मुख्यपृष्ठस्तंभपारेटिक्स : बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

पारेटिक्स : बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

प्रणव पारे
मध्य प्रदेश में हाल ही में हुए चुनावों में हार के बाद कांग्रेस पार्टी ने दो बड़े परिवर्तन कर के लंबी लड़ाई लड़ने का अपना इरादा जता दिया है। केंद्रीय नेतृत्व ने भाजपा की तरह ही पीढ़ी परिवर्तन करते हुए तेज- तर्रार जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष और मालवा से ही आने वाले आदिवासी युवा नेता उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाकर भाजपा को तुर्की-ब-तुर्की जवाब देने का प्रयास किया है।
कांग्रेस पार्टी के अंदरखाने की जो खबरें बाहर आ रही हैं, उनके अनुसार जीतू पटवारी राहुल गांधी के बेहद निकट माने जाते हैं। हालांकि, वो इस बार राउ विधानसभा से चुनाव हार भी गए हैं। दूसरी तरफ उमंग सिंघार हैं, जिन्हें नेता प्रतिपक्ष का दायित्व दिया गया है, वे गंधवानी विधानसभा से विधायक हैं और कमलनाथ मंत्रिमंडल में वन मंत्री भी रह चुके हैं, साथ ही प्रदेश में आदिवासी नेता के रूप में अपनी पहचान रखते हैं।
प्रदेश की राजनीति में अब इन दोनों की नवनियुक्ति का क्या असर पड़ेगा? ये देखने वाली बात होगी क्योंकि प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के लगभग सभी दिग्गज नेपथ्य में जा चुके हैं और उनकी जगह पर भाजपा ने अपनी तीसरी पंक्ति से मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर सभी को चौंका दिया है। कांग्रेस पार्टी ने भी नई पीढ़ी पर दांव लगाया है और आनेवाले समय को रोमांचक बना दिया है।
जितना आश्चर्य मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने पर हुआ था, उतना आश्चर्य कांग्रेस के इस निर्णय पर नहीं हुआ। कांग्रेस पार्टी में अब खुसुर-फुसुर का दौर चल पड़ा है। जानकार बता रहे हैं कि यही करना था तो इतनी बड़ी हार का इंतजार किसलिए किया? पहले ही कर देते तो आज कांग्रेस पार्टी की प्रदेश में बेहतर स्थिति हो सकती थी।
दरअसल, मध्य प्रदेश में चुनावी परिणामों का आकलन करने में हुई गफलत का सारा दारोमदार कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पर जाता है, जिनके अति आत्मविश्वास और दर्प के कारण न सिर्फ कार्यकर्ता बल्कि ग्रास रूट पर तैनात आम कार्यकर्ता भी जीत को लेकर आश्वस्त दिखे लेकिन परिणामों के बाद उसे भरोसा करना मुश्किल हो गया कि बाजी हाथ से निकल गई है। कांग्रेस पार्टी को करीब से जानने वालों ने बताया कि दरअसल कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में आपस में तालमेल की कमी देखी गई, जिसके कारण टिकिट बंटवारे में भी भारी कलह का सामना करना पड़ा था।
देखने वाली बात ये होगी कि नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और उमंग सिंघार के बीच तालमेल किस तरह का होगा या फिर वही ढाक के तीन पात वाली बात होगी। इस बात में कोई भी संदेह नहीं है कि जीतू पटवारी एक मुखर और जोशीले नेता हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रदेश के संगठन को ब्लॉक स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक चुस्त दुरुस्त करने की होगी, दूसरी तरफ नवनियुक्त नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भाजपा को विधानसभा से लेकर सड़क तक कितने मोर्चों पर घेर पाएंगे? ये देखने वाली बात होगी।
शिवराज को दक्षिणापथ
भारतीय जनता पार्टी उत्तर भारत और हिंदी क्षेत्र में परंपरागत रूप से मजबूत मानी जाती है और दक्षिण भारत में भाजपा ने इस बार शिवराज सिंह चौहान को दक्खन की मुहिम का दायित्व दिया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि कुछ न कुछ तो देना ही था तो ये निर्णय फिलवक्त के लिए लिया गया है। अभी उनके बारे में सही पैâसला आना बाकी है लेकिन दायित्व क्या है और किस स्तर का है, इसका अभी ठीक से खुलासा नहीं हुआ है। शिवराज सिंह चौहान एक ऊर्जावान नेता हैं, उनकी इस ऊर्जा का सदुपयोग भाजपा को करना ही था और फिर एक अग्निपरीक्षा में डालना था, सो डाल दिया। अब शिवराज सिंह चौहान दक्षिण भारत में अपने इस मिशन में क्या करेंगे, ये समय ही बताएगा। फिलहाल, उनकी दिल्ली यात्रा और दक्षिण की मुहिम की चर्चा प्रदेशभर में हो रही है।
मंत्रिमंडल का विस्तार
नवनियुक्त मुख्यमंत्री मोहन यादव फिलहाल अपने नए मंत्रिमंडल को लेकर दिल्ली आलाकमान के साथ व्यस्त हैं। फिलहाल, जो खबरें छन के आ रही हैं, उसमें भोपाल दक्षिण- पश्चिम से पहली बार जीतकर आए भगवानदास सबनानी को मंत्रिमंडल में लिया जा सकता है। दूसरी तरफ बैरसिया से तीसरी बार के विधायक विष्णु खत्री का नाम भी तय माना जा रहा है। मालवा से संभावित नामों में इंदौर २ से विधायक रमेश मेंदोला, सांवेर से विधायक और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक तुलसी सिलावट, गोविंद राजपूत का नाम भी चर्चा में है। सत्ता के गलियारों में कानाफूसी करने वाले ज्ञानी भी इस बार हथियार डाल बैठे हैं कि क्या पता आजकल कुछ भी नहीं बोल सकते, कौन कब क्या बन जाए। बहरहाल, पीढ़ी परिवर्तन का दौर दोनों ही दलों में देखने को मिला और प्रदेश में अब नए दौर की शुरुआत हो चुकी है। देखना ये है कि पुराने दिग्गज क्या करते हैं और नए खिलाड़ी पुराने घाघ नेताओं से वैâसे निपटते हैं। दोनों ही तरफ नई बिसात है और ये नई पीढ़ी है, आमने-सामने है, जो दिलचस्प है।
चलते चलते
कांग्रेस पार्टी के अंदर नई नियुक्ति पर काफी मुखर माने जाने वाले लोग कहते सुने गए कि अब तो चिड़िया खेत चुग गई। जो अभी हुआ है, वो बहुत पहले हो जाना था। बहरहाल, कयासबाजी और अनुमानों के चलते प्रदेश की राजनीति में असमंजस तो बना हुआ है, लेकिन धीरे-धीरे कुहासा भी छट रहा है। आने वाले समय में और भी बहुत कुछ होगा, जिसे समय पर छोड़ना बेहतर होगा।
(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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