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रक्षाबंधन पर्व पर पाठकों की कविताएं

भेजी है बहना ने राखी
भाई बहन की याद समेटे ए रक्षाबंधन आया।
भेजी है बहना ने राखी भाई का मन हरसाया।
रोली / रक्षा / बरफी / मिठाई, दे रही है बधाई।
दूर भले रहती हो बहना, सूनी न हो कलाई।।
इंद्र की रक्षा के खातिर था शची ने रक्षा बांधा।
चीर बढ़ाया था कृष्णा का, अमर हो गई गाथा।।
आशीर्वाद सदा रहता है दूर भले रहती हूं
भाई हर्षित रहे हमेशा, यही दुआ करती हूं।।
सखी चांद पर भी राखी भिजवाई दिहे
मां मा के बन्हवाई दिहे ना।।
मामा नहीं अब दूर
जैबई लेके ऊहां टूर
पुआ / पकवान मामा के खियाय दिहे
राखी बन्हवाई दिहे ना।।
भारत पहला देश भाई
पहुंचा दक्षिण ध्रुव जाई
ठेंगा चीन रूस यूके के दिखाई दीहे
राखी बन्हवाई दीहे ना।।
भैया चंद्रमुखी बोले
भाभी गुस्से में ही डोले
उपमा चांद की न दी हा, हम बताई दी हे
राखी बन्हवाई दी हे ना
राखी बन्हवाई दी हे ना।।

-सत्याभामा सिंह ‘दुर्गवंशी’

बहना तू मुझे भूल न जाना
जीवन में सदा ऐसे ही हंसते तू रहना।
बहना मेरी प्यारी मुझे तू भूल न जाना।
फूलों से भी नाजुक बहुत प्यारी सी तू है,
हम भाइयों की लाडली दुलारी तू ही है।
माना की एक दूसरे से आज दूर बहुत हैं।
चाहकर भी मिल न सकते मजबूर बहुत हैं।
पावन है पर्व आज लेकिन आंख नम हुई,
बहना तेरे बिन कर सूनी-सूनी पड़ी हुई।
एक वो जमाना था हम जब साथ पढ़ते थे।
एक दूसरे से लड़ते और नित झगड़ते भी थे।
रक्षाबंधन के दिन जल्दी राखी बंधवाते नहीं थे,
सुबह की तू भूखी शाम को हाथों से खिलाते थे।
जब से तू गई छोड़कर हम सबको अकेले,
रौनक न आई घर कभी सावन पड़े न झुले।
हर खुशी थी हम सबकी तुझसे तेरे साथ ही गई,
चेहरा उदास जो हुआ फिर कभी हंसी न गई।
-प्रभात गौर
जंघई-प्रयागराज

मेरी राखी है
सुंदर सुयश स्नेह सी,
भाई! मेरी राखी है।
स्वर्ग सा प्यारा, तुलसीदल का आंगन।
स्नेह सुमन तुम्हारा, मात-पिता का दामन।
वो यादें बड़ी सरस, ज्यों कबीर की साखी है।
भाई! मेरी राखी है।
बहाते थे तुम मेरे, खारा जल नयनों का।
आज लगता वो मुझे, स्वर्णिम गहनों सा।
वो यादें बड़ी धवल, ज्यों मराल की पांखी है।
भाई! मेरी राखी है।
कच्चा धागा नाजुक, पर प्रतीक दृढ़ प्रीत का।
जैसे स्वर लहरियों में, लय ताल संगीत का।
वो यादें बड़ी गजब, ज्यों दीप की बाती है।
भाई! मेरी राखी है।
– टीकेश्वर सिन्हा
बालोद-छत्तीसगढ़

