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कविताएं: दर्पण, चुनावी दौर, याद में

दर्पण

दर्पण असत्य कब बोला है
कब अबल-सबल को तोला है
जन-जन जब भय में जीता हो
दिन-दिन घट विष के पीता हो
सबके अंतर जब मैले हों
उपवन में कीकर फैले हों
इतनी भी अबला कहां बंधु
लेखनी भयातुर झुक जाए
जब सच कहने पर रोक लगे
जीवन में सुख जब शोक लगे
जब दर-दर न्याय भटकता हो
मुंह में नवनीत अटकता हो
इस कविता के चारण युग में
लेखनी शांत हो रुक जाए
अंधी अति क्रूर निशाओं को
जलती विद्रूप दिशाओं को
क्या मौन देखती रहे कलम?
हे कवि रुक जा हो गया अलम
वैâसे विरुदावलि वह लिख दे
वैâसे उसकी मसि बिक जाए
वे कहां कभी बिक पाते हैं
‘नागार्जुन’ और ‘रामधारी’
बेचेंगे वही कलम अपनी
जो व्रीड़ा-रहित नामधारी
मसि-रक्त गरल-सा है मुंह में
क्यों पृष्ठ छोड़कर छिप जाए
इतनी भी अबला कहां बंधु
लेखनी भयातुर झुक जाए
– रामधीरज शर्मा, बहराइच, उ.प्र.

चुनावी दौर

राजनीति का बोलबाला है
चारों तरफ घोटाला है
चुनावी दौर चल पड़ा
सबका जोर चल पड़ा
चुनावी मुद्दा जब भी आता
हर पार्टी अपना दांव लगाती
सबकी कुर्सी पर नजर जड़ी है
मंहगाई की किसी को नहीं पड़ी है
जनता की लुटिया डूबी पड़ी है
सब अपनी रणभूमि में कूद जाएं
जब पार्टी बन जाए
कुछ दिनों टिक पाए
बाद में वादे से मुकर जाएं
कोई मकान दिलाएं
कोई बिल कम कराएं
हर सामान आज कितना महंगा हुआ
जरूरी सामान खरीदना कम हुआ
सबको कुछ न कुछ मिल जाए
बस मिडिल क्लास खाली रह जाए
नेता कब जनता का भला करेगा
तभी तो देश आगे बढ़ेगा
– अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

याद में

याद में उनकी हिङ्का भी मुस्कुराने लगा है।
इश्क अब अपनी जादूगरी दिखाने लगा है।।
फर्क था उनकी कथनी और करनी में।
वो बेवफा मुझे अब वफा सिखाने लगा है।।
जिसकी नजरों में था मोल खिलौनों जितना।
शख्स वही अब मरासिम निभाने लगा है।।
ख़ुश है मुझे दफनाकर तन्हाई की कब्र में।
वो मिरे वजूद को दुनिया से मिटाने लगा है।।
– डॉ. वासिफ काजी, इंदौर

बढ़ती ठंड

कैसा ये मौसम है आया कभी धूप संग होती छांव
बैठे बिस्तर में हैं सारे नहीं धरा पर रखते पांव
ठिठुर रहे हैं लोग यहां पर किटकिट करते सब के दांत
इक दूजे को करे इशारे नहीं निकलती मुंह से बात
तेज सूर्य की किरणें आतीं मिलती है ऊर्जा भरपूर
चौराहे पर बैठे-बैठे ठंडी को करते हैं दूर
स्वेटर-मफलर तन को भाए स्पर्श नहीं करते हैं नीर
छोटे बच्चे रोते रहते क्या ठंडी में होती पीर
बादल में छुप जाता सूरज और पवन की बहती धार
दुबके मानव घर के अंदर काम-काज से माने हार
बहुत बढ़ी है ठंड धरा पर थोड़ा कम कर दो भगवान
देह बर्फ सी जमती जाती कहीं निकल न जाए प्राण
– प्रिया देवांगन ‘प्रियू’, गरियाबंद, छत्तीसगढ़

बेवफा की महफिल

जुबां पे लफ्ज मुहब्बत तो लाना मुश्किल है
इसे तो जानता वो दिल या फिर मेरा दिल है
तड़पती रहती हूं दिन-रात तेरी यादों में
न मिलने दे ये जहां बन गया जो हाइल है
हजारों ज़ुल्म भी कर सोचो कुछ नहीं होगा
न भूलो अहल-ए-जहां का खुदा ही आदिल है
सहर ता शाम मशक्कत गरीब करता मगर
तमाम उम्र वो खुशियों का रहता आमिल है
जहे-नसीब के आए वो मेरी महफिल में
खुदा का शुक्र है लगता करीब मंजिल है
है यूं तो भीड़ बहुत पर ‘कनक’ है तन्हा यहां
हो अपना कौन जो ये बेवफा की महफिल है

– कनकलता तिवारी

हैरतअंगेज बातें

बड़ी हैरतअंगेज हैं सुन तेरी बातें
यकीनन दस्तावेज हैं सुन तेरी बातें
करता है जी सुनते रहें सुनाते रहें
किस्सा-ए-रंगरेज हैं सुन तेरी बातें
कहां कब कितने गुल खिलाएं कौन जाने
इतनी ये जरखेज हैं सुन तेरी बातें
बना डालेंगी दुनिया को तेरा गुलाम
शराब से लबरेज हैं सुन तेरी बातें
निकली हैं तो फतह करके ही लौटेंगी
शमशीर-ए-चंगेज हैं सुन तेरी बातें

– डॉ. एम.डी. सिंह

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