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कविताएं: क्या समझाएं

क्या बोलें हम क्या समझाएं।
कैसे दिल की बात बताएं।।
चारों तरफ अंधेरा पसरा।
कैसे यहां रोशनी लाएं।।
बाहर वाले बैठ गए हैं।
कैसे उनको आज भगाएं।।
दरवाजा जो खोल दिए हैं।
उनका कैसे साथ निभाएं।।
सारा मौसम बिगड़ चुका है।
कहां कहां हम दीप जलाएं।।
अंधेपन की होड़ लगी है।
सच्चाई को कहां बुलाएं।।
बड़बोलेपन के मौसम में।
हम कितना बोलें बतियाएं।।
छवि का धंधा तेज चल रहा।
हम कैसे गूंगा बन जाए।।
इधर एकता जनम ले रही।
चलो उसी का मान बढ़ाएं।।
सोते जगते हंसते गाते।
हरदम उसका गाना गाएं।।
बेकारी महंगाई का हम।
किसको किसको कथा सुनाएं।।
बहरे हैं सब सुनने वाले।
उनसे क्या उम्मीद लगाएं।।
क्या बोलें हम क्या समझाएं।।
कैसे दिल की बात बताएं।।

-अन्वेषी

भावनाएं
फिर रहे दर बदर भावनाएं लिए।
तुम अपने लिए हम पराए लिए।
आदमी आदमी को पहचानता कहां
अब बड़े फिर रहे हैं दुआएं लिए।
आदमी आदमी से आदमियत लिए।
काश के अब मिले अच्छी नीयत लिए।
वो हो गया है अब गैरों का रहनुमा
फिरता है ऐसी लिक्खी वसीयत लिए।।
चैन रखा कहां है जिंदगी में कहीं,
फिर रहे हैं सिर पे कितनी बलाएं लिए।
फिर रहे दर बदर भावनाएं लिए।
दे देते हैं वे अक्सर समय का हवाला।
जिसके पास धन है उसका है बोलबाला।
शाम जिंदगी की अपनों के बीच कटती कहां,
अनगिनत कमाई शाम को मधुशाला।।
चलते हैं साथ चेलों के साए लिए।
फिर रहे दर बदर भावनाएं लिए।।

-सिद्धार्थ गोरखपुरी

मजदूर
हर दिन सा घर से हूं निकला
पेट की भूख मिटाने को
कंधों पर है बोझ कुटुंब का
बाप का फर्ज निभाने को
राह तके है मेरा चौराहा
मंजिल तक मेरे आने को
बीत गए दो पहर यूं ही
कुछ मिला नहीं ले जाने को
सांझ हुई छा रहा अंधेरा
क्या दूं बच्चों को खाने को
होंगे मेरे इंतजार में
दिनभर का हाल सुनाने को
हर दिन सा घर से हूं निकला
पेट की भूख मिटाने को…
_ श्रवण चौधरी

अरमान
मिरे अरमानों को फिर क्यूं हवा दी तुमने।
इजहार-ए-मुहब्बत में देर लगा दी तुमने।।
मिरी तस्वीर तुम्हारें हाथों में थी यारां।
जलाकर क्यूं उसे खुद को सजा दी तुमने।।
कुछ राज जरूरी थे मुहब्बत में लेकिन।
बातें वही राज की सबको बता दी तुमने।।
तवील सफर है चाहत और ए तिमाद का ये।
निशानियां रास्तों की खुद ही मिटा दी तुमने।।
वासिफ सुनाना चाहते थे दास्तां जमाने को।
खबर ये अफवाह बना दी तुमने।।
डॉ. वासिफ काजी, इंदौर

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