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पंचनामा : किराए का ‘कातिल’ कारोबार …कहीं आप की दवाएं घातक तो नहीं?

बिना फार्मासिस्ट और रिकॉर्ड के बिक रहीं दवाएं
ड्रग विभाग की सांठ-गांठ से नहीं किया जा सकता इनकार

धीरेंद्र उपाध्याय

अभी हाल ही में यूपी के कई मेडिकल स्टोर्स में छापा मारा गया, वहां से बड़ी मात्रा में एक्सपायरी दवाओं का जखीरा बरामद किया गया। साथ ही जांच में पाया गया कि कई मेडिकल स्टोर्स बिना लाइसेंस के चल रहे थे। यही नहीं हिंदुस्थान में ऐसे कई मेडिकल स्टोर्स हैं, जो किराए की डिग्री से चल रहे हैं। यह मेडिकल इंडस्ट्री में आम बात है। यहां मेडिकल स्टोर्स खोल कर फार्मासिस्ट को नौकरी पर रख लिया जाता है। चूंकि एक फार्मासिस्ट दिनभर दुकानों पर नहीं रह सकता है, इसलिए दवा को बेचने का काम नौसिखिए करते हैं। इतना ही नहीं, कई मेडिकल स्टोर्स में तो बिकनेवाली दवाओं का कोई रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता है। अब सवाल उठता है कि ऐसे में ड्रग विभाग क्या करता है? क्या उसका भी इन मेडिकल स्टोर वालों के साथ सांठ-गांठ रहता है।
दरअसल, डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाओं को मेडिकल स्टोर्स पर फार्मासिस्टों द्वारा दिया जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि लोग डॉक्टरों के पास न जाकर सीधे मेडिकल स्टोर्स चले जाते हैं और वहां से दवाई खरीद लेते हैं। दवाई कब और वैâसे लेनी है? दवा उचित समय पर नहीं लिया तो कौन सा दुष्प्रभाव हो सकता है? आदि की जानकारी फार्मासिस्ट द्वारा दी जाती है। हालांकि, इन सभी पहलुओं के बावजूद मुंबई और ठाणे जैसे शहरों में सैकड़ों दवाओं की दुकानों में फार्मासिस्ट ही नहीं हैंै, इसके बावजूद धड़ल्ले से दवाइयां बेची जा रही हैं। इस तरह का चौंकानेवाला तथ्य सामने आया। इसके बाद सवाल उठने लगा है कि बिना फार्मासिस्ट के किसकी निगरानी और जिम्मेदारी में ये दवाइयां बेची जा रही हैं। ऐसे में एफडीए इस तरह के मेडिकल की दुकानों के खिलाफ क्या कार्रवाई करेगा?

नकली दवाइयां जब्त
एफडीए ने अप्रैल से अक्टूबर के बीच २.८५ करोड़ रुपए की नकली दवाएं जब्त कीं। इस सिलसिले में विभिन्न मामलों में तीस लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसलिए नियमों का उल्लंघन करनेवाले २८ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और १,९०० से अधिक लाइसेंस निलंबित कर दिए गए। विभिन्न स्थानों पर मारे गए ५३ छापों में दवाओं के अवैध भंडारण, गलत तरीके से खरीद और बिक्री रिकॉर्ड रखने के आरोप में ६,७७९ दुकानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। कानून का उल्लंघन करने पर ८९२ खुदरा दुकानों और १,०२२ दवा दुकानों के लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं।

मुंबई, ठाणे की हालत दयनीय 
प्रिस्क्रिप्शन में लिखी दवा मरीज को मिले यह सुनिश्चित करने के लिए दवा बेचने वाली दुकानों पर फार्मासिस्ट का होना अनिवार्य है। यदि दुकान में कोई फार्मासिस्ट नहीं है तो एफडीए से दुकान मालिक का लाइसेंस रद्द करने की अपेक्षा की जाती है। हालांकि, मुंबई और ठाणे में २०० से ज्यादा दुकानों पर कोई फार्मासिस्ट नहीं हैंै। औषधि प्रशासन की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, मुंबई के ७ वॉर्डों की १६५ दवा दुकानों में कोई फार्मासिस्ट नहीं हैं। इसमें पश्चिमी उपनगरों की अधिकांश दवा दुकानें शामिल हैं। इसी तरह ठाणे जिले के परिमंडल एक में आनेवाले दीघा क्षेत्र में १८, परिमंडल दो यानी मीरा-भायंदर क्षेत्र की ६५ दुकानों में कोई फार्मासिस्ट नहीं हैंै।

