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तपिश से हलकान में लोग

निश्चित ही तापमान का पारा आसमान पर चढ़ा हुआ है, तो सूर्य की किरणें धरती वासियों की अग्नि परीक्षा ले रही हैं। सब तपिश से हलकान हैं। इतनी भीषण गर्मी में भी रेलवे की पटरियां हों या सड़कें, पुल-पुलियाओं का निर्माण हो या मकानों का निर्माण, खेत-खलिहान हों या कारखाने या अन्य खून-पसीना बहाने वाले कामों को करते, (चाहे महिला हों या पुरुष) देख सकते हैं। ऐसी ही विषम परिस्थितियों में पुलिस, सीमा सुरक्षा बल व सेना के जवान अपना कर्तव्य निभाते हैं। ये कोई लोहे पत्थर के नहीं, ये भी हाड़-मांस के बने हुए होते हैं। इनमें भी जान होती है, मगर इसके बाद भी काम में मशगूल रहते हैं, चाहे भारी वर्षा हो या खून जमाने वाली ठंड हो या कलेजा सुखाने वाली गर्मी हो, कोई गिला-शिकवा नहीं। जीवन जीने के लिए परिश्रम भी तो जरूरी है। तापमान बड़ा तो सबके हलक सूखने लगे, स्वाभाविक है। वन व पेड़-पौधे याद आने लगे, लेकिन हम सब भौतिक साधनों के वशीभूत होकर इतने सुविधा भोगी हो गए हैं कि हमें जरा सी बड़ी हुई ठंड या गर्मी विचलित कर देती है। भौतिक साधनों व सीमेंट कंक्रीट के इस बढ़ते मकड़जाल युग में निश्चित ही ऐसे माहौल का हमें आदी होना पड़ेगा, अन्यथा जीना मुहाल हो जाएगा क्योंकि हमें ना तो वनों की परवाह है ना पेड़-पौधे उगाने की। प्रकृति ने जो हरीतिमा (वनों का भंडार) का उपहार दिया था, उसमें श्रीवृद्धि तों नहीं की, मगर उजाड़ जरूर दिए हैं। परिणाम भी तो हमें ही भोगने होंगे । हम किसान मजदूर को पेड़-पौधे लगाने का पाठ पढ़ाएंगे, मगर स्वयं प्रकृति की रक्षा के लिए कुछ भी नहीं करेंगे।
-हेमा हरि उपाध्याय ‘अक्षत’

खाचरोद, उज्जैन

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