मुख्यपृष्ठनए समाचारकागजों पर वृक्षारोपण ने की मिट्टी पलीद, बार-बार फट रहा पहाड़ों का...

कागजों पर वृक्षारोपण ने की मिट्टी पलीद, बार-बार फट रहा पहाड़ों का सीना! उत्तर से लेकर दक्षिण तक भू-स्खलन से मची तबाही

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
पर्यावरण, प्रगति और पर्यटन के लिहाज से हिंदुस्थान के लिए महत्वपूर्ण माने जानेवाले पहाड़ अब खतरनाक होने लगे हैं। पहले तो मॉनसून के दौरान पहाड़ों में लैंड-स्लाइड्स (भूस्खलन) की कुछ ही घटनाएं घटती थीं लेकिन अब उत्तर से दक्षिण तक पहाड़ों का सीना फटने लगा है। यह सब विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किए जा रहे खिलवाड़ के कारण हो रहा है। खासकर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, कागजों पर वृक्षारोपण और बड़ी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के कारण पहाड़ खोखले होने लगे हैं। उत्तराखंड के जोशी मठ से लेकर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले स्थित इरशालवाड़ी गांव तक देश इसका खामियाजा भुगत रहा है।
पहाड़ों पर बारिश का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। उत्तराखंड में भी बारिश ने तबाही मचाई हुई है। उत्तराखंड में जोशीमठ के हेलंग कस्बे में आवासीय भवन टूटने से ०७ लोग मलबे में दब गए जिसके बाद पुलिस, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने रेस्क्यू अभियान चलाया।

हादसे में २ लोगों की मृत्यु की खबर है जबकि २ गंभीर घायलों को हेली एंबुलेंस से हायर सेंटर रेफर किया गया है। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में बारिश और भूस्खलन से हाहाकार मचा हुआ है। हिमाचल प्रदेश के सोलन में जहां बादल फटने से सात लोगों की मौत हो गई वहीं शिमला में एक शिव मंदिर भूस्खलन की चपेट में आ गया। जिसके मलबे में करीब ४० लोग दब गए। मलबे से तीन लोगों के शवों को बाहर निकाल लिया गया है। प्रदेश भर में भारी बारिश का कहर जारी है। बारिश की वजह से जगह-जगह लैंडस्लाइड हो रही है। इसकी वजह से कई सड़कें बंद हो गई हैं। शिमला के समरहिल इलाके में भूस्खलन की चपेट में शिव मंदिर आ गया है। मलबे में ४० से ज्यादा श्रद्धालु दब गए। तीन शव निकाले जा चुके हैं। बचाव अभियान जारी है। इससे पहले सोलन में बादल फटा था। इसमें सात लोगों की मौत हो गई।
गौरतलब हो कि देश भर के पहाड़ों में इस तरह की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। उत्तराखंड के जोशीमठ में जमीन दरकने से लोग दहशत के साए में जीने को मजबूर हैं। यहां पहाड़ कभी भी भयंकर तबाही मचा सकते हैं। लेकिन भूस्खलन की ये कहानी सिर्फ जोशीमठ तक ही सीमित नहीं है। पहाड़ के हर दूसरे गांव के ग्रामीण भी भूस्खलन से परेशान हैं। कपकोट तहसील के खारबगड़ गांव का हाल भी जोशीमठ जैसा हो रहा है। यहां के लोग भी प्रकृति और मानवजनित आपदा की वजह से ऐसे हालात के शिकार हैं। एक ओर दरकती पहाड़ी है, तो दूसरी ओर पनबिजली परियोजना की सुरंग के पास धंसता पहाड़ और रिसता पानी गांव के लिए खतरा बना हुआ है। वर्ष २०१३ में आई आपदा में पल्ला खार के पास की पहाड़ी दरक गई थी। अब हल्का सा खटका होने पर भी गांव के लोगों की सांसे अटक जाती हैं। मानसून के दौरान तो ग्रामीण जान की सलामती के लिए गांव तक छोड़ देते हैं। इस बारे में ग्रामिणों सहित जानकारों की राय एक ही है। उनका कहना है कि विकास के नाम पर यहां प्रकृति से खिलवाड़ चल रहा है। यहां पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है लेकिन बदले में लगनेवाले पेड़ सिर्फ फाइलों में ही लग रहे हैं। नतीजतन पहाड़ लगातार खोखले हो रहे हैं। मामूली बारिश में मिट्टी का कटाव तेजी से होने लगा है। भविष्य में स्थिति के और भी भयावह होने की आशंका जताई जा रही है।
बयान
मैं कांगड़ा जा रहा हूं। वहां से ६५० लोगों को निकाले जाने की जानकारी मिली है। कांगड़ा में अभी भी करीब १०० लोग फंसे हुए हैं, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। शिमला में एक और शव बरामद हुआ है। राज्य को करीब १० हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। हमें राज्य के बुनियादी ढांचे के पुनर्विकास में लगभग १ साल लगेंगे।
-सुखविंदर सिंह सुक्खू
(सीएम-हिमाचल प्रदेश)

अन्य समाचार