आज यह है स्थिति
अस्पतालों की तरह दवाओं की उपलब्धता भी चौबीसों घंटे रहती है, लेकिन दुकानों में फार्मासिस्टों की चौबीस घंटे उपलब्धता नहीं होती है। मेडिकल चालकों का कहना है कि छोटी दवा की दुकानों का कारोबार बड़ी शृंखला वाली दुकानों की तुलना में कम होता है, इसलिए दो से तीन फार्मासिस्टों को नहीं रखा जा सकता है। आज राज्य में करीब हजारों की संख्या में दवाओं की की दुकानें हैं। उनमें से आधे से अधिक दुकानों पर रात के समय फार्मासिस्ट की ड्यूटी नहीं होती है। फार्मासिस्टों से अपेक्षा की जाती है कि यदि वे नौकरी छोड़ते हैं, तो वे एफडीए को रिपोर्ट करेंगे। लेकिन इस नियम का पालन नहीं किया जाता है। कई मेडिकल स्टोर्स बिना फार्मासिस्ट के ही चल रहे हैं, ऐसे में उनके द्वारा उपलब्ध कराई जानेवाली दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठना लाजिमी है।

काम ज्यादा, सेवा कम
कई छात्र फार्माकोलॉजी में डिग्री के साथ स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद नौकरी मिलने तक मेडिकल स्टोर्स में फार्मासिस्ट का काम करना पसंद करते हैं। फार्मासिस्ट का वेतन काफी कम होता है। इसके बावजूद छुट्टियों की कमी, काम के लंबे घंटे, नौकरी का निश्चित न होना, युवा इस क्षेत्र में पूर्णकालिक करियर बनाने के लिए उत्सुक रहते हैं, क्योंकि उनका यही उद्देश्य होता है कि वे फार्मासिस्ट का काम सीख कर खुद का मेडिकल स्टोर खोल सकें और अच्छी कमाई कर सकें।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ गंभीर है यह मामला
मुंबई और ठाणे क्षेत्र में लगभग २०० से अधिक दवा दुकानों में दवा विक्रेता नहीं हैं। यह मामला गंभीर है, ऐसे दुकान मालिकों की जांच होनी चाहिए। उनके खिलाफ भी मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
अभय पांडे, अध्यक्ष, ऑल फूड एंड ड्रग लाइसेंस होल्डर्स फाउंडेशन

दवा दुकानों का करते हैं निरीक्षण
कुछ लोग व्यवसाय बंद कर देते हैं और इसे ऑनलाइन पंजीकृत भी नहीं कराते हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि कुछ दुकानों में दवा विक्रेता ही नहीं हैं। हमारे औषधि निरीक्षक नियमित रूप से सभी दवा दुकानों का निरीक्षण करते हैं। इसलिए ऐसी कोई संभावना नहीं है कि ऐसा कुछ हुआ हो।
– भूषण पाटील, संयुक्त आयुक्त (औषधि), खाद्य एवं औषधि प्रशासन

एफडीए को निभानी चाहिए यह भूमिका
राज्य में हजारों की संख्या में मेडिकल स्टोर्स हैं, जबकि फार्मासिस्टों की संख्या डेढ़ लाख है। भले ही मानवबल की कोई कमी न हो, फिर भी विभिन्न पालियों में काम करने के लिए मानव बल की अपर्याप्त उपलब्धता है। इसलिए छोटी और बड़ी दोनों दवा की दुकानों में एक ही फार्मासिस्ट को नियुक्त किया जाता है। औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम १९४० व नियम १९४५ के तहत फार्मासिस्ट की उपस्थिति के बिना दवा बेचना अपराध है। इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई किए जाने का प्रावधान है, लेकिन इस नियम का सरेआम उल्लंघन हो रहा है। फार्मासिस्टों की भर्ती नहीं की जाती है, क्योंकि दवाओं की जानकारी है, ऐसा कारण बताकर न सिर्फ बेचा जा रहा है बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी किया जा रहा है। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट कानून से निश्चित रूप से मरीजों को राहत मिलेगी।

