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सियासतनामा : सत्ता का नशा

  • सैयद सलमान

सत्ता का नशा
पिछले सप्ताह ही भाजपा के ही एक अहंकार में चूर बदमिजाज विधायक को लेकर लिखा गया था। वह तो खुद विधायक थे लेकिन अब मामला एमपी के एक विधायक के भतीजे का सामने आया है, जिसने न सिर्फ एक पुलिस अधिकारी से बदतमीजी की बल्कि समझाने-बुझाने और बीच-बचाव के लिए सामने आए ग्रामीणों से भी बहस की और उन्हें भी भला-बुरा कहा। यह मामला भिंड जिले के दंदरौआ धाम का है, जहां मंत्री ओपीएस भदौरिया का भतीजा अपने समर्थकों के साथ एक कथा के दौरान किए गए पुलिसिया इंतजाम की धज्जियां उड़ाते हुए पुलिस अधिकारी तक से भिड़ गया। उसने डीएसपी को फटकार लगाते हुए जबरन बैरिकेड्स हटवाई और अपनी गाड़ी निकाल ली, जबकि डीएसपी उसे ऐसा करने से मना करते रहे। क्या सत्ता में रहते हुए पार्टी अपने नेताओं को ऐसा करने की छूट देती है? लोकप्रतिनिधि तो छोड़िए अब भाजपा के नेताओं के रिश्तेदारों पर भी सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलने लगा है। अगर ऐसा नहीं है तो इस तरह की घटनाओं पर पार्टी के बड़े नेता चुप्पी क्यों साध लेते हैं?
बुरे फंसे जयराम ठाकुर
हिमाचल प्रदेश में १२ नवंबर को मतदान हो चुका है। गुजरात के चुनाव खत्म होने के बाद एक साथ दोनों राज्यों के नतीजों के लिए ८ दिसंबर तक का इंतजार करना होगा। हिमाचल प्रदेश में ३७ साल का रिवाज तोड़ने की मंशा से भाजपा ने लगातार दूसरी बार अपनी सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। ५ साल से इंतजार में बैठी कांग्रेस को भी इस बार सरकार बन जाने की उम्मीद है। लेकिन इस बीच मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की ओर से भाजपा-कांग्रेस में नजदीकी मुकाबले की बात स्वीकार कर लिए जाने से भाजपा खेमे में हताशा फैल गई है। कहते हैं उनकी इस बात से भाजपा हाईकमान ने भी नाराजगी जताई है, क्योंकि इस कथन से गुजरात में नकारात्मक संदेश जा सकता है। भाजपा नेता बड़े बोल के लिए विख्यात हैं। ऐसे में नतीजों को लेकर हताशा भरा बयान देना ठाकुर साहब को भी भारी पड़ सकता है। वैसे भी अब चुनाव तो हो चुके हैं। नतीजे जो भी आएं, जयराम ठाकुर को अपने लिए अब नए सिरे से सफाई देने की मुहिम चलानी होगी।
भीतर का किसान
लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार को दो कदम पीछे हटना पड़ा था। हालांकि केंद्र के आश्वासनों से किसानों को अब भी कोई बड़ा लाभ नहीं हुआ है। ऐसे में उनकी मांगों को लेकर अब भूतपूर्व राज्यपाल हो चुके सत्यपाल मलिक सामने आए हैं। सत्यपाल मलिक को लगता है कि आंदोलन खत्म करने के लिए किसानों के साथ छल किया गया था और किया जा रहा है। उन्होंने मांग की है कि केंद्र सरकार शीघ्र किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागू करने का फैसला करे, नहीं तो फिर आंदोलन होगा। अब अगर किसान आंदोलन हुआ तो उसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार होगी। उन्होंने ११ दिसंबर को संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से काला दिवस मनाए जाने का भी एलान किया है। अब जब वह राज्यपाल रहते हुए भी किसानों के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर हमलावर रहते थे तो अब तो वो ऐसे किसी संवैधानिक पद पर भी नहीं हैं, जो खामोश रहें। लगता है मलिक के भीतर का किसान मुद्दा खत्म नहीं होने देगा।
चाल पर चाल
मैनपुरी उपचुनाव सपा और भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। डिंपल यादव को मैदान में उतार कर अखिलेश ने मनोवैज्ञानिक रूप से मतदाताओं पर बढ़त बना ली है। ये सीट मुलायम परिवार का गढ़ मानी जाती रही है और डिंपल उनकी बहू हैं। यही बात भाजपा को खल रही है। उसने हर तरह से यादव परिवार में फूट डालने और किसी न किसी को प्रत्याशी बनाने की पूरी कोशिश की। शिवपाल तो बहू-भतीजे के साथ हो लिए। यादव परिवार की एक अन्य बहू अपर्णा यादव को भी लुभाने की कोशिश हुई लेकिन वह भी अपनी रही-सही इज्जत बचाने के लिहाज से राजी नहीं हुईं। भाजपा के पुराने साथी और अखिलेश के साथ गठबंधन कर फिर उनसे अलग हुए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओपी राजभर पर वोट कटवा बनने का दाव लगाया गया लेकिन उनके प्रत्याशी का नामांकन निरस्त हो गया। देखना दिलचस्प होगा कि मैनपुरी उपचुनाव खत्म होने तक भाजपा अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए और कितनी तरह की चालें चलती रहती है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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