मुख्यपृष्ठस्तंभबेबाकबेबाक : 'राम नाम' साधन नहीं, साधना है!

बेबाक : ‘राम नाम’ साधन नहीं, साधना है!

अनिल तिवारी
मुंबई

सनातन भूमि पर प्रभु श्री राम का दिव्य-भव्य मंदिर बने और उनकी नीतिसंगत व धर्म सम्मत प्राण प्रतिष्ठा हो, यह कौन नहीं चाहेगा। फिर भी यदि सनातन धर्म के पुरोधाओं का, शंकराचार्यों का, नीति धर्म विशेषज्ञों का, सनातनी बुद्धिजीवियों का इस पर आक्षेप है, इसे अनुचित दिशा में ले जाने वाला बताया जा रहा है तो इस पर विमर्श होना ही चाहिए। धर्म शास्त्रों के मार्गदर्शक तत्वों व शास्त्रीय विधि-विधान में यदि अधूरे मंदिर में, शिखर कलश के आभाव में, पौष माह में, अयोग्य मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठा वर्जित मानी गई है तो उस पर गौर करने में क्या आपत्ति है? ऐसे समय जब साधारण गृह प्रवेश तक का मुहूर्त नहीं, तब साक्षात श्री राम के गृह प्रवेश की क्या मजबूरी है? किसी पीठाधीश्वर के हाथों, किसी शंकराचार्य के द्वारा प्राण प्रतिष्ठा में क्या दोष है? प्रभु राम के जन्म दिवस, अर्थात राम नवमी पर जन्मभूमि मंदिर में उनके विग्रह की स्थापना में क्या अड़चन है? जाने-अनजाने निर्मित हो रहीं इन विषम परिस्थितियों पर विचार क्यों नहीं होना चाहिए? केवल राजनीतिक लाभ के लिए असमय की आतुरता उचित नहीं। यह मान्य कर लेना चाहिए। सत्ता का बड़प्पन इसी में है।
मुद्दा केवल आज का नहीं है, बल्कि दशकों का है। भारतीय जनता पार्टी ने हर युग में, हर दौर में राम मंदिर आंदोलन का चुनावी दोहन ही किया है। मौजूदा हालात भी उससे भिन्न नहीं है। इन हालातों को देखकर हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की सीख व सबक याद आ जाते हैं। जिन्होंने न केवल राम मंदिर के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई थी, बल्कि समय-समय पर इस मुद्दे के अनुचित राजनीतिक लाभ से भी देश को चेताया था। शिवसेनाप्रमुख ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘चुनाव आयोग का नियम है की जाति-धर्म का प्रचार जो करेगा, वह उम्मीदवार अयोग्य घोषित होगा। हमारे तीन विधायक इस आधार पर अयोग्य हुए। मनोहर जोशी बाल-बाल बच गए…।’ हिंदुत्व के नाम पर शिवसेनाप्रमुख का मताधिकार तक छिन गया। बाबरी ढांचा गिरने के बाद सीबीआई की एफआईआर में पहला नाम भी उन्हीं का दर्ज हुआ। लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और अन्य सभी के ऊपर। क्यों? क्योंकि उन्होंने न तो कभी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाया, न ही उससे कभी मुंह ही मोड़ा। शिवसेनाप्रमुख ने कभी चुनावी सहूलियत के लिए सियासत नहीं की। ९३ के दंगों में भी उन्होंने हिंदुओं की रक्षा की, पर मुद्दे पर राजनीति नहीं की। जो हिंदुत्व के लिए सर्वोपरि था, उन्होंने हमेशा वही किया। वे कहते थे, ‘मैं किसी पार्टी को नहीं जानता। मैं सिर्फ हिंदुत्व को जानता हूं।’ परंतु हिंदुत्व की भूमिका और विचार को राजनीतिक सुविधा के लिए शिवसेनाप्रमुख ने कभी भी इस्तेमाल नहीं होने दिया। धर्म की बेजा जिद से राष्ट्र की जड़ों को नुकसान न पहुंचे। ऐसा उन्होंने हमेशा स्पष्ट तौर पर कहा और किया भी। १९९८ की चुनावी सरगर्मियों के दौरान उन्होंने मुसलमानों को चेताते हुए भी कहा था ‘उन्हें बाबरी की जिद छोड़नी चाहिए। उन्हें बाबरी वहीं बनाएंगे का नारा देने नहीं दिया जाएगा।’ तब उन्होंने जोर देकर कहा था कि मैं आज भी कट्टर हिंदू हूं। हिंदुत्व छोड़ा नहीं है। सिर्फ देश विषम परिस्थितियों में है। इसका विचार है। शिवसेनाप्रमुख ने राम कर्म की साधना से कभी मुंह नहीं मोड़ा, पर जब विषय का अत्यधिक राजनीतिक दोहन शुरू हो गया तो उन्होंने मुद्दे को समाप्त करने का भी विचार दिया। राम मंदिर उनके लिए सच्ची साधना थी, चुनावी साधन नहीं। आज यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए कहीं देश में फिर से विषम परिस्थितियां तो पैदा नहीं हो रहीं? समता और सौहार्द के प्रतीक प्रभु श्री राम को आक्रामक चुनावी प्रचार का हिस्सा तो नहीं बनाया जा रहा? सौम्यता और शालीनता के अभिवादन ‘जय श्री राम’ को कठोर संज्ञा के रूप में प्रस्थापित तो नहीं किया जा रहा? यदि ऐसा हो रहा है तो सत्ता को चेत जाना चाहिए। हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखना, हर किसी को दरकिनार करना राष्ट्र और राजनीति के लिए कभी-कभी अहितकारी भी हो सकता है। क्योंकि राजनीति के लिए राम नाम को जिन्होंने केवल लाभ का साधन बनाया, वे कालांतर में किनारे कर दिए गए और आज भी जो इसे साधन बना रहे हैं कल को वे भी किनारे कर दिए जाएंगे। राम साधन बनाने से नहीं, साधना से ही सधते हैं।
