मुख्यपृष्ठसमाचारपारेटिक्स : बड़ी कठिन है डगर मोहन की!

पारेटिक्स : बड़ी कठिन है डगर मोहन की!

प्रणव पारे
मध्य प्रदेश के नवनियुक्त मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए राह आसान नहीं दिखाई दे रही है। हालांकि, उनका समय पूरी शिद्दत के साथ उनका साथ निभा रहा है और पार्टी संगठन के अलावा केंद्र भी उनके साथ डट के पीछे खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन उनके लिए फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने अपनी खुद की बड़ी लकीर खींचना सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी। इसका कारण यह है कि शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता और कार्यकर्ताओं के बीच जो क्रेज है, उसके सामने मुख्यमंत्री मोहन यादव को खड़े होना और खुद को साबित करना है। आज भी शिवराज सिंह चौहान के बंगले पर जबदस्त भीड़ और रेलमपेल मची हुई है, जो यह बताती है कि मोहन यादव को खुद को उस स्थिति तक लाने और फिर लोकप्रिय मुख्यमंत्री साबित करने में बहुत समय लग सकता है। इधर शिवराज सिंह चौहान सार्वजनिक मंचों से लगातार अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। हाल ही में एक मंच से उन्होंने कहा कि जब तक कुर्सी है, तब तक चरण कमल है और जैसे ही कुर्सी हटी तो पोस्टर से तस्वीर ऐसे गायब हो जाती है जैसे गधे के सिर से सींग। अब इस बयान को लोग खूब नमक मिर्च लगाकर इधर-उधर कर रहे हैं। दूसरी तरफ सिंधिया गुट हो या वैâलाश विजयवर्गीय या फिर प्रह्लाद पटेल, ये सभी किसी न किसी रूप में मुख्यमंत्री मोहन यादव पर हावी होने का प्रयास भी करेंगे, जिससे निपटना भी कम बड़ी बात नहीं होगी। अब यदि मध्य प्रदेश के आर्थिक हालात की बात की जाए तो प्रदेश की माली हालत कोई अच्छी स्थिति में नहीं है। अभी मार्च के बाद ही गेहूं की बंपर पैदावार होगी और उसे समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए भी बड़ी राशि की आवश्यकता होगी। इसके अलावा चुनाव जीतने के बाद लाडली बहनों को प्रति माह १,२०० रुपए के स्थान पर ३,००० रुपए प्रतिमाह देने का वादा भी किया गया था। प्रदेश में लाडली बहनों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ के आस-पास होगी तो ये एक बड़ी राशि है, जिसका प्रतिमाह भुगतान करना है। अन्यथा यह मुद्दा बन सकता है और इसके नतीजे भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकते हैं।
हालांकि, इस बात की संभावना कम ही दिखती है कि भाजपा अपने चुनावी वादे में कोई हेर-फेर कर दे, लेकिन इसके लिए धनराशि जुटाना एक बड़ी चुनौती जरूर हो सकती है। इसके अलावा बड़ी खबर यह भी है कि ११ जनवरी को यानी आज भाजपा और संघ की एक चिंतन बैठक हो रही है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अधिकारी अरुण कुमार, दीपक विसपुते और भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष, राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश, अजय जामवाल, वीडी शर्मा, मुख्यमंत्री मोहन यादव और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी बुलाया गया है। इस बैठक में राममंदिर उद्घाटन से लेकर लोकसभा चुनावों जैसे मुद्दों पर चर्चा होने का अनुमान लगाया जा रहा है। मंत्रिमंडल के गठन के बाद यह पहली चिंतन बैठक है। अब यदि प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की बात की जाए तो नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी पूरे प्रदेश में माहौल बनाने में कामयाब नजर आ रहे हैं और राहुल गांधी की दूसरी न्याय यात्रा को कामयाब बनाने के लिए जी-तोड़ परिश्रम कर रहे हैं। आगामी लोकसभा के चुनावों में बेहतर परिणाम दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है, क्योंकि दोनों ही दलों के नेतृत्व में पीढ़ी परिवर्तन के बाद अच्छे प्रदर्शन का जबरदस्त दबाव है। यहां पर जीतू पटवारी को अपनी जुबान पर और व्यवहार पर संयम के साथ काम करने की जरूरत है, जिसे वो अपनी यूएसपी समझते हैं। कहीं न कहीं यही उनकी कमजोर कड़ी है बाकी युवा जोश और मेहनत में उनका कोई भी सानी नहीं है। देखने वाली बात यह होगी कि मध्य प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री मोहन यादव वैâसे इन सभी के बीच अपनी राह बनाएंगे और वैâसे प्रमुख विपक्षी दल के नए नेता जीतू पटवारी भाजपा को सड़क से लेकर विधानसभा तक बैकफुट पर लाएंगे।
शिवराज पर सियासी
संशय बरकरार
मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लेकर लगातार सियासी संशय बना हुआ है। जब उनसे पूछा गया कि उनके लिए आगे क्या रास्ता है तो उन्होंने इस पर बोलने से साफ मना कर दिया और कहा मैं पार्टी का सिपाही हूं और पार्टी जो भी निर्णय मेरे विषय में करेगी, वो मुझे मान्य होगा। लेकिन इससे पहले वो कई मंचों से कुछ और ही कह गए, जिसका सीधा अर्थ पार्टी के प्रति उनकी नाराजगी के रूप में ही देखा गया। गाहे बगाहे शिवराज सिंह चौहान को लेकर सियासी संशय लगातार बना हुआ है और उसके पीछे उनके बयान भी कारण बन रहे, जिसके कारण लोग कई अर्थ निकाल रहे हैं। मसलन, शिवराज सिंह चौहान ने अपने नए सरकारी आवास का नाम ‘मामा का घर’ रख दिया है और वहां पर बाकायदा एक बोर्ड भी लगा है, जिस पर ‘मामा का घर’ भी लिखा हुआ है।
इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के एक कद्दावर नेता अनिल माधव दवे भी हुए, जो केंद्र में मोदी सरकार में पर्यावरण मंत्री थे और उन्होंने भी अपने भोपाल स्थित घर का नाम ‘नदी का घर’ रखा था और उस घर को समाजसेवा के साथ पर्यावरण को समर्पित कर दिया था। अब घर का नाम रखने का चलन अनिल माधव दवे जी ने शुरू किया था, जो उनकी नर्मदा नदी के प्रति आस्था थी और साथ ही उनके पर्यावरण प्रेम को भी दर्शाती थी। लेकिन शिवराज सिंह चौहान द्वारा अपने घर के नामकरण के पीछे क्या मंशा है, ये वही जाने पर ऐसा लगता है कि उन्हें इस बार मुख्यमंत्री बनने का पूर्ण भरोसा था लेकिन ये हो नहीं पाया और उसके बाद से ही वो किसी नई दिशा और दशा की ओर बढ़ रहे हैं। इस पूरे मामले में उनके सलाहकारों को दाद देनी पड़ेगी, जो शिवराज को अब ब्रांडिंग और मार्वेâटिंग के गुर सिखा रहे हैं और भाजपा जैसी पार्टी में इतनी हिम्मत रखने और जूझने की सलाह दे रहे हैं। देखने वाली बात यह होगी कि क्या शिवराज सिंह चौहान के लिए भाजपा ने कोई बड़ी या नई भूमिका सोच रखी है? या फिर उन्हें खुद ही कोई अपनी राह बनानी होगी? यह तो वक्त ही बताएगा।
(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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