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कविताएं: चीन की महामारी, दिल का राज, वक्त का आईना

चीन की महामारी
चीन वायरस फैलाने से बाज नहीं आएगा
अपनी गंदगी में खुद ही मिल जाएगा
दुनिया को न जीत पाएगा
खुद अपनी हार मनाएगा
चीन अमेरिका बनने का लालची है
एक जुट होकर खिलानी उसको मिर्ची है
अपने ही घर में दम घुटाता है
अपने लोगों को मार गिराता है
चीन अपने घर की फिक्र करे
फिर दुनिया में अपना जिक्र करे
जग को मिटाने का उसने दम भरा है
अब जग ने मन में ये ठानी है
चीन की दुर्दशा ऐसी लानी है
उसको हर पल चिंता सतानी है
चीन दुनिया को तबाह करने की जिद करेगा
वायरस चीन से ही निकला है
सारा जहान इसको सिद्ध करेगा
चीन ये महामारी लाना बंद करे
वर्ना अंतरराष्ट्रीय कचहरी में उसने मुंह की खानी है
– अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

दिल का राज
तुम्हारे साथ दिल का राज साझा हो नहीं सकता
दिल-ए-बीमार का कोई मुदावा हो नहीं सकता
सखी हो तुम अगर फिर ये दिखावा क्यूं सखावत का
ये ग़ुर्बत को मिटाने का तरीका हो नहीं सकता
तेरी पेशानी के ये बल हैं तेरी तकदीर के मोती
ये माथे पर चमकता बस पसीना हो नहीं सकता
मेरी दीवानगी को रहम के काबिल न समझो तुम
मेरी खामोश उलफत का तमाशा हो नहीं सकता
मेरे दिल को तो बस भाती है तेरी गुफ्तगू जानम
मेरी इस जिंदगी में तुझसे प्यारा हो नहीं सकता
मुहब्बत से तराशा है तुझे हीरे के ही मानिंद
कोई पत्थर मेरे दिल का नगीना हो नहीं सकता
डुबो देता है नावों को बिना पतवार का नाविक
समंदर क्या वो लहरों का सफीना हो नहीं सकता
तुम्हारे हाल से वाकिफ नही जो वक्त-ए-मुश्किल में
समझ लेना ‘कनक’ वो फिर तुम्हारा हो नहीं सकता
– डॉ. कनक लता तिवारी

वक्त का आईना
एक जीभ थोड़ी फिसली
सौ-सौ होंठ सिकोर रहे
मौके का लाभ पाने को
नाच सियासी मोर रहे
यद्यपि कहने का लहजा
सभ्यता विरुद्ध कुछ खारी है
तदापि माफ कर सकती हैं
सरल स्वभाव हर नारी है
नारी सम्मान अखरता है
आंखें खोलो विज्ञापन पर
अश्लील चित्र का इस्तिहार
सड़कों पर रोटी यापन पर
अच्छा हो सदन में जाकर
इस पर अपना मुंह खोलो
एक पुनीत कार्य होगा
भारत मां की जय बोलो
– अच्छेलाल तिवारी ‘राही’, जौनपुर (उ.प्र.)

औरत रहने दो
मायके मत जाओ
क्योंकि मैं कह रहा हूं
वो इस मैं में हम ढूंढती है
नादान है औरत
जो पराए घर में
सुवूâन ढूंढती है।
आज तक ढूंढ रही है
अपनी अनजानी गलती को
जिसने मायके से रिश्ता खत्म करवा दिया
फिर भी नहीं कोसती नए बंधन को
जिसने हर पल का
चैन गवां दिया
कभी जिद में आ भी गई
तो लाखों सवालों के कटघरे में
मुजरिम बना दिया
कैसे भूल जाते हैं लोग
एक बेटी को जन्म तो
उन्होंने भी दिया
औरत होना गुनाह है
तो कन्याभ्रूण हत्या
फिर से अपना लो
रोज-रोज मरने से बेहतर है
पटक-पटक कर शिला पर
अपने राक्षस होने का प्रमाण दो
पहनकर शेर की खाल गीदड़ न बनो
सच में मर्द हो तो
छोड़ अपना अहम
औरत को औरत रहने दो
– गायत्री शर्मा, कालेहर

चाटुकारिता
चाटुकारिता एक कला है
दूर होती हर बला है
जो करता इस मंत्र का जाप
सबकी नजरों में वह भला है
चाटुकारिता भी तो एक कला है
अच्छा है मैं इन सबसे दूर हूं
समझता सबको दिखाता सूर हूं
पता नही वैâसे इन चाटुओं का
जमीर साथ दे जाता है
थोड़े से फायदे की खातिर
कदमों में जा गिर जाता है
खुद के खून के तो रिश्तों को
पहचानता नहीं और
आकाओं को इज्जत से लबालब
विविध नामों से बुलाता हैं
क्या करें साहब
चाटुकारिता भी तो एक कला है…
– श्रवण चौधरी

तन्हाई
साजन तेरी तन्हाई
एक घूंट सिसक कर पी लूं
जैसा कहे तू वैसा जी लूं
रख दूं यादें कहीं पे यूं ही
दिल को यूं ही फिर से सी लूं
सुन आंख नहीं ये नदियां हैं
हर पल में जो दूरियां हैं
कैसे मिलूं है बेचैनी-सा बादल
जो गहरी सांसें दिल है दलदल
कैसे रहूं मैं अब तेरे बिन सजना
जो सूनी बिंदिया सूना कंगना
ये रात का आलम खामोश जरा
अब डर लगता है मुझे भी रहना
– मनोज कुमार, गोंडा, उत्तर प्रदेश

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