आज पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को दरकिनार किया जा चुका है। उन सभी नामों को गुमनाम करने का प्रयत्न हो रहा है जो आंदोलन में शामिल थे और उनका उद्घोष, जो न तो चार्जशीट में थे, न ही आंदोलन में। जिनकी राजनीतिक कूटनीति से २ सांसदों वाली पार्टी राम मंदिर की नैया पर सवार होकर सत्ता तक पहुंची और देश की राष्ट्रीय पार्टी के रूप में प्रतिष्ठित हुई, उन्हें बिसारा जा चुका है। यह राम के संस्कार नहीं। जहां बुजुर्गों को नजरअंदाज किया जाए। राम ने तो अपने बूढ़े पिता के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया था। खैर…,
शिवसेनाप्रमुख ९० के दशक के आखिर तक मंदिर संघर्ष में प्रभावी तौर पर उतर चुके थे और जनभावना के मद्देनजर वे इस मुद्दे को न्यायालय के दायरे से बाहर का विषय मानते थे। वे चाहते थे और इस संदर्भ में उन्होंने जोर देकर भी कहा था कि राम मंदिर वहीं बनेगा। दूसरी ओर भाजपा को राम मंदिर आंदोलन का संपूर्ण राजनैतिक लाभ ले रही थी। भाजपा को उसी दौर में मुद्दे का महत्व समझ आ चुका था। सो, उसने ९० के दशक की शुरुआत में कारसेवा का आह्वान कर दिया। देशभर से कारसेवक अयोध्या पहुंचने लगे। मंदिर निर्माण के लिए र्इंटें आने लगीं। चंदा भी पहुंचा। परंतु नतीजा शून्य ही रहा, क्योंकि मामला अदालत में लंबित था। लालकृष्ण आडवाणी भी कह रहे थे कि क्या यह अदालत तय करेगी कि राम का जन्म कहां हुआ? पर उनकी वाणी में वो जोश नहीं बचा था। उनकी लड़ाई मंद पड़ने लगी थी। अशोक सिंघल और आडवाणी के प्रयास अपर्याप्त से नजर आने लगे थे। तब उन्हें नैतिक और राजनैतिक बल मिला तो शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के कड़े रुख से। जिन्होंने न केवल केंद्र की सत्ता को, बल्कि कानूनी पेचीदगियों पर भी खुलकर प्रहार किया। उन्होंने राम मंदिर के पक्ष में दृढ़ता से बोला और ईमानदारी से लिखा भी।
बाबरी विध्वंस के ५ साल बाद मार्च १९९८ में जब लोकसभा के परिणाम अनपेक्षित रहे तब शिवसेनाप्रमुख ने स्पष्ट कहा था ‘मैं अपने विचारों से ईमानदार रहा हूं। मुझे इसी का भारी संतोष है। दूसरों को भी ईमानदार रहना चाहिए, ऐसी कोई शर्त रखने की मेरी कोई मंशा नहीं है। मुझ से यह नहीं होगा और मुझे इसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है। मैं स्वयं निष्ठावान हूं इसलिए जनता भी मुझसे प्रेम करती है।’ विचारों के प्रति निष्ठावंत रहकर भी सत्ता का नेतृत्व किया जा सकता है। परंतु आज चित्र एकदम भिन्न नजर आता है। आज सत्ता केवल प्रतिष्ठा की राजनीति तक सीमित हो गई है। निष्ठा के मायने बदल गए हैं और जन कल्याण पर प्रचार हावी हो गया है। अब सभी कुछ राजनीति के नफे नुकसान के तौर पर आंका जाने लगा है। राजनीति का यह नुख्सा दशकों पुराना है पर वर्तमान में इसकी पराकाष्ठा जारी है। भाजपा इस बार फिर राम मंदिर का अधिकाधिक राजनैतिक लाभ उठा लेना चाहती है। इसे एक मेगा इवेंट बनाना चाहती है। इस आंदोलन में अपना सर्वस्व झोंक देने वालों को, शहीद हुए कारसेवकों को भुला देना चाहती है। यह वही भाजपा है, जो बाबरी धराशायी होने के बाद जिम्मेदारी झटकने में सबसे आगे थी। तब भाजपा और उसकी अन्य सभी ईकाइओं ने विध्वंस की जिम्मेदारी कारसेवकों और उनकी भावनाओं पर थोप दी थी। वही कारसेवक जिन्हें बुलाया गया था और वही भावना जिसे भड़काया गया था। उस वक्त के साधु-संतों के बयान और अखबारों की कतरनें साफ-साफ पुष्टि करती हैं कि जब सभी जिम्मेदारी से भाग रहे थे, तब भी शिवसैनिक सीना तानकर खड़े थे।

