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परिवारों से चिढ़ती राजनीति!

कविता श्रीवास्तव
परिवार होना बड़े भाग्य की बात है। हमारे देश में परिवारों का बड़ा महत्व है। संयुक्त परिवारों की हमारी परंपरा को दुनियाभर में सम्मान की नजरों से देखा जाता है। पौराणिक युग से ही हमारी सनातन संस्कृति में परिवारों का महत्व रहा है। लेकिन कुछ लोग परिवारवाद का मुद्दा उछालकर इन दिनों राजनीति को गरमाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका तर्क है कि कुछ परिवार राजनीति में हावी हैं, जबकि हकीकत यह है कि हमारे लोकतंत्र में किसी को भी राजनीति में आने की कोई रोक नहीं है। ढेर सारे राजनेता साधारण परिवारों से बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के सत्ता के शीर्ष पदों को सुशोभित करते आए हैं।
हम सदियों से देखते आए हैं कि जो परिवार जिस क्षेत्र में है, आगे चलकर उनकी अगली पीढ़ियां भी उस विरासत को संभालती हैं। इतिहास गवाह है कि राजा का बेटा ही राजा बनता रहा है। आज के युग में भी उद्योगपतियों के बेटे उद्योगपति, व्यापारियों के बेटे व्यापारी, फिल्मी हस्तियों के बच्चे फिल्मों में और इसी तरह अन्य कारोबार में भी लोग आगे बढ़ते हैं। यहां तक कि ढेर सारी मिठाइयों, नमकीन, खाद्य पदार्थों आदि से लेकर मसालों तक के पारिवारिक उत्पाद उनकी मूल पीढ़ियों के कारण लोकप्रिय ब्रांड बने हैं। इसी तरह ढेर सारे डॉक्टरों के बच्चे डॉक्टर और वकील के बेटे-बेटियां वकील बनते हैं, ये भी हम देखते हैं। क्योंकि मनुष्य पर जो संस्कार बचपन में पड़ जाते हैं, वे अमिट रहते हैं। इन्हीं संस्कारों पर मनुष्य के व्यक्तित्व की रचना होती है, लेकिन ऐसा हर व्यक्ति में नहीं होता। कई घरों के अधिकतर लोग अलग-अलग क्षेत्रों में भी भविष्य बनाते हैं और अपनी अगली पीढ़ी से प्रेरित होकर उसी क्षेत्र में जाने में सहूलियत रहती है।
बचपन से पुश्तैनी काम होते करीब देखने से उसी में रुचि बढ़ना स्वाभाविक है। अनुभवों से काम करने में आसानी भी होती है। कार्यकुशलता और क्षमता भी बढ़ती है। इसका कहीं से यह मतलब नहीं कि वह दूसरों के लिए रास्ते बंद कर देता है। फिर राजनीति में ऐसा होना तो ये बहुत ही स्वाभाविक सी बात है। इसको लेकर बहुत ज्यादा अचंभित होने जैसा कुछ भी नहीं है। कुछ परिवारों को छोड़कर ढेर सारे लोग राजनीति में भी साधारण परिवार से शीर्ष तक पहुंचने का कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं, कर रहे हैं और आगे भी करेंगे। हर किसी को अपने पसंदीदा क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने का मूलभूत अधिकार है। किसी का परिवार उस क्षेत्र में है इसलिए उसे उसी क्षेत्र में आने से रोकना तो उसके अधिकारों का ही हनन होगा।
कुछ लोग परिवारवाद के संबोधन से राजनीतिक बयानबाजी करने लगे हैं। दरअसल, उनका निशाना कुछ राजनीतिक विरोधियों तक ही सीमित है। आभास तो यह भी होता है कि संभवत: वे कुछ परिवारों की राजनीतिक सफलता से बुरी तरह चिढ़े हुए हैं। उनसे राजनीतिक विरोध के चक्कर में वे ढेर सारे अन्य परिवारों को भी अपने निशाने पर ले रहे हैं। यह वे जानते ही होंगे। फिर परिवारवाद से उन्हें आपत्ति है तो उन्हें उद्योग, व्यापार, फिल्म अन्य पेशेवर क्षेत्रों के बारे में भी परिवारवाद को लेकर अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। केवल राजनीतिक क्षेत्र के विरोधियों को निशाने पर लेना और मनमाफिक दोषारोपण करना राजनीति की रणनीति हो सकती है। इसको देश के अनेक परिवार किस रूप में लेते हैं, यह तो हमें आगे समझ आएगा। लेकिन हमारे लोकतंत्र में हर व्यक्ति देश की संवैधानिक प्रक्रिया से ही किसी पद को ग्रहण कर पाता है। जनप्रतिनिधियों को आम जनता ही चुनती है। पसंद-नापसंद का अधिकार भी आम जनता को है। फिर चाहे चयन राजनीति में हो या किसी और जगह। इसलिए कुछ राजनीतिक लोग कुछ परिवारों की सफलता को लेकर यदि संपूर्ण देश की बात कर रहे हैं तो उन्हें काम-धंधे, व्यापार और समस्त क्षेत्रों के परिवारवाद के बारे में भी एकदम स्पष्ट बयान देना चाहिए। यदि उन्हें लगता है कि यह देश के लिए और जनतंत्र के लिए ठीक नहीं है तो उन्हें इस संबंध में कानून बनाने पर भी विचार करना चाहिए, लेकिन ऐसा उनके लिए संभव ही नहीं है। क्योंकि जनमानस की व्यापकता और राजनीतिक सोच दोनों में बहुत फर्क होता है। अपनी राजनीतिक सोच, व्यंग्यात्मक बयानबाजी और लच्छेदार भाषणों से जनता के कुछ वर्ग का रुख मोड़कर, उन्हें प्रभावित करके उनके वोट पा लेना कुछ समय तक लाभ दे सकता है। लेकिन परिवारों को रोकने की मंशा लेकर आमूल-चूल परिवर्तन करना असंभव है, क्योंकि परिवार या उससे जुड़ा व्यक्ति अपने मूलभूत अधिकारों को लेकर आगे बढ़ता है तो क्या किसी की सोच उसे रोकने का कारण बनेगी? ध्यान रहे कि परिवार ही हमारे देश की सबसे बड़ी खूबसूरती है। परिवारों का महत्व हमारे देश में ही नहीं विदेशों में भी आदर्श स्थापित करता है। पौराणिक सनातन संस्कृति की पारिवारिकता की परंपराओं को किसी की चिढ़ मात्र से समाप्त कर देना किसी के लिए संभव नहीं है। हमारा देश सुसंस्कारी, सुसभ्य, आदर्शवादी बना रहेगा जब तक कि हमारे यहां परिवारों का चलन है। किसी के राजनीतिक बयान से परिवारों को कोई फर्क नहीं पड़ता। जो अपने परिवारों के साथ हिल-मिलकर रहते हैं, उन्हें इसका अहसास है। असल में परिवार प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता होती है। परिवार से ही मनुष्य संस्कार सीखता है। परिवार से ही अपना अस्तित्व प्राप्त करता है। परिवार का क्रम और उसकी परंपराएं कभी नहीं बदलती हैं। केवल कार्य करनेवाले व्यक्ति बदलते रहते हैं। परिवार से जुड़ा व्यक्ति भरोसेमंद होता है। परिवार के बिना इस संसार में हर कोई खोया-खोया-सा ही रहता है।
(लेखक पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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