मुख्यपृष्ठस्तंभपारेटिक्स : क्या २४ में रामजी करेंगे भाजपा का बेड़ा पार?

पारेटिक्स : क्या २४ में रामजी करेंगे भाजपा का बेड़ा पार?

प्रणव पारे
२२ जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के आमंत्रण के लिए विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जागरण के लिए घर-घर में पीले चावल भेजने का काम जोर-शोर के साथ शुरू कर दिया है। इस कार्यक्रम में संघ के दूसरे अनुषांगिक संगठन भी काम कर रहे हैं। वैसे इसे कुछ लोग २४ के लोकसभा चुनावों से भी जोड़ रहे हैं वो इसलिए कि मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा भी अक्षत कलश लेकर बस्ती-बस्ती घूम रहे हैं। देखा जाए तो २२ जनवरी के दिन मोहल्ले-बस्तियों में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह को धूम धाम से मनाने के संघ के कार्यक्रम में भाजपा भी शामिल हो रही है, जिसका २४ के लोकसभा चुनाव से सीधा कनेक्शन दिखाई दे रहा है। एक वरिष्ठ भाजपा के नेता ने कहा कि हमारा तो खुल्लमखुल्ला मुद्दा था राममंदिर तो फिर हमारा उद्घाटन समारोह में भाग लेना वाजिब है। ये उनका सोचना है और कांग्रेस के लोगों की अपनी सोच है। फिलहाल, भाजपा को चुनावी मशीन बोलने वाले भी क्या गलत बोल रहे हैं? तुलसी दास जी ने भी एक जगह लिखा है कि गरीब नवाज (दीनबंधु) श्री राम का नाम ऐसा है, जो जपने वाले को राज पाट सब दे डालता है। फिलहाल इस मुद्दे पर मध्य प्रदेश की राजनीति में गर्माहट आ गई है और देखना ये है कि आगे-आगे क्या होता है।
बॉस मैं ही हूं – मोहन यादव
मध्य प्रदेश में हुए मंत्रिमंडल के गठन से एक बात साफ हो गई कि बॉस कौन है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कई महत्वपूर्ण विभाग मसलन गृह विभाग को स्वयं के पास रखकर जता दिया है कि वो फिलहाल अपनी पोजिशन को शुरुआत से ही मजबूत बनाए रखना चाहते हैं और कई दिग्गज नेताओं के अड़ने- लड़ने और उनकी चाहत को सिरे से दर किनार करके सभी महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रख लिए हैं। अंदर की खुसुर-फुसुर करने वाले बता रहे हैं कि मालवा के दिग्गज वैâलाश विजयवर्गीय ने पीडब्लूडी और गृह विभाग के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन अंत में उन्हें नगरीय प्रशासन और संसदीय कार्य मंत्रालय से काम चलाना पड़ा। प्रह्लाद पटेल भी मनपसंद मंत्रालय नहीं ले पाए और ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के कद्दावर मंत्री गोविंद राजपूत को परिवहन मंत्रालय नहीं मिला।
दरअसल, मोहन यादव ने उन अफवाहों को भी विराम लगा दिया है, जिसमें ये कहा जा रहा था कि मोहन यादव कनिष्ठ नेता हैं और चलेगी वरिष्ठ नेताओं की और मोहन यादव एक कठपुतली की तरह काम करेंगे, लेकिन मोहन यादव के शुरुआती तेवरों से ही कुछ नेताओं को समस्या हो सकती है। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पूरे मंत्रिमंडल को प्रिंसिपल सेक्रेटरियों के द्वारा नियंत्रित करते थे यानी किसी भी मंत्रालय में मुख्यमंत्री की आज्ञा के बिना कोई भी फाइल मजाल है कि पास हो जाए। मंत्री जी अपने सभी काम सीएम हाउस से ही करवाते थे क्योंकि उनके मंत्रालय का पीएस वहीं से मूव करता था। अब सवाल ये है कि क्या नए मुख्यमंत्री भी इसी प्रणाली से चलेंगे? यदि चलेंगे तो कोई बहुत बड़ा परिवर्तन होगा, ऐसा दिखाई नहीं देता। इधर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का एक बयान बहुत वायरल हो रहा है, जिसमें वो एक मंच से कह रहे हैं कि कभी-कभी राजतिलक होते होते वनवास भी हो जाता है। बात तो सही है। वैसे अब देखना ये है कि ये वनवास शॉट टर्म है या वाकई रामजी वाला? रामजी वाला वनवास हुआ तो फिर चिंता का विषय है।
मालवा-चंबल की पुरानी जंग
मध्य प्रदेश में जब रियासत कालीन दौर था, तब भी मालवा और चंबल के बीच परंपरागत खींचतान चलती थी क्योंकि चंबल पर सिंधिया तो मालवा पर होलकरों का राज था। दोनों के बीच कई युद्ध भी हुए। आज की परिस्थितियों में भी दो चिर परिचित शत्रु आपस में तलवार भांजे खड़े मिलते हैं। मालवा से वैâलाश विजयवर्गीय तो चंबल से ज्योतिरादित्य सिंधिया। मालवा भारतीय जनता पार्टी का सबसे पुराना और मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में ज्योतिरादित्य सिंधिया की कांग्रेस से बगावत और फिर उनका अपने समर्थकों के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाना, इस घटनाक्रम के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति का ‘फोकस’ ग्वालियर-चंबल की तरफ शिफ्ट हो गया था। इस बार ग्वालियर-चंबल संभाग से पिछली बार ९ की तुलना में सिर्फ ४ मंत्री बनाए गए हैं।
जानकार मानते हैं कि अब नए मंत्रिमंडल के गठन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने इस बात के भी संकेत दिए हैं कि मालवा और निमाड़ का उसका पुराना गढ़ उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस बार सिंधिया समर्थक विधायकों की तुलना में मालवा का भाव बढ़ जाना भविष्य में सिंधिया के लिए चिंताजनक हो सकता है, क्योंकि उनका इस बार का प्रदर्शन भी अच्छा था और उम्मीदें भी ज्यादा हैं। इस वजह से अपने समर्थकों को लामबंद करने में सिंधिया को मशक्कत करनी पड़ सकती है।
चलते चलते – ‘हिट एंड रन’ पर बवाल
केंद्र सरकार द्वारा लाए गए ‘हिट एंड रन’ वाले कानून पर मध्यप्रदेश में हड़ताल के पहले ही दिन जमकर बवाल हुआ। स्थिति भयावह होने से पहले ही केंद्र सरकार को शायद स्थिति के बिगड़ने और उसके पैâलाव का अंदाजा हो गया था। इससे पहले प्रदेश में इसमें दूसरा कोई डेवलेपमेंट हो, उससे पहले ही बातचीत के बाद सुलह समझौतों की खबर आ गई।
अंदरखाने की बात मान ली जाए तो अन्य समुदायों के साथ इस आंदोलन के विस्तार की भनक केंद्र को लग गई थी। इस आंदोलन को मिले व्यापक जनसमर्थन से घबरा कर ही इसे तुरंत मैनेज किया गया है, ऐसा अंदरखाने से खबर मिल रही है। फिलहाल, आंदोलन से जुड़े लोग केंद्र की आगे की कारवाई पर नजर लगाए हुए हैं और उसके बाद ही वे अपनी आगे की रणनीति बनाएंगे।

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