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कविता : `आवारा बादल’

बादलों आजकल तुम कहां हो
सरहद के इस पार या उस पार
लेकिन वो खतरनाक बादल कहां हैं
जिन्होंने तबाही मचाई है
तुम्हारे शरारती कारनामों से हम वाकिफ हैं
ए शरारती बादलों क्या तुमने भी
अब बुजुर्ग बादलों का साथ छोड़ दिया है
पहले तुम्हारा आने का रास्ता साउथ से नॉर्थ था
लेकिन अब नॉर्थ यानी हिम के
आंचल थंडर के साथ बवंडर भी नजर आ रहा है
जहां जल ही जल और बादल गरज रहे हैं
बरस रहे हैं क्या सुंदर नदियों में
बसने-बसाने का राजशाहियों के कानूनी
पैâसला तुमने खुद अपने हाथों ले लिया है
इधर साहिल पर खड़ी कश्तियों की
शिकायत भी सुन लो
ए बादलों, क्या तुम पर हवाओं का दबाव है
जो बादल बिन मौसम कहीं भी
झरनों नदियों को भी बहा देते हो
लेकिन ए बादलों इतने गुमान
और गफलत में मत रहना
जहां नदियां फिर भी आखिर में
सागर में ही मिलना पड़ता है
लेकिन सागर ऐसा दरिया दिल जो
किसी के साथ मिलता नहीं हैं
-डॉ. अंजना मुकुंद कुलकर्णी

वो तो है कुछ
जो दिल बिखरा-बिखरा-सा
दिल की मासूमियत पे हादसे कई गुजरे हैं
वो ठुकराएं है दिल ये, हम बेहद रोए हैं
हर इक जख्म तमाशा-सा, मरहम-सा नहीं,
जो शायद उसको पता नहीं, दिल पे कांटे कितने बोए हैं
दिल पे दाग के हैं दिखाएं क्या?
हर इक जुल्म से टकराए हैं बताएं क्या?
दर्द उसने दिया है, हक उसका भी है
चोट मैंने खाया फिर सताएं क्या?
जो हुआ सो हुआ इस दुश्वार में क्या लिखना
वे चंद मुलाकात की बात है तो रहने दो
है रोजे-वाकिआ दिल में मेरे भूले तो नहीं
ये सफर कट जाने दें ऐसे तो सहने दो
धुआं उठा है लब से जिस्म जला है हटके
इस महफिल में कतरा-कतरा-सा
वो अगर न होते तो दर्द कभी न होते ये
जिंदगी है चलने दें मैं तो हूं ठहरा-ठहरा-सा
-मनोज कुमार,
गोण्डा उत्तर प्रदेश

तितली
पंखों में बदलती, कई रंग तितली,
खेलती है फूलों के संग, नन्हीं चिड़िया की तरह।
हल्के-हल्के पंखों की लहर में लहराती,
बाग के फूलों से लेकर खुशबू पैâलाती।।
स्वयं बेताबी से अपने उड़ानों में खो जाती।
जब खूबसूरती उसकी फिरकियों में आती,
रंगीन सफर का आगाज दुनिया में पैâलाती।
धरा पर खुशी के रंग बिखेरना संदेश दे जाती।।
हवाओं में चाहत रखती है स्वतंत्र उड़ने की,
चाह रखे बिन बंधनों के खुद को समर्पित करने की।
आओ तितली की तरह हम भी अपनी आजादी मनाएं,
प्रेम, सौभाग्य और आनंद से जीवन को सजाएं।।
डॉ. निशा सतीश चंद्र मिश्रा, मीरा रोड

रक्षा अपनी हम खुद कर लेंगे

रक्षा अपनी हम खुद कर लेंगे,
बस भाई थोड़ा-सा तुम प्यार देना।
कभी-कभी जब मायके आऊं,
मां सा ही तुम दुलार देना।
नहीं चाहिए वचन सुरक्षा का,
न कोई महंगा उपहार देना।
थोड़ा-सा समय कभी-कभी,
भइया मेरे साथ गुजार देना।
जग के लिए हो गई बड़ी मैं,
बचपन वाले नाम से पुकार देना।
सौ-सौ जंजालों में घिरे हुए हो,
भाई तुम भी
सोच के मेरे कष्टों को खुद को
दुख मत बेकार देना।
नहीं मैं बीते दिन का किस्सा हूं,
आज भी घर का हिस्सा हूं
भइया, ये कहने का मुझको
तुम अधिकार देना।
रक्षा अपनी हम खुद कर लेंगे,
बस भाई तुम थोड़ा-सा प्यार देना।

प्रज्ञा पांडेय (मनु), वापी गुजरात

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