शिवसेनाप्रमुख पहले ही कह चुके थे कि ‘यदि यह ढांचा शिवसैनिकों ने तोड़ा है तो मुझे उन पर गर्व है।’ और यह यह अटल सत्य भी है कि राम मंदिर आंदोलन का संघर्ष शिवसेनाप्रमुख के बिना संभव नहीं था और शिवसैनिकों के अभाव में उसकी सफलता। पहले संतों ने लड़ाई लड़ी, फिर शिवसैनिकों और कारसेवकों ने उसे बल दिया। इस बीच हिंदू पक्षकारों ने उसे कानूनी तौर पर अंजाम तक पहुंचाया, जिसकी सुखद परिणति का आज राजनैतिक रूपांतर जारी है।
बाबरी विध्वंस के बाद भाजपा बैकफुट पर थी। अटल बिहारी वाजपेई जी के नेतृत्व में पार्टी ने राम मंदिर के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया था और अगले डेढ दशक के राजनीतिक सफर में भाजपा ने कभी इस मुद्दे पर प्रखरता नहीं दिखाई। २००४ के आम चुनावों में पार्टी ने ‘शाइनिंग इंडिया’ और ‘डेवलपमेंट’ का मुद्दा आगे बढ़ाया तो २००९ में आधे-अधूरे मन से राम मंदिर की बात कही। २०१४ में भी भाजपा ने विकास की ही बात कही। इस दौरान भाजपा के घोषणा पत्रों में राम मंदिर निर्माण को कभी दो पंक्तियों से अधिक स्थान नहीं मिल सका। भाजपा इस मुद्दे का जितना राजनीतिक लाभ उठाना चाहती थी, उसके नजरिया में वह उठा चुकी थी। २०१८ में यदि शिवसेना राम मंदिर के मुद्दे पर आक्रामक नहीं होती तो शायद भाजपा के लिए यह मुद्दा तब भी प्राथमिकताओं में शुमार नहीं होता। शिवसेना के लगातार दबाव का यह असर हुआ कि भाजपा सरकार को जन आलोचनाओं से बचने के लिए इस ओर कदम बढ़ाने पड़े। इसलिए जन्मभूमि मंदिर का राजनीतिक धरातल पर श्रेय कोई भी लूटे परंतु राम भक्तों के मनो-मस्तिष्क में इस सपने को साकार करने वाले के रूप में सिर्फ एक ही नाम है शिवसेनाप्रमुख और उनकी शिवसेना का। इसका अनुभव देश को १९९२ में भी हुआ था और उसके बाद २०१८ में भी। राम मंदिर आंदोलन को जब-जब जरूरत पड़ी या इसमें शिथिलता आई, तब-तब शिवसेना ने उसमें नई जान फूंकी। १९९२ में शिवसेना के आंदोलन से इसे गति मिली तो २०१८-१९ में अल्टीमेटम से गंतव्य। अन्यथा बहुत संभव है कि राम मंदिर के नाम पर दो-तीन चुनाव और निपटा दिए जाते।
खैर, अंत भला तो सब भला। अदालत के माध्यम से ही सही में राम मंदिर के धर्म संकल्प की पूर्ति १३४ वर्षों बाद हो ही गई और जनता के समक्ष यक्ष प्रश्न भी विचार करने को छोड़ गई कि क्या कलियुग में स्वार्थ से परे रहकर भगवान श्री राम के मंदिर का निर्माण नहीं किया जा सकता था? ऐसा अतीत में संभव न भी हो पर वर्तमान में तो यह हो ही सकता था। क्यों इस युग में भी अधिकाधिक राजनैतिक लाभ के लिए श्री राम का सहारा लिया गया? राजनीतिक लाभ के लिए ‘अयोध्या कांड’ की शृंखला चलती रही। भविष्य में भी भावनाओं का यह सौदा इसी तरह अमर्यादित रहा तो निश्चित ही मर्यादा पुरुषोत्तम के जन्मस्थान की विजय धूमिल हो जाएगी।

अन्य समाचार