कठिन अवसर पर लक्ष्मण जी का साथ मिला। फिर चाहे वह १४ वर्षों का वन गमन हो, अरण्यवास के असहनीय कष्ट हों, सीता वियोग के पल हों या फिर दुष्ट रावण और उसकी सेना का संहार हो, यदि इन सभी विपरित परिस्थितियों में प्रभु राम को लक्ष्मण जी का साथ न मिला होता तो शायद श्री राम को अपेक्षित यश पाने के लिए और भी कड़ा संघर्ष करना पड़ता। उस लक्ष्मण के कर्म क्षेत्र, उस प्रति नायक के लीला स्थल को महाराष्ट्र की सरकार उपेक्षित रखती है, तो यह सनातन सभ्यता का अपमान है।
महाराष्ट्र की सरकार उस धार्मिक ऐतिहासिक महत्व की स्थल को बिसार चुकी है। उस स्थल को भूल चुकी है, जहां के कण-कण में लक्ष्मण के प्रेम और पराक्रम की गाथा छिपी हुई है। ऐसे समय में जब पूरे देश में ‘राम वन गमन पथ’ का विकास हो रहा है तो नासिक-तपोवन तो उनकी निशानियों से भरा-पूरा पड़ा है। यहां पंचवटी, राम-लक्ष्मण जी के मंदिर, ब्रह्म तीर्थ, शिवतीर्थ, विष्णु तीर्थ, कपिला तीर्थ, लक्ष्मी नारायण मंदिर, ऋषि-मुनियों के स्थल इत्यादि का समुचित विकास क्यों नहीं हो सकता? इस देश में प्राचीन मंदिरों के कॉरिडोर बन रहे हैं तो फिर पौराणिक मान्यता के स्थलों का पुनरुद्धार क्यों नहीं हो सकता? उस पंचवटी-तपोवन को वैश्विक पटल पर क्यों नहीं लाया जा सकता, जिसका महत्व किसी भी दृष्टिकोण से अयोध्या से कम नहीं है। इस महत्व को पहचानने की जरूरत है। जरूरत है अयोध्या और नासिक के महत्व को समझने की और यह समझने की कि यह धारा भ्राता लक्ष्मण की पराक्रम स्थली है। उनके भ्राता प्रेम की साक्षी है।
जारी
महाराष्ट्र की सरकार उस धार्मिक ऐतिहासिक महत्व की स्थल को बिसार चुकी है। उस स्थल को भूल चुकी है, जहां के कण-कण में लक्ष्मण के प्रेम और पराक्रम की गाथा छिपी हुई है। ऐसे समय में जब पूरे देश में ‘राम वन गमन पथ’ का विकास हो रहा है तो नासिक-तपोवन तो उनकी निशानियों से भरा-पूरा पड़ा है। यहां पंचवटी, राम-लक्ष्मण जी के मंदिर, ब्रह्म तीर्थ, शिवतीर्थ, विष्णु तीर्थ, कपिला तीर्थ, लक्ष्मी नारायण मंदिर, ऋषि-मुनियों के स्थल इत्यादि का समुचित विकास क्यों नहीं हो सकता? इस देश में प्राचीन मंदिरों के कॉरिडोर बन रहे हैं तो फिर पौराणिक मान्यता के स्थलों का पुनरुद्धार क्यों नहीं हो सकता?

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