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पंचनामा : बिलकिस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ‘सटीक’! …कोर्ट ने गुजरात सरकार को लगाई लताड़ …कहा- पावर का गलत इस्तेमाल किया गया

११ दोषियों की सजा माफी हुई रद्द 
दो हफ्ते के अंदर करना होगा सरेंडर

संतोष तिवारी
सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय से एक बार फिर बिलकिस बानो मामला सुर्खियों में आ गया है। सोमवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने ‘सटीक’ टिप्पणी की और ११ दोषियों की सजा माफी रद्द कर दी, साथ ही उन्हें दो हफ्ते के अंदर सरेंडर करने का आदेश दिया। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा कि सरकार की तरफ से धोखाधड़ी और पावर का गलत इस्तेमाल किया गया। कोर्ट ने कहा कि सजा माफी का यह पैâसला गुजरात सरकार ने दिया था, जो उसके अधिकार क्षेत्र में ही नहीं था। इस तरह हम उस गलत पैâसले को खारिज करते हैं। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब सभी ११ दोषियों को फिर से जेल जाना होगा।
बिलकिस बानो केस की पूरी टाइमलाइन 
गुजरात में साल २००२ में हुए गोधरा कांड के बाद दंगा भड़क गया। इस दंगे के दौरान ही बिलकिस बानो के साथ अत्याचार किया गया, जिसके बाद आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कराया गया।
इस केस में साल २००४ में कुल ११ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था, जिसका ट्रायल अमदाबाद कोर्ट में शुरू हुआ। सुनवाई के दौरान बिलकिस ने चिंता जताई कि यहां गवाहों को डराया-धमकाया जा सकता है और सबूतों से छेड़छाड़ की जा सकती है, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मुंबई ट्रांसफर कर दिया।
जनवरी २००८ को स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने सभी ११ दोषियों को उमवैâद की सजा सुनाई और ७ दोषियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया, जबकि एक दोषी की ट्रायल के दौरान मौत हो गई थी। बाद में मुंबई हाई कोर्ट ने भी दोषियों की सजा को बरकरार रखा।
साल २०१९ में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकिस बानो को ५० लाख रुपए मुआवजा, नौकरी और घर देने का आदेश दिया।
सजा काट रहे दोषियों में से एक राधेश्याम शाही ने धारा ४३२ और ४३३ के तहत सजा को माफ करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि माफी का पैâसला करने वाली ‘उपयुक्त सरकार’ महाराष्ट्र है, न कि गुजरात।
राधेश्याम शाही ने सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की और बताया कि वो बिना किसी छूट के १५ साल से अधिक समय तक जेल में रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने मई २०२२ में गुजरात सरकार को ९ जुलाई १९९२ की माफी नीति के अनुसार, समय से पहले रिहाई के आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया और कहा कि दो महीने के भीतर पैâसला किया जा सकता है।
गुजरात सरकार ने माफी नीति के तहत सभी ११ दोषियों को १५ अगस्त २०२२ को गोधरा की उप-जेल से रिहा कर दिया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं।
रिहाई के तीन महीने से ज्यादा समय बाद बिलकिस बानो ने सुप्रीम कोर्ट में मई २०२२ के आदेश को चुनौती दी।
दिसंबर २०२२ में बिलकिस बानो की याचिका पहली बार सूचीबद्ध हुई। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेला त्रिवेदी ने मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।
मार्च २०२३ में मामला जस्टिस केएम जोसेफ और बीवी नागरत्ना की बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया गया। बिलकिस बानो की याचिका पर केंद्र, गुजरात सरकार और ११ दोषियों को नोटिस जारी किया गया।

क्या है बिलकिस बानो केस?
बता दें कि साल २००२ में गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए दंगे भड़क गए थे। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। दंगे के दौरान बिलकिस बानो के साथ आरोपियों ने गैंगरेप किया था। उस दौरान बिलकिस ५ महीने की प्रेगनेंट थीं। इस घटना में बिलकिस बानो की ३ साल की बेटी समेत परिवार के ७ लोगों की हत्या बड़ी ही निर्ममता के साथ कर दी गई थी। बिलकिस बानो को गुजरात दंगोें का चेहरा बनाकर भी पेश किया जाता रहा है। यही वजह थी कि जब उनके पीड़ितों की रिहाई हुई तो काफी बवाल हुआ।

