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कविताएं: रामचंद्र कह गए, व्याकुल धरा, सच बोलो, जन जन में हैं राम

रामचंद्र कह गए…

रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा
हंस चुगेगा दाना और कौआ मोती खाएगा
महंगाई बढ़ेगी, बेरोजगारी बढ़ेगी
और देश का कर्ज भी बढ़ेगा
अच्छे दिन का सपना दिखाकर
रोटी-कपड़ा भी छीना जाएगा
विकास सिर्फ गुजरात-अडानी का होगा
विकास के नाम पर वोट मांगा जाएगा
बलात्कार करनेवाले का सत्कार होगा
देश को स्वर्ण पदक दिलाने वाली बेटी को
कारावास में डाला जाएगा
लोकशाही के नाम पर
तानाशाही का बोलबाला होगा
व्यापारियों का कर्ज माफ होगा
किसानों को कर्ज चुकाने के लिए
अपने अंगों को बेचना होगा
माता सिया ने पूछा
वादा गर पूरा नहीं होगा
प्रभु ने कहा नाम का मेरे उपयोग
वोट मांगने किया जाएगा
– प्रदीप मुरुडकर,
नई मुंबई

व्याकुल धरा

है धर्म की अतिरेकता में
रो रही व्याकुल धरा
क्या देखते ही मनुज का
सहकार धंधा हो गया
अब उड़ रहे उल्लू दिवा में
कुछ असंभव है कहां
तमयुक्त रजनी में यहां
मार्जार अंधा हो गया
शुचि धर्म का जो मर्म था
वह मर्म धंधा हो गया
जीवंत पशुता हो गई
सत्कर्म धंधा हो गया
अन्याय रुचिकर हो गया
शुचि न्याय लगता पाप है
हां! सत्य खाई बन गया
अब झूठ बंधा हो गया
– राम धीरज शर्मा, बहराइच (उत्तर प्रदेश)

सच बोलो

क्या लिखते हो कुछ तो बोलो
सच लिखते हो सच तो बोलो
जीवन भर पिटते रहते है
सच लिखते हो तो सच बोलो
ना को ना लिखना आता है
गला खोलकर तुम सच बोलो
कालखंड गर लिखा नहीं तो
गला घोंटते खुलकर बोलों
जैसा लिखते दिखते हो क्या
मुट्ठी भींच के सच बोलो
पहले सोचो कदम बढ़ाओ
निरक्षर को मत अक्षर बोलो
जय गाथा लिखनी है लिखना
सच का गला घोंटते बोलो
सच को गर सच लिखा नहीं तो
झूठे कलम की जय मत बोलो
सच की डगर बहुत कठिन है
‘उमेश’ संघर्ष की जय बोलो
– डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल

जन जन में हैं राम

जन जन में है हर्ष अपार, श्रीराम आएंगे अपने ही धाम
सब मिल गाओ मंगल गान, जय जय राम, जय श्रीराम
बरसों से जिसका था इंतजार, वो मंदिर बन रहा महान
सारा जग आएगा राम के गांव, जय जय राम, जय श्रीराम
अयोध्या की अब नई पहचान, दुनिया ढूंढे गूगल में नाम
राम नाम का होगा जय जयकार, जय श्रीराम, जय श्रीराम
कितनी सुंदर मूर्ति लला की, बालक रूप में होंगे राम
मुख मंडल पर तेज सूर्य सा, जय जय राम, जय श्रीराम
नसीब अपना जो अपने जीवन में, बन रहा ये पुण्य धाम
बरसों रहेंगी यादगार ये कायम, जय जय राम, जय श्रीराम
तन मन धन सब राम के नाम, कल गर्व करेंगी भावी संतान
सेवक मुथा का यही पैगाम, सब मिलकर बोलो जय श्रीराम
छगनलाल मुथा-सांडेराव,
मुंबई

आग

तुझ में भी आग है
मुझ में भी आग है
मगर मेरी आग में
वो ताप नहीं
यूं हम-तुम में कोई दूरी नहीं
फिर कौन सी है वो रेखा
आ पाते हम पास नहीं
खोये-खोये से प्राण मेरे
नम हैं आंखें
हृदय दहा करता है
ध्यान से सुनो प्रिये
प्रथम नहीं ये निवेदन मेरा
ये सावन हर बरस मेरी
पीर कहा करता है
– डॉ. रवींद्र कुमार

संग चलने को

सुबह-सुबह चौंक उठे हम
मुस्कुरा रहा बाल सखा
खींच रहा संग चलने को
कसकर उंगली पकड़ रखा
सहज सरल मनमोहक वह
बालों से अठखेल रहा
रुनझुन बजा वह पैजनी
चल पड़ने को ठेल रहा
उठ बैठ सभी ऊंघ रहे
वह पलकों को खोल रहा
मुख कान सटा वह मनहर
मधुर-मधुर कुछ बोल रहा
सूरज छुपा कोहरे में
आंखें अपनी मीच रहा
वह बरसा बर्फ धरती को
शीत शरद से सींच रहा
नूतन पथिक संग चल सखे
लिहाफ छोड़ नवपथ गढ़ें
जो ले चले अंतरिक्ष तक
हम सभी अब उस रथ चढ़ें
– डॉ. एम.डी. सिंह

खुद को रोते देखा

हमने खुद को रोते देखा
विश्व वेदना ढोते देखा
आंखों के ही ठीक सामने
खेल तमाशा होते देखा
अपने ही प्यारे मित्रों को
रोज एकता खोते देखा
क्रांति हमारी जाग रही थी
मगर समय को सोते देखा
सत्ता के घर में कुबेर को
हरदम पूड़ी पोते देखा
पूंजी के सारे दलाल को
बस्ती में दुख बोते देखा
धनबल के आगे मौसम को
अपना सब कुछ खोते देखा
जीते जी ही लाचारी में
बदहाली को होते देखा
अपने घर की सारी पूंजी
नादानी में खोते देखा
नासमझी का
नाच देखकर
मौसम को भी रोते देखा
हमने खुद को रोते देखा
विश्व वेदना ढोते देखा
– अन्वेषी

सूनी हवेली
वीराने खंडहर सूनी हवेली का नगर हूं मैं
किसी के होंठ से निकली गजल की इक बहर हूं मैं
कहीं पर दर्द के आंसू धड़कते दिल की खामोशी
अंधेरी रात का जुगनू उम्मीदों की सहर हूं मैं
भले कुछ भी नहीं, पर है न बनना राह की ठोकर
मैं हूं कश्ती नहीं, लेकिन ये मत बोलो भंवर हूं मैं
भले ठहरा हुआ हूं चल नहीं सकता मगर मैं भी
पथिक की राह में साया की खातिर इक शजर हूं मैं
दुवा की हूं, दया की हूं, मोहब्बत की भी हूं लेकिन
बुरी नजरों के खातिर तो कजा वाली नजर हूं मैं
– शिब्बू गाजीपुरी

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