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सियासतनामा : उपकार नहीं, रोजगार

 सैयद सलमान

उपकार नहीं, रोजगार
वरुण गांधी ने सुबह्मण्यम स्वामी और शत्रुघ्न सिन्हा की तर्ज पर पार्टी में रहते हुए बगावती तेवर अपनाए हुए हैं। वे अपनी ही सरकार पर तंज कसने का कोई मौका नहीं चूकते। वरुण ने रेलवे द्वारा आरआरबी एनटीपीसी परीक्षा में भाग लेनेवाले छात्रों की सुविधा के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाने के निर्णय का स्वागत किया है। लेकिन वरुण की चर्चा इस तारीफ से ज्यादा उस बात के लिए हो रही है, जिसमें उन्होंने बेरोजगार युवाओं के समर्थन में आवाज उठाई और सरकार से बेरोजगारों को उनका हक दिए जाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि कोई उपकार मत कीजिए, इन्हें बस इनका हक, इनका रोजगार दे दीजिए। इससे पहले वे किसानों के मुद्दे को उठाकर चर्चा में आए थे। अब इन दिनों वरुण छात्रों से जुड़े हुए मामले उठा रहे हैं। वरुण की तर्ज पर कई और सांसद वर्तमान सरकार से नाराज हैं लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। वरुण, गांधी परिवार से आते हैं। उनके लिए आगे के कई मार्ग खुल सकते हैं। यह तो तय है कि वरुण के ये तेवर भाजपा में उनके लिए मुश्किलें पैदा करेंगे।
राष्ट्रपति चुनाव की बढ़ी सरगर्मी
जिन लोगों ने भी राज्यसभा चुनाव को नजदीक से देखा है, वे बड़ी आसानी से बता देंगे कि केंद्र में बैठी सरकार और सरकार चलानेवाली भाजपा ने किस तरह से पूरी व्यवस्था को अपने काबू में करना चाहा। साम-दाम-दंड-भेद की हर कला को आजमाया। उसी तर्ज पर अब पार्टी की तैयारी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हो रही है। एनडीए के वोटों में मामूली कमी को देखते हुए केंद्र सरकार, जोड़-तोड़ में माहिर भाजपा नेता और एनडीए के घटक दल अपने उम्मीदवार की जीत के लिए हर मुमकिन कोशिश करने में जुट गए हैं, वहीं विपक्ष भी ताल ठोककर इस काम में लग गया है। सत्ताधारी दल के खिलाफ ‘अधिकतम विपक्षी एकता’ सुनिश्चित करने की कोशिश हो रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को विपक्ष से बात करने की जिम्मेदारी सौंपी है। ममता बनर्जी ने ८ राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत विपक्ष के २२ नेताओं को पत्र लिखकर संयुक्त बैठक में शामिल होने का न्यौता दिया है। भाजपा को राष्ट्रपति चुनाव में नैतिक पराजय देने से विपक्ष किसी भी हाल में चूकना नहीं चाहेगा।
पर कतरने की लत
भाजपा के दिग्गज नेता रहे गोपीनाथ मुंडे की पुत्री पंकजा मुंडे को इस बार भी विधान परिषद का टिकट नहीं दिया गया। इस बात को लेकर उनके समर्थकों में जबरदस्त नाराजगी देखी जा रही है। मुंडे के खासमखास रहे पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे कभी मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार माने जाते थे। उनके राजनीतिक करियर पर किसने ग्रहण लगाया? यह सबको पता है। अब पंकजा के समर्थन में आगे आए खडसे का कहना है कि भाजपा मुंडे-महाजन परिवार की राजनीतिक विरासत खत्म करना चाहती है। पंकजा खुद भी अपने चचेरे भाई धनंजय मुंडे से पराजित होने के बाद कई बार इशारों-इशारों में विधानसभा चुनाव में अपनी हार का ठीकरा पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर फोड़ चुकी हैं। अपने राजनीतिक पुनर्वास की बाट जोहती पंकजा को अगर विधान परिषद में भेजा जाता तो न केवल भाजपा के पुराने समर्थकों को खुशी मिलती बल्कि एक महिला और ओबीसी तबके का भी प्रतिनिधित्व बेहतर तरीके से हो जाता। लेकिन जिसे पर कतरने की लत लग जाए, उससे किसी की उड़ान कहां देखी जाती है।
विश्वसनीयता और वफादारी
उत्तर प्रदेश के एक धाकड़ बसपा नेता से मुलाकात हुई। पूर्वांचल के कुछ इलाकों में उनकी तूती बोलती है। बाहुबली वाली नहीं, सामाजिक कार्यों और स्वभाव में व्यावहारिकता वाली तूती। मजे की बात है कि वह दलितों और सवर्णों के साथ ही अल्पसंख्यकों के भी चहेते हैं। विधानसभा के पिछले चुनाव में बसपा का सूपड़ा साफ हो गया था और उसे महज एक सीट पर संतोष करना पड़ा। उससे ज्यादा दो सीटों पर तो कांग्रेस ने जीत दर्ज की है। नेता जी भी चुनाव में पराजित तो हुए लेकिन निराश नहीं हैं। निहायत निजी संबंधों की वजह से खुलकर बात करते हुए नेता जी ने अपनी और बसपा की हार के कई कारण बताए। मुस्लिम और यादव वोटों का सपा के साथ टिके रहना, यादव के इतर अन्य ओबीसी और सवर्णों का भाजपा की तरफ रहना और दलितों पर मायावती के कम होते प्रभाव पर भी उन्होंने काफी कुछ कहा। उन्हें मलाल इस बात का भी है कि अब अपार धन का होना चुनाव लड़ने का सबसे बड़ा कारक हो गया है। नेता जी चाहते हैं कि विश्वसनीयता और वफादारी की राजनीति लौटे। क्या कोई उनकी सुनेगा?
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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