चपेट में ले रहा ऑनलाइन प्रतिस्पर्धा
पिछले कुछ वर्षों में दवा की दुकानों का स्वरूप बदल गया है। छोटे मेडिकल स्टोर्स की संख्या घटी है। एक ही व्यापारी दो से तीन दुकानें खोल देता है। इस चेन स्टोर्स ने जहां छोटी दुकानों की कमर तोड़ दी है, वहीं ऑनलाइन व्यवसाय भी अब चेन स्टोर्स को सुरसा की भांति लील रहा है। ऑनलाइन दवाओं की बिक्री में मिलनेवाली भारी छूट, होम डिलिवरी की सुविधा होने से इनकी लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन इन ऑनलाइन पोर्टलों पर भी कई बार सवाल उठते रहे हैं। जैसे कई बार प्रतिबंधित दवाएं या बिना डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन के भी दवाएं ऑनलाइन मिल जाती हैं? साथ ही इन दवाओं के निरीक्षण के लिए संबंधित फार्मासिस्ट नियुक्त किया गया है या नहीं, इसका भी सख्ती से पालन नहीं किया जाता है।

परिमंडल स्तर पर आंकड़े
मुंबई परिमंडल
डोंगरा -१
वरली-एंटाप हिल -१३
चेंबूर–विद्याविहार -२७
कुर्ला–मुलुंड -२९
विलेपार्ले–अंधेरी -३०
जोगेश्वरी–गोरेगांव -२९
कांदिवली–दहिसर –३६
ठाणे परिमंडल
दिघा  -१८
भायंदर -६५

इस मुद्दे पर क्या है लोगोें की प्रतिक्रिया
नियमों को ताक पर रखकर चल रहे हैं मेडिकल स्टोर्स
मेडिकल व्यवसायी नियमों को ताक पर रखते हुए मेडिकल स्टोर्स का संचालन कर रहे हैं। बिना फार्मासिस्ट के मेडिकल दुकान का व्यवसाय किया जा रहा है। कई मेडिकल स्टोर्स में अपात्र व्यक्तियों को जिम्मेदारी दे दी गई है, जिनको दवाइयों की जानकारी तक नहीं है। इन मेडिकल स्टोर्स के खिलाफ न तो ड्रग इंस्पेक्टर और न ही स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कोई कार्रवाई करते हैं। गैर डिप्लोमा व डिग्रीधारी द्वारा मेडिकलों का संचालन करने से मरीजों की जान को खतरा रहता है।
डॉ. पंकज कुमार यादव, डेंटिस्ट

अपनाया जा रहा है उदासीन रवैया
बिना फार्मासिस्ट के ही मेडिकल स्टोर संचालन की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को लंबे समय से है, फिर भी सब कुछ जानते हुए उदासीन रवैया अपनाया जा रहा है। कहने को तो मेडिकल स्टोर्स के संचालन के लिए डिग्री, डिप्लोमा, सर्टिफिकेट के आधार पर लाइसेंस जारी किए जाते हैं, लेकिन हकीकत इससे परे है।
– दीपक तावड़े, मुंबई

निरस्त कर देना चाहिए लाइसेंस
बिना फार्मासिस्ट के मेडिकल दुकान संचालित नहीं होना चाहिए। मेडिकल संचालकों को दवाइयों का संधारण व क्रय-विक्रय के लिए लाइसेंस दिया गया है। ऐसे में जिस मेडिकल दुकानों पर फार्मासिस्ट नहीं हों, तो उनकी जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही संबंधित मेडिकल स्टोर का लाइसेंस निरस्त कर देना चाहिए।
– तपस्या कश्यप, अध्यापिका, ठाणे

दूसरे के नाम के सर्टिफिकेट का उपयोग
कुछ मेडिकल स्टोर दूसरे के नाम के सर्टिफिकेट द्वारा जारी लाइसेंस से संचालित हो रहे हैं। मासिक या सालाना के आधार पर लाइसेंस के लिए लेन-देन होता है। इसके लिए हजारों रुपए महीने का देने पर लाइसेंस उपलब्ध हो जाता है। कुल मिलाकर नियमों की यहां धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
– रितेश शिंदे, ठाणे

मेडिकल इंडस्ट्री में होता है झोल
हिंदुस्थान में मेडिकल उद्योग सबसे बड़े उद्योगों में से एक है। यह इतना बड़ा है कि हम सोच भी नहीं सकते हैं। कोरोना काल में डोलो-६५० एमजी वाला मैटर कोई भूला नहीं है। इतनी बड़ी इंडस्ट्री में काफी झोल भी होता है। आम लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं होती और वे जागरूक भी नहीं होते हैं, इसलिए इस तरफ कम ही ध्यान जाता है, और उसी की आड़ में बड़े-बड़े लोग अपना गोरखधंदा चलाते हैं। इसमें राजनेताओं का भी हाथ होता है?
जेठानंद साजनानी, उल्हासनगर

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