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पाठकों की कविताएं : तलाश रहा हूं

मैं तलाश रहा हूं एक ‘चरित्रहीन’ औरत
पर मैं हैरान हूं वो मुझे आज तक मिली नहीं
ऐसा भी नहीं है कि
मैंने उसे सही से तलाशा नहीं
मैं गया था…
मैं उन तमाम औरतों के पास भी गया
जो देह को लेकर बाजार सजाती थीं
जो क्लबों मे अर्धनग्न हो नाचती-गाती थीं
जो रोज वासना के नए-नए किरदार निभाती थीं
पति से आंखें चुरा गैर मर्द की बांहों मे प्रेम ढूंढ़ती थीं
मैंने वो तमाम औरतें देखीं
पर मैं हैरान था
उनमें कहीं भी वो चरित्रहीन औरत नहीं थी
पर वहां हर औरत के पीछे
एक पुरुष जरूर छिपा था
कायर, कामुक, वासना की कीचड़ में
सर से पांव तक सना
शायद यही था… ‘वो’
जिसने सबसे पहले
औरत को ‘चरित्रहीन’ कहा
क्योंकि अकेले औरत ही चरित्रहीन नहीं होती
– कृष्णा मिश्रा, मुंबई

बाबा मेरे
जो टूटे न किसी दु:ख से
वो बेटी की विदाई से टूट गए
बाबा क्यों इतने तुम कमजोर हो गए
जो थी इतनी ही मैं जान से प्यारी
किसी और को क्यों सौंप गए
आधी रोटी खाकर
एक कमीज में जिंदगी बिताकर
कलम की ताकत सिखाया
आज किस बात पर बाबा
तुम मुझसे रूठ गए
टूटे न किसी बात पे
बेटी की विदाई से क्यों टूट गए
बाबा तेरे कलेजे का थी मैं टुकड़ा
तुम न कहते थे बाबा
बिटिया है मेरी चांद का टुकड़ा
क्यूं भला बोझ समझकर
खुद से दूर कर दिए
रोए न किसी बात पर आज तक
बेटी की विदाई पर जाने क्यों रो दिए
– खुशी झा

देश की मिट्टी
हुजूर एक सवाल है
दिल में मचा बवाल है
मिट्टी बची न देश में
यही तो बस मलाल है
घर रास्ते खेल के मैदान
रोजमर्रा के सारे सामान
सब तो हो गए हैं सीमेंट के
जो बचा है उस पर है
प्लास्टिक मेहरबान
अब आप ही बताएं
हम सबको समझाएं
आनेवाले कल में
हिंदुस्थान के थल में
जरा भी माटी रह पाएगी
या फिर यह माटी
याद बनकर रह जाएगी
आनेवाली पीढ़ी क्या
मिट्टी में खेल पाएगी
मिट्टी की खुशबू
मिट्टी के स्वाद से ये
वंचित ही रह जाएगी
हुजूर यही एक सवाल है
– श्रवण चौधरी

गुमान
तुझको तेरे वकार पे इतना गुमान है
लगता है तेरी पहली ये ऊंची उड़ान है
रिसते न जख्म और नहीं बह रहा है कुछ
गहरी है दिल पे चोट न दिखता निशान है
बार-ए-गम-ए-जहान से कांधे भी झुक गए
फिर भी पुकारती न किसी को जुबान है
हम सोज-ए-दर्द-ए-दिल लिए फिरते हैं सहरा में
ढूंढो सुकून से कहीं अपना मकान है
तू वार क्या करेगी नजर से भला ‘कनक’
जब कुंद तीर और शिकस्ता कमान है
– डॉ. कनक लता तिवारी

ख्वाबों की दुनिया
चलो ख्वाबों की दुनिया में जी लें
हकीकत की दुनिया अजीब सी है
एक नया शहर एक नया घर बना लें
घर में खुशबू हो चलो ऐसा ख्वाब चुन लें
हकीकत की दुनिया में खलबली मची है
ख्वाबों का एक ऐसा शहर बना लें
उस ख्वाब में गम का निशान न हो
हमारा तुम्हारा एक ऐसा ख्वाब हो
कैसे-कैसे ख्वाब सामने आने लगे हैं
हकीकत की दुनिया में खलबली मची है
हकीकत की दुनिया में कितनी तन्हाई पड़ी है
चलो एक नया ख्वाब चुने उसमें हम-तुम हों
जहां गम न और न कोई तन्हाई साथ में हो
हमारी तुम्हारी हसीन मुलाकात रहे
जहां इश्क की हमारी तुम्हारी बात रहे
मेरे इश्क में तेरी मोहब्बत शुमार हो
तेरे हाथों में मेरी लकीर लिखी हो
– जयप्रकाश सोनकर

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
चाहे वह सबसे निर्धन हो
या हो सबसे बड़ा अमीर,
वृक्ष हमेशा ही हरते आए
सबकी वेदना, सबकी पीर!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

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