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सियासतनामा : नीयत में खोट

सैयद सलमान

नीयत में खोट
बड़ी अजीब बात है कि बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल जेडीयू की सहयोगी भाजपा को अपने स्थानीय नेताओं की चिंता सता रही है। केंद्र सरकार ने बिहार के दोनों उप-मुख्यमंत्री समेत कुल १० नेताओं को ‘वाई’ लेवल की सुरक्षा देने का  फैसला किया है। वजह बनी है अग्निपथ योजना, जिसे लेकर बिहार में जेडीयू और भाजपा में जबरदस्त तनातनी चल रही है। बिहार में केंद्र की अग्निपथ योजना का बड़े स्तर पर विरोध हो रहा है। कुछ दिन पहले योजना से गुस्साए युवाओं ने कुछ भाजपा नेताओं के आवास और कई दफ्तरों पर हमला भी किया था। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने ट्रेनें फूंक दीं और कई जगह रेलवे स्टेशनों में तोड़फोड़ भी की। प्रदर्शनकारियों पर कोई कार्रवाई न करने को लेकर जेडीयू पर भाजपा हमलावर है। ओबीसी जनगणना को लेकर जेडीयू पहले से ही मुखर है। अग्निपथ, अग्निवीर जैसी योजनाओं पर गुस्साए युवाओं के भय से अपने नेताओं को खुफिया एजेंसियों के बहाने सुरक्षा मुहैया कराने से बेहतर था कि केंद्र सरकार युवाओं का विश्वास जीतने का प्रयास करती। लेकिन अगर नीयत में ही खोट हो तो क्या कहा जाए?
यही है सुनहरा मौका
भले ही राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की तरफ से पेश हुए दो बड़े नाम शरद पवार और फारूक अब्दुल्ला ने अपने नाम पीछे ले लिए हों लेकिन विपक्ष हथियार डालने के मूड में नहीं है। उसके पीछे की वजह है कि आंकड़ों के खेल में विपक्ष का पलड़ा भाजपा पर भारी पड़ता दिख रहा है। लेकिन शर्त यही है कि यदि पूरा विपक्ष एक प्लेटफॉर्म पर आ जाए तो भाजपा को हराया जा सकता है। अगर चुनावी अंक-गणित की बात हो तो इस वक्त भाजपा के पास ५० फीसदी से कम वोट हैं। भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास कुल ४८.९ फीसदी वोट हैं, जबकि विपक्ष के पास ५१.१ फीसदी वोट हैं और यही गणित भाजपा को परेशान कर रहा है। सारा दारोमदार विपक्षी एकता पर निर्भर करता है। विपक्ष की तरफ से इसके प्रयास भी हो रहे हैं, लेकिन एक समस्या यह भी आती है कि हर क्षेत्रीय दल की अपनी अलग रणनीति है, अलग समस्या है, अलग विचार हैं। सभी का एकजुट हो पाना इसीलिए मुश्किल हो रहा है। जो भी हो अगर एकजुट नहीं हुए तो भाजपा को नैतिक पराजय देने का यह सुनहरा मौका हाथ से निकल जाएगा।
चर्चा में आजमगढ़
उत्तर प्रदेश में दो लोकसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव सपा और भाजपा के लिए नाक का प्रश्न बन गए हैं। इन चुनावों में भाजपा और सपा की भले ही आमने-सामने की सीधी लड़ाई दिखाई दे रही हो लेकिन चर्चित जिले आजमगढ़ में बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है। आजमगढ़ के मुबारकपुर सीट से पूर्व विधायक रह चुके शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली का उपचुनाव लड़ना सपा के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में मायावती के सुस्त प्रचार को भाजपा की मदद के रूप में देखा गया था। केवल मात्र एक विधायक की जीत से शर्मिंदा मायावती ने इस बार अपने सिर से दाग मिटाने की खातिर बड़ा दांव खेला है। इलाके में लोकप्रिय गुड्डू जमाली इससे पहले भी २०१४ के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव के खिलाफ यहां से चुनाव लड़ चुके हैं। सपा के धर्मेंद्र यादव की जीत के लिए पूरा यादव परिवार लग गया है। भाजपा के निरहुआ को कोई सीरियस नहीं ले रहा। वो बस मुस्लिम वोटों के बंटवारे पर नजर गड़ाए जीत की उम्मीद पाले बैठे हैं।
प्रत्याशी पत्नियों के दुखियारे पति
मध्यप्रदेश के पंचायत चुनाव को लेकर अजीबोगरीब मामले देखने को मिल रहे हैं। सरपंची की कुर्सी के लिए हो रहे चुनावी रण में एक जगह पति-पत्नी ही आमने-सामने लड़ गए हैं। एक अच्छी बात यह है कि दोनों ही अपने-अपने लिए वोट मांग रहे हैं। समझदारी दिखाते हुए कोई भी एक-दूसरे का विरोध नहीं कर रहा। एक जगह एक प्रत्याशी के पति लोगों के पैरों पर लोट-लोटकर वोट की मांग कर रहे हैं। तीन पत्नियों वाले एक शख्स की तीनों ही पत्नियां चुनाव मैदान में उतर गई हैं। मजे की बात यह है कि दूसरी और तीसरी पत्नी एक-दूसरे से ही भिड़ गई हैं। दो सौतनों के एक-दूसरे के सामने लड़ने से मुकाबला रोचक और रोमांचक हो गया है। यह तो शुक्र है कि पहली पत्नी अन्य सीट से लड़ रही है, वरना त्रिकोणीय मुकाबला होता। यह शख्स पंचायत सचिव के रूप में कार्यरत है। तीनों पत्नियां प्रचार में सचिव जी का सहयोग चाहती हैं। महाशय अपनी पत्नियों के चुनावी प्रचार के चक्कर में घर, गांव, पंचायत सब छोड़कर भाग गए हैं। इतने वर्षों की तिहरी तपस्या को सियासत की नजर लग गई।

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