११ आरोपी हुए थे आजाद
बता दें कि गुजरात सरकार की १९९२ की माफी नीति के तहत बाकाभाई वोहानिया, जसवंत नाई, गोविंद नाई, शैलेश भट्ट, राधेश्याम शाह, विपिन चंद्र जोशी, केशरभाई वोहानिया, प्रदीप मोढ़वाडिया, राजूभाई सोनी, मितेश भट्ट और रमेश चांदना को १५ अगस्त २०२२ को गोधरा उप कारागार से रिहा कर दिया गया था। रिहा करने के पैâसले को अदालत में चुनौती दी गई थी। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने रिहाई को खत्म करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने गुजरात सरकार के पैâसले को ही गलत करार दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने की तीखी टिप्पणी
१. गुजरात सरकार ने जिस तरह से रिहाई का आदेश दिया है, वह दूसरों के अधिकार को हड़पने जैसा है।
२. कोर्ट ने कहा कि अधिकार को हड़पने का मामला तब बनता है, जब किसी का पावर कोई और यूज करता है। गुजरात सरकार का पैâसला ऐसा ही एक उदाहरण है। इस मामले में सजा माफी का अधिकार महाराष्ट्र सरकार के पास था, लेकिन रिहाई का आदेश गुजरात सरकार ने दे दिया।
३. गलत तथ्यों को पेश करके एक दोषी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी थी। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को सजा माफी पर विचार करने को कहा था। वह एक तरह का प्रâॉड था, जो दोषी ने अदालत के साथ किया।
४. यह एक क्लासिक उदाहरण है कि वैâसे इस अदालत के आदेश को नियमों का उल्लंघन करने के लिए इस्तेमाल किया गया। फिर दोषियों को उस सरकार ने रिहा कर दिया, जिसके पास यह अधिकार था ही नहीं।
५. गुजरात सरकार का दोषियों को लेकर रवैया विवादित था। यही कारण था कि इस केस के ट्रायल को ही राज्य से बाहर ट्रांसफर करना पड़ा था।
६. हम यह मानते हैं कि गुजरात सरकार के पास दोषियों को रिहा करने का कोई अधिकार नहीं था। अब इन लोगों को दो सप्ताह के अंदर सरेंडर करना होगा यानी वापस जेल जाना होगा।
७. मई २०२२ में अदालत से गलत ढंग से पैâसला लिया गया। हम उस आदेश को खारिज करते हैं।

इस बारे में क्या है लोगों की प्रतिक्रिया, आइए जानें
सुप्रीम कोर्ट को साधुवाद
माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सराहनीय है। कोर्ट के इस पैâसले से एक बार फिर यह साबित हो गया कि हिंदुस्थान में अभी भी लोकतंत्र बरकरार है। गुजरात दंगे के आरोपियों को जिस तरह से छोड़ा गया और जिस तरह से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक को गुमराह किया गया, न केवल निंदनीय है, बल्कि यह सत्ता के दुरुपयोग का खुला प्रदर्शन भी है। माननीय सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए। इस मामले में गुजरात सरकार भी कठघरे में आ गई है। माननीय सुप्रीम कोर्ट को एक बार फिर से साधुवाद।
एडवोकेट विकास पांडेय, मुंबई
सुप्रीम कोर्ट की सिद्ध हुई उपयोगिता
एक महिला वकील होने के नाते मैं नारी सशक्तिकरण और न्याय की सख्त हिमायती हूं। बिलकिस बानो के साथ जो कुछ भी हुआ, उसे सोचकर भी मेरी आत्मा कांप जाती है। उन्होंने जिस तरह से संघर्ष किया और आरोपियों को सजा दिलाई, उसके लिए वे बधाई की पात्र हैं। लेकिन जिस तरह से एक पूरी मशीनरी दोषियों को छुड़ाने में लगी रही और माननीय सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करके दोषियों की सजा माफ कर दी गई, वह न्याय व्यवस्था पर करारा तमाचा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से अपनी उपयोगिता सिद्ध की और दोषियों को कठघरे के पीछे भेजने का काम किया।
एडवोकेट प्रिया पांडेय, मुंबई
जरूरी था सुप्रीम कोर्ट की लताड़
सर्वप्रथम माननीय सर्वोच्च न्यायालय का धन्यवाद, जिसके कारण एक बार फिर से लोकतंत्र शर्मशार होने से बच गया। कथित रूप से इस केस के मुख्य आरोपी पहले से ही बाहर घूम रहे हैं और तो और जो दोषी करार दिए गए थे, उनकी भी सजा माफ कर दी गई थी। गुजरात सरकार द्धारा इस तरह से सत्ता का दुरुपयोग का यह पहला मामला नहीं है, इनको सुप्रीम कोर्ट की लताड़ जरूरी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से लोगों का न्याय पालिका में जो भरोसा था वह कायम है।
निलेश दुबे, प्रवक्ता, यूथ कांग्रेस, मुंबई
इसके पीछे कौन है, सभी को पता है?
सिर्फ हमारे देश ही नहीं पूरे विश्व को पता है कि बिलकिस बानो के साथ घिनौना अपराध किया गया। उनका संसार उजाड़ दिया गया और ऐसे दरिंदो की सजा को माफ करा दिया जाता है। इसके पीछे कौन लोग थे, यह सभी को पता है। ‘सबका विकास’ कहने वाले लोग किस तरह का विकास कर रहे हैं यह दिखाई दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस जजमेंट को मै सलाम करती हूं।
हिना कनोजिया, स्टेट वाइस प्रेसिडेंट,
मुंबई प्रदेश यूथ कांग्रेस
न्यायपालिका पर भरोसा कायम है
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (८ जनवरी) को बिलकिस बानो को बड़ी राहत देते हुए गुजरात सरकार के पैâसले को गलत करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट के पैâसले ने खुद बता दिया की आपराधियों का संरक्षक कौन है? कोर्ट ने २००२ के दंगों के दौरान बानो से गैंगरेप और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में ११ दोषियों को सजा से छूट देने के राज्य सरकार के पैâसले को रद्द कर दिया। ऐसा लग रहा है कि न्यायपालिका ने जो पैâसला किया है उसके मद्देनजर हमको कभी भी न्याय को शक के निगाह से नहीं देखना चाहिए। अदालत अपना काम बखूबी निभा रही है। न्यायपालिका का यह पैâसला हिंदुस्तान के लिए यह एक मील का पत्थर है और उसके लिए न्यायपालिका को बहुत-बहुत सलाम। सवाल यह है कि बीजेपी माफी मांगेगी जैसा कि राहुल गांधी का कहना है।
शाहिद खान, सोशल एक्टिविस्ट

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