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सियासतनामा : दांव पर सम्मान

  • सैयद सलमान

दांव पर सम्मान
स्वर्गीय रामविलास पासवान द्वारा स्थापित लोक जनशक्ति पार्टी को बने पूरे २३ साल हो गए। उनके निधन के बाद चाचा पशुपति पारस और भतीजे चिराग पासवान के बीच की रस्साकशी में पार्टी में दो फाड़ भी हो गई। बिहार की राजनीति में खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग चाचा से तो नाराज रहे लेकिन भाजपा के प्रति नर्म रुख रखा। हालांकि वो जानते थे कि चाचा को मंत्रिमंडल में शामिल कर उन्हें असल धोखा भाजपा ने ही दिया था। पशुपति पारस चिराग के एनडीए में रहने को लेकर कई बयान भी दे चुके हैं लेकिन बिहार के कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के पक्ष में चिराग ने प्रचार करते हुए भाजपा के साथ रहने का संकेत दिया है। न जाने चिराग की क्या मजबूरी है कि वो धोखा देने वालों के दरबार में इस कदर नतमस्तक हुए जा रहे हैं कि अपने सम्मान का भी ख्याल नहीं रहा। अपना राजनीतिक करियर दांव पर लगाने वाले चिराग को चाचा और भाजपा से सावधान रहने की जरूरत है।
प्रतिशोध की राजनीति
उत्तर प्रदेश की सियासत ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ वहां सत्ता पक्ष और विपक्ष की खटास अब सार्वजनिक मंचों से जाहिर होने लगी हैं। उत्तर प्रदेश में जारी उपचुनाव के बीच प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने धमकी तक दे दी कि चाचा और भतीजे (शिवपाल-अखिलेश) को लेकर सीबीआई की जांच चल रही है। जांच में दोषी पाए गए तो दोनों का जीवन जेल में बीतेगा। इस पर अखिलेश ने कहा कि राज्य की भाजपा सरकार को विपक्षी दल के प्रति इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि वह सत्ता में लौटने पर प्रतिशोध पर उतर आए। उन्होंने दावा किया कि उनके मुख्यमंत्री रहते योगी आदित्यनाथ की फाइल उनके पास आई थी। फाइल में कहा गया था कि उनके खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
जुबान पर लगाम
सत्ता के नशे में चूर बड़बोले और बिगड़ैल नेताओं की सूची बढ़ती जा रही है। इससे पहले भाजपा के ही अहंकार में चूर एक बदमिजाज विधायक और एमपी के एक विधायक के भतीजे की बदतमीजी को लेकर इसी स्तंभ में लिखा गया था। मनोज तिवारी के बिगड़े बोल पर भी चिंता जताई गई थी। इस सूची में परेश रावल का शुमार होना चिंताजनक है। उनका यह कहना कि, `महंगे गैस सिलिंडर का आप क्‍या करेंगे? बंगालियों के लिए मछली पकाएंगे?’ महंगाई को लेकर दिया गया बेहद असंवेदनशील बयान है, जिसको लेकर वो विवादों में आ गए हैं। यूपीए कार्यकाल में गैस की बढ़ती कीमतों पर सड़कों पर प्रदर्शन करने वाले नेता अब लगातार महंगे होते गैस के दाम को लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलते। खैर, वो उनकी मजबूरी हो सकती है लेकिन महंगाई से त्रस्त जनता की दुखती रग पर हाथ रखने का अधिकार इन नेताओं को किसने दिया? अहंकार किसी का रहा नहीं। नेतागण अगर इस बात को समझ लें तो जुबान पर लगाम अपने आप ही लग जाएगी।
गैरों पे करम
गुजरात और हिमाचल के नतीजों का आना बाकी है लेकिन भाजपा अभी से २०२४ की तैयारियों में जुटी है। जगह-जगह की भाजपा नीति राज्य सरकारें नई-नई घोषणाएं कर रही हैं। साथ ही साथ कांग्रेस में रहते भाजपा के शत्रु रहे वो नेता जो भाजपा में स्नान कर पवित्र हो गए हैं, उन्हें खास तवज्जो दी जा रही है, ताकि लोहे से लोहे को काटा जा सके। ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद का उदाहरण तो पुराना हो गया। एक को केंद्र में तो दूसरे को यूपी में मंत्री बनाकर एडजस्ट कर लिया गया है। ऐसे और भी बहुत हैं। अब तो `गैरों पे करम अपनों पे सितम’ वाले गीत को चरितार्थ करते हुए कांग्रेस से आए नेताओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी जा रही है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पार्टी प्रदेश अध्यक्ष रह चुके सुनील जाखड़ और कांग्रेस प्रवक्ता रहे जयवीर शेरगिल को भी राष्ट्रीय कार्यसमिति का सदस्य बनाया गया है। लगता है भाजपा को अपने नेताओं पर विश्वास नहीं, इसलिए कांग्रेस से आए नेताओं को पदों की रेवड़ियां बांटी जा रही है।

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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