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सियासतनामा : केंद्रीय मंत्री की नाकामी

  • सैयद सलमान

केंद्रीय  मंत्री की नाकामी
मोदी सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपने संसदीय क्षेत्र मुरैना में न अपना महापौर बनवा सके और न सभापति। यह उनके लिए दोहरा झटका है। जब पार्टी ने महापौर का पद गंवाया था, तभी तोमर अलर्ट हो गए थे। उसके बाद सभापति बनवाने के लिए वो सक्रिय हुए और नवनिर्वाचित भाजपा पार्षदों को दिल्ली बुलाकर अपने बंगले पर दावत दी, रातभर उनके साथ मंथन किया लेकिन नाकाम रहे। कहने को तो मुरैना उनका गढ़ माना जाता है लेकिन कांग्रेस ने उनके गढ़ में ही उन्हें मात देकर भाजपा में उनके कद को बौना कर दिया। हालांकि काफी जोड़-तोड़ के बाद ग्वालियर नगर निगम में महापौर सीट पर कांग्रेस के हाथों ५७ साल बाद करारी शिकस्त झेलनेवाली भाजपा ने अपना सभापति बनाकर थोड़ी साख जरूर बचा ली है। उसके लिए ज्योतिरादित्य को खूब पापड़ बेलने पड़े। माना जा रहा है कि तोमर को उनके अपने ही लोगों ने धोखा दिया। ज्योतिरादित्य की रणनीति और केंद्रीय मंत्री की नाकामी प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुई है।
मोदी, ममता और मैच फिक्सिंग?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी की मुलाकात को लेकर विपक्ष चिंतित है। कुछ विपक्षी दलों ने ममता बनर्जी की इस मुलाकात को मैच फिक्सिंग तक करार दे दिया है। तर्वâ है कि वे इससे पहले भी विपक्षी एकता को कमजोर करने के लिए प्रधानमंत्री से औपचारिक भेंट के बहाने मिलती रही हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि उनकी पार्टी टीएमसी ने गोवा और त्रिपुरा में चुनाव केवल विपक्षी दलों को बांटने के लिए लड़े थे। विपक्ष का तर्क है कि ममता को अगर मोदी से राज्य की मांगों को लेकर चर्चा करनी ही थी तो आमने-सामने की बैठक क्यों की, उससे पहले सचिव स्तरीय बैठक क्यों नहीं हुई? दरअसल यहां भी ईडी फैक्टर  काम करता दिख रहा है, जिसने कोयला घोटाला मामले में ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी से दो बार पूछताछ की है। इस वजह से भी मामला थोड़ा संदेहास्पद हो भी जाता है। ममता के कई निर्णय गैर भाजपाई विपक्षी एकता की राह में अड़ंगा बन चुके हैं इसलिए भी इस मुलाकात पर उंगलियां उठ रही हैं। ममता की लड़ाकू छवि को उनकी पीएम संग मुलाकात से धक्का लग सकता है।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
पिछले दिनों कांग्रेस ने महंगाई, बेरोजगारी जैसे विषय पर देशव्यापी आंदोलन किया। हताश और शांत बैठे कांग्रेसी सड़कों पर उतरे। राहुल-प्रियंका ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगाया। न चाहते हुए भी मीडिया उन्हें दिखाने पर मजबूर हुआ लेकिन दिन ढलते-ढलते भाजपा ने उसमें भी ध्रुवीकरण का एंगल तलाश लिया। राम मंदिर शिलान्यास और कश्मीर मुद्दे पर देश को समझाया जाने लगा कि उसी दिन का चयन जान-बूझकर किया गया। उस पर जुमा का दिन और काले कपड़े। इसी में राजस्थान के उस साधु की आत्महत्या का मामला भी दबा दिया गया, जिसमें भाजपा विधायक के दबाव को बड़ा कारण बताया जा रहा है। सुसाइड नोट में साधु ने भाजपा विधायक पर उंगली उठाई है। ३५ घंटे तक उनका शव पेड़ पर लटका रहा। क्या इससे भाजपा के किसी नेता को शर्म आई? किसी ने सवाल पूछा? इसे ही `पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ कहते हैं।
केजरीवाल बनाम अमित शाह
दिल्ली और पंजाब में सरकार बना चुकी आम आदमी पार्टी अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है। इसके लिए हर महीने ३०० यूनिट मुफ्त बिजली और ५ साल में सभी युवाओं को नौकरी जैसे आजमाए गए लोक लुभावन वादों का सहारा लिया जा रहा है। भाजपा के सबसे बड़े गढ़ में सेंधमारी की कोशिश में जुटे अरविंद केजरीवाल भाजपा की आंतरिक गुटबाजी की खबरें भी अपनी विशेष अदा में उछाल रहे हैं। वह भूपेंद्र पटेल को नाकाम मुख्यमंत्री साबित करते हुए अमित शाह को सीएम चेहरा बनाए जाने की संभावना जता रहे हैं। केजरीवाल की मानें तो ऐसा इसलिए कि भाजपा को आप से खतरा है। भले ही अमित शाह भाजपा के चाणक्य कहलाएं लेकिन केजरीवाल उन्हीं को टारगेट कर मुख्य विरोधी भूमिका में आना चाहते हैं। उनकी मंशा गुजरात और हिमाचल में कांग्रेस को भी नुकसान पहुंचाने की है। वे जानते हैं कि कांग्रेस पर आक्रमण से कुछ नहीं होगा बल्कि भाजपा को ही फायदा होगा, इसलिए वह सीधे भाजपा पर ही हमलावर हैं। पंजाब और दिल्ली में सरकार बन जाने से उनके हौसले वैसे भी बुलंद हैं।

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