मुख्यपृष्ठस्तंभपारेटिक्स: सारे टोटके शबाब पर

पारेटिक्स: सारे टोटके शबाब पर

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश में प्यार से लोग ‘मामा’ कहते हैं और ‘मामाजी’ प्रदेश के अपने भांजे-भांजियों पर आजकल जमकर प्यार लूटा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अपने एक कार्यक्रम में ‘सीधे कमलनाथ पर हमला बोला और कहा, ‘अरे कमलनाथ मेरी प्यारी-बहनों का पैसा किसलिए रोका? किसलिए भांजे-भांजियों के लैपटॉप और साइकिल, स्कूटी रोक दिए। इधर, कमलनाथ हैरान परेशान हैं कि ‘भैया हम तो आए ही थे और दामन भी सम्हालते’ उससे पहले आप लोगों ने तख्ता पलट दिया। ‘कुछ तो हम भी कर सकते थे।’ बहरहाल, मामा की योजना ‘लाडली बहना’ को सत्ता में लौटने का जुगाड़ समझा जा रहा है। अभी तो एक हजार रुपए बहनों को मिलेगा, लेकिन इसे ३,००० रुपए तक किया जा सकता है। बहरहाल, कमलनाथ ने भी लाडली बहनों को लगे हाथ अट्ठारह सौ रुपए देने का वादा कर ही दिया।

कितने सर्वे कितनी रिपोर्ट……..
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सबसे ज्यादा यदि हलकान हुए हैं तो उनको हटाए जाने की खबरों से, कंबख्त ये तो न ठीक से सोचने देती हैं और न काम ही करने देती हैं। फिर ऊपर से खबरें उड़ानेवाले कबूतर बड़े ही आत्मविश्वास से कई तरह की सर्वे रिपोर्टों का हवाला देते हैं और धीरे से कान में फुसफुसाते हैं। बॉस संघ की सर्वे रिपोर्ट है, मैं नहीं कहता। मुख्यमंत्री के पास खुद का अपना खुफिया तंत्र होता है उसकी रिपोर्ट फिर भाजपा की अंदरूनी रिपोर्ट। सब आपस में अलहदा तो फिर ये भी देखा गया, जो मुख्यमंत्री को हटाने की बात को बड़े चटखारे ले कर सुनाते हैं, वहीं ये भी कहते सुने गए कि इस बार थोड़ा मुश्किल है बॉस। संघ के कई समर्थक और साथ में कई विधायक और मंत्री इन खुफिया सर्वे रिपोर्ट की सच्चाई को लेकर आपस मे खुसुर-फुसुर करते देखे और सुने गए कि यार अपनी भी देख लेना कि क्या स्थिति है, वहीं संघ के लोग हैरान हैं कि अपन ने कब सर्वे किया और यदि किया तो वो रिपोर्ट कहां है।

कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फरिश्तों की नजर…

भोपाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर को देख कर तो यही लगता है कि दिन फिर से फिर सकते हैं। अभी कुछ दिनों से कांग्रेस कार्यालय में टिकट चाहनेवालों की रेलमपेल मची हुई है। आए दिन भाजपा छोड़कर आनेवाले अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं तो कुछ सयाने मौन धारण कर वक्त की नजाकत को तौल कर ही कुछ करने के मूड में है। पिछले पंद्रह महीनों की बात कर लेते हैं, जो प्रदेश में कांग्रेस का बहुचर्चित कार्यकाल था, जिसे लोग ‘वो पंद्रह महीने’ भी कहते हैं। कांग्रेसी अंदर खाने की सुगबुगाहट बताती है कि बड़े साहब अब पहले के मुकाबले अब ज्यादा एवेलेबल हैं मतलब, उनसे अब कांग्रेस का आम कार्यकर्ता भी मिल सकता है। नहीं तो पहले साहब जब मुख्यमंत्री थे तो उनका गजब का जलवा था, मजाल थी कि कोई पर भी मार जाए। खैर, वक्त सबको कुछ न कुछ सिखा ही देता है। पहले साहब के एक खास सिक्युरिटी गार्ड की खास चर्चा थी, जो आईएएस, आईपीएस को भी कुछ नहीं समझता था। लेकिन अब हालात पहले से बेहतर बताए जा रहे हैं। एक शेर यूं ही याद आ गया। आपको सुनाता चलूं इसका इस वाक्ये से कोई लेना देना नहीं है।
‘कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फरिश्तों की नजर
आज वो रौनक-ए-बाजार नजर आते हैं।

लौट आया घायल ठाकुर—–
भोपाल मध्य विधानसभा का गठन साल २००८ में हुआ था। पहले चुनाव में यहां से ध्रुव नारायण सिंह बीजेपी से विधायक चुने गए थे। इसके बाद साल २०१३ में सुरेंद्र सिंह भाजपा से विधायक चुने गए, लेकिन २०१८ में भाजपा अपनी यह सीट नहीं बचा सकी और कांग्रेस के आरिफ मसूद ने सुरेंद्र नाथ सिंह को शिकस्त देकर इस पर कब्जा जमाया। इस बार भाजपा ने भोपाल मध्य सीट से ध्रुव नारायण सिंह पर ही विश्वास जताया है। साल २०१३ में शेहला मसूद हत्याकांड के बाद भाजपा ने अपने इस कद्दावर नेता से किनारा कर लिया था और उसके बाद इस कद्दावर नेता ने बिना धीरज गंवाए अपना काम जारी रखा और ‘अपनी कसक मन में लिए अंदर से घायल इस ठाकुर ने फिर टिकट लेकर सबको आश्चर्य में डाल दिया है। लेकिन कांग्रेस के वर्तमान विधायक आरिफ मसूद के लिए ये अच्छी खबर नहीं है। भोपाल के एक ज्ञानी ने बहुत पहले (मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति के समय) विधानसभा में हुई नियुक्तियों को देखकर ही बता दिया था कि इस बार ध्रुव नारायण को टिकट मिलना तय है। अंदरखाने की बात है कि संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ध्रुव नारायण सिंह को टालने के लिए कह दिया था कि राजनीति मेरा विषय नहीं है। लेकिन जिसका ये विषय था उन्होंने ने किसी भी विषय की चिंता किए बगैर इस विषय का ध्यान रखा और नतीजा सामने है। बहरहाल, दस साल के वनवास के बाद वापसी करनेवाले इस घायल ठाकुर के सामने किसी का टिकना लगभग नामुमकिन है।

चलते चलते…
काना-फूसी ये बताती है कि छिंदवाड़ा में भाजपा के टिकट भी कमलनाथ ही तय करते हैं, चाहे भाजपा वाले कोई भी शीर्षासन कर लें मामला मैनेज है तो फिर किसी ने पूछा, तो किसी ने बड़ी ही रहस्यमयी मुस्कान के साथ जवाब दिया ‘नाना भाऊ महोड को टिकट कैसे मिला?’ किसी के पास जवाब नहीं था। किसी ने चुटकी ली, फिर तो बंटी साहू का टिकट पक्का समझो। बात आई गई हो गई।
प्रणव पारे
(लेखक मध्यप्रदेश की राजनीतिक पत्रकारिता में गहरी पकड़ रखते हैं, प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विषयों पर लगातार काम करने के साथ कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन भी करते हैं।)

अन्य समाचार

लालमलाल!