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गांधी के ‘स्वच्छता’ सपने पर पीएम मोदी की ‘सफाई’, १२ लाख शौचालय अस्तित्वहीन! सरकारी आंकड़ों में खुली पोल, कहीं शौचालय हैं तो पानी नहीं, ओडीएफ घोषित शहरों में भी खुले में शौच जारी

रामदिनेश यादव / मुंबई
देश आज दुनियाभर में शांति दूत के रूप में विख्यात महात्मा गांधी की जयंती मना रहा है। पीएम मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ के हालिया संस्करण में देश वासियों से १ अक्टूबर को ‘स्वच्छता के लिए एक घंटे का श्रमदान’ करने की अपील की थी। उनकी अपील को देश ने सकारात्मक प्रतिसाद भी दिया लेकिन सवाल बरकरार है कि क्या एक दिन की सफाई से देश साफ हो गया। पीएम मोदी को देश की सत्ता संभालते ९ साल से अधिक हो गए लेकिन देश की ज्यादातर सड़कें आज भी कचरा मुक्त नहीं हो सकी हैं। कई हिस्सों में आज भी लोग खुले में शौच करते हैं। मुंबई जैसा वैश्विक महानगर में कई इलाकों में ऐसा देखने को मिल जाता है।
देश को आजाद हुए ७६ साल हो गए हैं, लेकिन स्वच्छता को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के देखे हुए सपने अब भी अधूरे हैं। देश में जगह- जगह गंदगी और कचरे के ढेर देखने को मिल जाएंगे। केंद्र और राज्य में कितनी सरकारें आई और गईं लेकिन स्वच्छता का मुद्दा सुलझने की बजाय गंभीर होता चला गया है। अब पिछले ९ साल से सत्ता में भाजपा है। पीएम मोदी तबसे स्वच्छता के लिए नए- नए फंडे लेकर आ रहे हैं, कभी-कभी खुद सड़कों पर झाड़ू लेकर उतरते हैं तो कभी सफाईकर्मियों के साथ फोटो निकालते हैं। यह सब सोशल मीडिया पर छाया रहता है। लेकिन कुछ दिनों बाद फिर वही गंदगी, सफाई के लिए चर्चा शुरू हो जाती है। गांधी के स्वच्छता के सपने को लेकर भले यह सरकार गंभीर न हो, लेकिन उसका नाम लेकर पीएम मोदी अपनी छवि की सफाई में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। वे देश मे गंदगी, कचरे और कूड़े करकट की सफाई में कम और अपनी ब्रांडिंग में ज्यादा जोर देते हैं। सरकार स्वच्छता अभियान आंकड़ों को देखें तो साफ दिखाई देता है कि भारत में शौचालयों की स्थिति क्या है।

स्वच्छता तस्वीर में है विचार में नहीं
कई नेता, अभिनेता या अधिकारी स्वच्छता की बात करते हैं। झाड़ू के साथ वे अक्सर नजर आते हैं, अच्छा सा फोटो अपना मीडिया में छपवाते हैं। ये लोग मीडिया हो या सोशल मीडिया में ही सक्रिय दिखते हैं लेकिन उनके घर या परिसर में जाकर देखेंगे तो उनकी निष्क्रियता दिखाई देगी। ये लोग फेसबुक, व्हॉट्सऐप, ट्विटर पर स्वच्छता अभियान चलाते हैं लेकिन घर के सामने पड़े कचरे को भी नहीं हटाते हैं। यहां तक कि उसकी शिकायत करने का वक्त भी इनके पास नहीं होता है। स्वच्छता पर लोग अजब-गजब परिभाषा गढ़ रहे हैं।

शहरों में आज भी लोग खुले में शौच के लिए मजबूर
महानगरपालिकाओं में कचरों की सफाई के लिए पिछले ९ वर्षों में व्यवस्था कितनी मजबूत हुई है? मल प्रक्रिया केंद्र कितने बनाए गए? शहरों में आज भी लोग खुले में शौच के लिए मजबूर हैं और हमारी सरकार गांधी जी के ‘स्वच्छता’ सपने का फायदा उठाने में लगी है।

१२ लाख से अधिक शौचालय कागजों पर
सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ५० फीसदी से अधिक शौचालय का निर्माण हो जाने का दावा किया गया है। लेकिन इनमें से १२ लाख से अधिक शौचालय अस्तित्वहीन हैं। कई झूठे दस्तावेज प्रस्तुत कर शौचालय के आंकड़े बढ़ाए गए हैं, जबकि वास्तव में स्थिति कुछ और है। इस योजना में जमकर भ्रष्टाचार हुआ है।

ओडीएफ घोषित शहरों में भी लोग खुले में शौच को मजबूर
देश में केंद्र सरकार ने स्वच्छता के नाम पर बड़ी संख्या में शौचालय बनाने का अभियान शुरू किया। शहरों में खुले में शौच को रोकने का प्रयास किया। लेकिन जमीनी स्तर पर खुले में शौच बंद नहीं हो पाया है। यह सच है शौचालय की संख्या बढ़ी है लेकिन आज भी पर्याप्त संख्या में शौचालय उपलब्ध नहीं हैं। यही वजह है कि मुंबई जैसे शहर को ओडीएफ घोषित होने के बाद भी यहां के कई झोपड़पट्टी इलाकों में लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं। मानखुर्द, चेंबूर, गोवंडी, वडाला बांद्रा जैसे कई इलाकों में लोग आज भी खुले में शौच करने जाते हैं।

स्वच्छ भारत योजना के आंकड़ों में गड़बड़ी
स्वच्छ भारत अभियान के तहत भीतरी समस्या का समाधान करने के बजाय केवल सतही स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित किया गया है। सरकार ने स्वच्छता को लेकर भारी आंकड़े जारी किए हैं लेकिन उसमें गड़बड़ियां होने का आरोप लगातार लगते रहे हैं। इसमें सीवेज प्रक्रिया जैसी गतिविधियों को भी जोड़ा जाना चाहिए था। कई जगहों पर शौचालय तो बनाए गए हैं लेकिन पानी उपलब्ध नहीं होने से वे किसी के उपयोग में नहीं आ रहा है।

कमियां यहां हैं
कई राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण में जमकर भ्रष्टाचार हो रहा है। शहरी क्षेत्रों को कूड़ा-कचरा निपटाने और सार्वजनिक स्थानों पर अधिक सार्वजनिक शौचालय बनाने के लिए फंड उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन उस फंड का कितना हिस्सा किसकी जेब में जाता है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं।

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