राखी धागों का त्योहार
कितना सुंदर कितना मनोहर, ये राखी का त्योहार,
इस दिन बहनें राखी से भाइयों की कलाई सजाती हैं,
माथे पर अक्षत रोली का सुंदर सा टीका लगाती हैं,
राखी के हर एक धागे से बंधा है भाई बहन का प्यार,
राखी धागों का त्यौहार…
राखी के धागों में हर एक भाई खुशी खुशी बंध जाते हैं,
राखी के दिन कोई भाई बहन बिना कहां रह पाते हैं,
दुनिया में कहीं भी हो बहन के पास खींचे चले आते हैं,
राखी के त्योहार में झलकता इनका अनुपम प्यार,
राखी धागों का त्यौहार…
इसे बांधकर भइया बहनें एक दूजे के लिए मंगल कामना करते हैं,
राखी में बंधकर भाई जीवन भर बहन की रक्षा का प्रण लेते हैं,
इसमें दिखता बहन के लिए उनकी जिम्मेदारी और प्यार,
राखी धागों का त्यौहार…
इस राखी की लाज बचाने कृष्ण भी दौड़े आए थे,
एक धागे के बदले में फिर द्रोपदी को वस्त्र ढेरों लाए थे,
राखी के पावन बंधन से नतमस्तक है संसार,
राखी धागों का त्योहार…
रक्षाबंधन में दिखती भाई बहन की पवित्र भावना,
इस दिन मांगती हर बहना बस यही एक कामना,
स्नेह सदा रखना मुझ पर नहीं चाहिए अन्य कोई उपहार,
राखी धागों का त्यौहार…
-मुकेश कुमार सोनकर
रायपुर-छत्तीसगढ़

महापर्व है रक्षाबंधन
कच्चे धागे में गहरे विश्वास का परम अटूट यह बंधन,
कच्चे उम्र से लड़ते-खेलते-सीखते परम विश्वास का बंधन,
परिपक्व भाई बहन के चिंता और आत्मविश्वास का बंधन,
रिश्तों के अटूट आस और विश्वास का बंधन,
आपस के चिंता और चिंतन खास का बंधन,
निःस्वार्थ, परमार्थ और अनेकार्थ का बंधन,
अहम, वहम, घमंड से ऊपर
सिर्फ खुशी और मुस्कान का बंधन,
जड़ता-जड़, ममता-स्नेह आपस के सम्मान का बंधन,
बहन भाई के हर दुख-दर्द, आहत-राहत,
टकराते हर तूफान का बंधन,
शंका, आशंका, भय, अनुसंधान और समाधान का बंधन,
सारे दुख के हंसते खेलते निकालते हर व्यवधान का बंधन,
यह बंधन तो उप बंधन है, भाई बहन के
अमर प्रेम का स्व प्रेरित अनुबंधन,
दिन यह याद कराता हमको
नहीं भुलाना रक्षाबंधन,
अर्थ निकालो इस बंधन का,
और जरूरी क्यों यह बंधन?
प्राचीन से, आधुनिक होकर,
पाश्चात्य तक जीवित है यह बंधन,
लेकिन दायरा सिमट रहा है जोड़ो और निबंधन,
अब तक की घटना से सीखो,
फोड़ दो आंखें उन जाहिल के
जिनके कारण बहन की अश्रु आंखें
आबरू करती चीख चीख कर क्रंदन,
भारत की बेटियां हैं सबकी बहना,
भाई कलाई पर शोभित दिखता स्नेहयुक्त यह बंधन,
कोरा धागा न समझो यह वर्षों के त्याग,
समर्पण, स्नेह- प्रेम का महा पर्व है सबका रक्षाबंधन!!
-संजय सिंह `चंदन’

मेरी बहना
घर का गहना, प्यारी बहना।
हर पल जीवन में खुश रहना।।
यदि मुश्किल हो मुझसे कहना।
मेरे होते दुख ना सहना।।
हरगिज न कदम पीछे रखना।
बस आगे ही बढ़ती रहना।।
मेरी बहना न कभी डरना।
अवगुण से तुम लड़ती रहना।।
विपरीत समय हो यदि बहना।
तुम किंतु सबूरी धन गढ़ना।।

-नलिन खोईवाल, इंदौर

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